अनकही

ठीक छः वर्ष पश्र्चात धर्मेश आज फिर उसी रेलवे प्लेटफार्म पर अटैची हाथ में लिये टेन से उतरा था, जहां से अंतिम परीक्षा देकर अपने गांव लौटा था। बीते छः वर्षों में उसने कई जगह काम किए, लेकिन कहीं भी टिक न सका। इस महानगर से वह परिचित था। कई परिवारों से उसके अच्छे संबंध थे। इसीलिए यहॉं का कॉल-लेटर मिलने पर वह कुछ आश्र्वस्त-सा लगा। उसने सोच रखा था कि यदि उसकी नियुक्ति हो गई तो वह स्थायी रूप से यहीं बस जाएगा।

साक्षात्कार शुरू होने में दो घंटे का समय बाकी देख वह नाश्ता करने के लिए चल पड़ा। सड़क पर बनी चाय की गुमटी पर नाश्ते का ऑर्डर दिया। वह गहरे सोच में डूब गया। हम आज स्वतंत्र हैं, पर किस बात में। दूसरों को गाली देने में, राजनीतिज्ञों को भला-बुरा कहने में अथवा सरकार की आलोचना-प्रत्यालोचना करने में। हम अपनी योग्यता के अनुसार काम नहीं पा सकते। पढ़ने-लिखने की इच्छा रखने वाले छात्र-छात्राएं विश्र्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में प्रवेश नहीं पा सकते। जनता चोर-डाकुओं से अधिक पुलिस से डरती है। नौकरियों में घूस, सिफारिश, भाई-भतीजावाद और जातिवाद का बोलबाला है। राजनेताओं, मंत्रियों, राज्यपालों व सरकारी अधिकारियों पर घोटालों और कमीशन खोरी के घिनौने आरोप लगते हैं, क्या यही स्वतंत्रता है।

अचानक पुलिस का दरोगा सामने की सीट पर इस कदर आकर बैठ गया, जैसे सीधे किसी मुठभेड़ से वापस आया हो। भारी-भरकम बेडौल शरीर, अस्त-व्यस्त कई दिनों से पहनी गई वर्दी, जिससे पसीने की दुर्गंध निकल कर पास-पड़ोस के ग्राहकों को नाक बंद करने के लिए बाध्य कर रही थी।

एक 11-12 साल का लड़का गंदे से प्लास्टिक के जग में पानी लाया तो उस पुलिसवाले ने गर्दन ऊपर उठाकर मुंह में पानी उड़ेलना शुरू कर दिया। आधा जग पानी पीकर उसने दुकानदार की ओर घूरा, जो घबड़ाया-सा पकौड़ी की प्लेट लेकर स्वयं आ गया। दरोगा इस कदर दो-दो, तीन-तीन पकौड़ियां उठाकर मुंह में भरने लगा, जैसे चार-छः दिन से उसे खाना-पीना नसीब न हुआ हो।

एक-एक कर तीन प्लेट पकौड़ी, एक प्लेट खस्ता खाकर डकार ली, चाय को दूसरे गिलास में डालकर ठंडी करके गटागट पी गया। एक मरियल से रिक्शावाले को बुलाकर बैठा और चलता बना। दुकानदार ने उसकी मां-बहन से रिश्ता जोड़ते हुए चैन की सांस ली।

यह दृश्य देखकर धर्मेश का मन खिन्नता से भर उठा। वह सोचने लगा- क्या पुलिस की वर्दी पहनने से ही शिष्टाचार और सभ्यता के मायने बदल जाते हैं? क्या ऐसा आचरण किसी स्वाधीन राष्ट के लिये कलंक नहीं है? जनता के ये तथाकथित रक्षक किस सहजता से उसका भक्षण कर रहे हैं, कहीं कोई विरोध नहीं, कोई बगावत नहीं। शायद हमने यही अपनी नियति स्वीकार कर ली है।

नाश्ता करके वह भारी कदमों से सड़क पर आया। एक रिक्शा लेकर साक्षात्कार-स्थल की ओर चल पड़ा।

चार रिक्त स्थानों के लिये लगभग 40 प्रत्याशी बुलाये गये। प्रत्याशी बेसब्री से साक्षात्कार शुरु होने का इन्तजार करने लगे। एक लिपिक कुछ लोगों से बातें कर रहा था। धर्मेश भी उसी ओर बढ़ गया। बाबू ने पूछा, “”किस पद के लिये आये हैं आप?” वह बोला, “”अंग्रेजी प्रवक्ता पद के लिये।”

बाबू ने संतोष व्यक्त करते हुये कहा, “”अभी तक इस पद के लिये कोई बातचीत नहीं हुई है। यदि आप कुछ हिम्मत करें तो काम हो सकता है।” अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को हिलाते हुए इशारा करते हुए कहने लगा, “”इसके बगैर कुछ नहीं होने वाला है। जो भी चालीस हजार खर्च कर सके, उसकी नौकरी पक्की समझो। एक साल में पैसा निकल आएगा, फिर तो जिंदगी भर मौज ही मौज है। ट्यूशन-कोचिंग कर लें तो तीन महीने में ही वारा-न्यारा हो जायेगा।”

धर्मेश ने अपने गांव की जमीन बेचकर यह नौकरी प्राप्त करने की सोची और कहा, “”मैं तैयार हूं, तुम बात पक्की करो।”

क्लर्क ने एक छोटी-सी नोटबुक में उसका नाम लिखा और कहा, “”पैसा कब तक मिल जाएगा?” “”चार-पांच दिन तो लग ही जाएंगे।” कहते हुए धर्मेश बाबू के मुंह की ओर देखने लगा। बाबू ने कहा, “”ठीक है, एक सप्ताह के अन्दर पैसा अगर हमको मिल गया, तो तुरन्त एप्वाइंमेंट लेटर देकर ज्वाइन करवा दूंगा। देर की तो फिर तुम्हीं जानो।” कहता हुआ वह चला गया। इण्टरव्यू की कार्रवाई शुरू हुई, जो लगभग दो घंटे तक चली। प्रत्याशियों को नियुक्ति-पत्र डाक द्वारा भेजने का आश्र्वासन दिया गया। प्रत्याशी आशा-निराशा के झूले में झूलते हुये वहां से खिसकने लगे। धर्मेश ने फिर से उस बाबू से मिलकर नौकरी की बात पक्की की और कार्यालय से निकलकर चल पड़ा।

– दुर्गाप्रसाद शुक्ल “आ़जाद’

 

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