अपना अस्पताल

ज्योतिषियों की कहूँ तो राहु-केतु की टेढ़ी आँखों की कुदृष्टि थी। डॉक्टरों की मानूँ तो लापरवाही थी। जो भी हो, शरीर में भूचाल-सा आ गया था। मैं दर्द से बेतहाशा बिलखने लगा था। मुझे लगा कि मेरे शरीर के भीतर सैकड़ों कॉंटें चुभ रहे हैं। मुझे लगा कि मैं कॉंटों की वादी में पहुँच गया हूँ, जहॉं सांस भी कॉंटों की तरह चुभती थी। मैंने अस्पताल जाने का फैसला किया और असहाय की स्थिति में एक सहायक की मदद से अपना अस्पताल, जिसे सामान्य अस्पताल भी कहते हैं, पहुँचाया गया और अनेकों परीक्षणों के बाद मुझे मिला वार्ड नं. 4 का बेड नं 32। वार्ड में आठ बिस्तर थे यानी 26, 27, 28, 29, 30, 31, 32 और 33। जब दर्द निवारक इन्जेक्शन ने अपना असर दिखाया तो मैंने वार्ड का जायजा लिया। वार्ड के चार पंखों में से एक पंखा मेरी ही तरह बीमार था। एक ट्यूब लाईट मरी हुई थी। नल की टोंटी लंगड़ी थी, इसलिए नीचे पेंच घुमाने से पानी आता था। पानी की भी आने की मर्जी थी, कब आये, कब जाये।

बेड नं. 26 में एक बूढ़ा था। उसकी शल्य-चिकित्सा हुई थी और ग्लूको़ज चढ़ रहा था। वह सब कुछ बड़े शांत-भाव से सहन कर रहा था। वह खुशनसीब लगता था। उसके बेटे, बहुएँ, लड़कियॉं, दामाद उसकी देखभाल में मन से जुड़े हुए थे। वह अस्वस्थ होते हुए भी पारिवारिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ था। इसलिए सचेत था और आज की मरीचिका के युग में भ्रमित नहीं था। उसके अपने लोग साथ थे, तब ग्रह ग्रहण नहीं बन सके थे। उसके स्वास्थ्य में सुधार था।

बेड नं. 27 में चेतन सिंह था। उसकी बांह और एक अंगुली पर पट्टी बंधी हुई थी। जमीन की तू-तू मैं-मैं में भांजों ने उसके ऊपर डंडे बरसा दिये थे। पुलिस कार्रवाई के लिए अस्पताल का प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिए वह यहां आया था। उसका भांजा इसी तरह दूसरे वार्ड में शायद आराम कर रहा था। पुलिस बयान लेने आई तो उसका चेहरा पहले तना, फिर ढीला हो गया, आंसू टपकाने वाले किस्म का। फिर ढीलापन कुछ पीछे हटा और संयत होकर उसने अपना बयान दर्ज कराया। वे द्वापर के कंस और कृष्ण वाले मामा-भांजे तो नहीं थे। वे कलियुग के थे। सो रिश्तेदारों के मनुहारों के बाद पूरी अकड़ दिखाकर ढीले हुए और समझौता कर बैठे। चेतन सिंह ने बांह और अंगुली की पट्टियां खोल दीं। वहां कुछ भी नहीं था। समझ लीजिए, किसी फिल्म की शूटिंग हो रही थी और अब पैकअप हो गया था।

बेड नं. 28 में सेवानिवृत्त वायु सैनिक बायें बांह में प्लास्टर चढ़ाये दूसरे में खैनी बनाकर नशा कर रहा था। सफेद घनी मूंछें, दांत नदारद। जब एक ने उससे यहां की उपस्थिति जाननी चाही तो उसकी शिराएँ तन गयीं। कनपटी बजने लगी। उसके मन में अपने बेटे के प्रति एक अजीब-सी वितृष्णा पैदा हो गयी थी। उसके भीतर कोई कुछ, तिक्त, बोझिल अंधेरा फैला हुआ था, जिसमें उसके जिन्दगी के अनेक खूबसूरत रंग लिथड़ गये थे, उसने बताया कि कमरा खाली न करने पर उसके बेटे और बहू ने उसको ऐसा डंडा मारा कि उसकी बांह की हड्डी हलाल हो गई। उसकी स्मृति में अटका अतीत अब भी सांसें ले रहा था।

