अनंत की ओर

प्रत्येक वस्तु चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, उन्हें चलना ही है। उन्हें विश्र्व ब्रह्माण्ड की चा-नाभि से चलना है और फिर वहीं पहुंचना है। इस यात्रा में प्रत्येक मनुष्य को यह स्मरण रखना है कि उसे बाह्य जगत, भौतिक परिवेश और अन्तर्जगत, अन्तः प्रेरणा के बीच सन्तुलन बनाते हुए चलना है। उसे यह बात क्षण भर के लिए भी भूलनी नहीं है कि उसे चलना है- चरैवेति चरैवेति। स्थिर रहने के लिए कोई आया नहीं है और न आयेगा। चलना ही उसका कर्त्तव्य है। जो चलना नहीं चाहते अथवा जो यथास्थिति रहना चाहते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि स्थित अवस्था नाम की कोई चीज इस ब्रह्माण्ड में नहीं है। कोई भी व्यक्ति स्थित अवस्था स्थापित नहीं रख सकता। अतः यदि चलना ही है, रुकना जब नहीं है, पुरानी स्थिति को बनाये रखना जब सम्भव नहीं है, तो स्थिति में परिवर्तन तो होना ही है, तो ऐसा परिवर्तन लाना चाहिए, जो ामशः उन्नीत हो, अधोगति नहीं हो, गति अवरुद्घ नहीं हो। जो यह लक्ष्य रखते हैं, वही दुनिया में कुछ ठोस काम कर सकते हैं, कर सकेंगे। शेष लोग दुनिया के बोझ बनकर रह जायेंगे।

जो मनुष्य आलस्यवश कोई काम नहीं करते, उनका कोई मूल्य नहीं है, उनका कोई अस्तित्व-मूल्य नहीं, एक फूटी कौड़ी की भी कीमत नहीं है और जो चलता है, चलने से श्रम सीकर (पसीना) उसके ललाट पर चमकता है, वही व्यक्ति परम सौन्दर्यवान है और उसकी सुन्दरता देवताओं की भी ईर्ष्या का आधार बन जाती है- वे भी उन्हें धन्य कहते हैं। यदि गति उन्नीत नहीं होगी, तो वह अवनति की ओर जायेगी, वहॉं दुर्गति होगी। जो मनुष्य सोता है, उसका भाग्य भी सो जाता हैं। जो जाग जाते हैं, उनका भाग्य भी जाग जाता है। जो उठकर खड़े हो जाते हैं, उनका भाग्य भी उठकर खड़ा हो जाता है। मनुष्य जब तक सोया रहता है, उसका कलिकाल है। जड़ मनुष्यों का, निकम्मे मनुष्यों का जीवन ही कलिकाल है। जग गये तो उनके जीवन में द्वापर, उठ गये तो त्रेता और जब चलने लगे तो सत्ययुग।

– श्री आनन्दमूर्ति

 

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