बेड नं. 29 में एक थुलथुल बदन का भयानक काला नम्बरदार सिर पर सफेट पट्टी बांधे खून से सना कोई राजनैतिक प्राणी था। उसकी तोंद असामान्य थी, जो दोनों टांगों के बीच लटक रही थी। उसके साथ के लोग उसकी खूब सेवा कर रहे थे। एक औसत कद का जींस पेंट, खूबसूरत टी-शर्ट, आँखों पर चश्मा, हाथ में मोबाइलधारी नवयुवक उसे कह रहा था – “”मंत्रीजी से बात हो गयी है।” मालूम हुआ कि गॉंव के विरोधी-दल के सरपंच ने कहा-सुनी में उसके सिर पर ईंट मार दी थी। जब उसके दल के लोग आते तो वह “हाय-हाय’ करने लगता, जब चले जाते तो सेब, केले, संतरे खाने लग जाता था। उसकी बेड की चादर बदल दी गई थी, जो दूसरे बिस्तरों की चादरों को चिढ़ाने लगी थी। शायद वह वोट-बैंक का मैनेजर था।

बेड नं. 30 में इक्कीस-बाईस वर्ष का एक लड़का बस हिलता-डुलता ही था। न बोल सकता था, न खा सकता था। टांगें उसकी लकड़ी हो गई थीं। कांपता हुआ दुःखद क्षण था। उसकी मां आती और उसे देखकर नजरें झुका लेती, फिर मौन होकर खड़ी रहती। मैं यह पल गौर से देखता था और सामने का यथार्थ किसी फिल्मी कोला़ज की तरह आपस में गुत्थम-गुत्था हो जाता था। लड़का फौज में रसोइया था। एक दिन मौसी के नशेड़ी लड़के उसे घर से रात को बुला कर ले गये। फिर क्या हुआ, किसी को कुछ भी नहीं मालूम। वह सड़क पर बेसुध पड़ा मिला था। उसकी स्थिति देखी नहीं जाती थी। उसकी सेवा में लगे उसके भाई और चाचा की सेवा देखने को बार-बार मन करता था।

बेड नं. 31 में कद में छोटा, काला रामदीन था, जिसका हर्निया का ऑपरेशन हुआ था। वह भी एक मंदिर का रसोइया था। मसखरा इतना था कि चटपटा, मसालेदार कहने की ताक में हरदम रहता था। बालकपन में एक ऑफिसर उसे अपने बच्चों की देखभाल के लिए लाया था। अब बच्चे बड़े हो गये थे। ऑफिसर के राम-दरबार में जाने के बाद उससे भी लड़कों ने “जय सिया राम’ कहकर पल्ला झाड़ लिया था। सड़क पर आ गया था वह। एक साधु ने तरस खा कर उसे आश्रम में जगह दे दी, जहां अपनी ईमानदारी और मेहनत से वह प्यारा आदमी बन गया था। मंदिर के साधु, आस-पड़ोस के मर्द और औरतें उसके लिए चाय, दूध, फल, खाना ले आते थे। उसकी सेवा में एक सेवानिवृत्त फौजी भी था, जो फौज के चिकित्सा विभाग से सेवानिवृत्त हुआ था। वह स्वार्थरहित वहां सभी बीमारों की मदद करता रहता था। रात को दो पैग लगाकर वह वहीं वार्ड के फर्श पर चद्दर बिछा कर सो जाता था। डॉक्टरों, नर्सों से ज्यादा वह अनुभवी था, लेकिन घर के मामले में अनाड़ी होने से बेटे ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। साधुओं के बीच उठता-बैठता था। उसकी रामदान से मुलाकात हुई और दो पराए एक हो गये थे।

बेड नं . 32 मेरा था। एक कवि-लेखक। जब एक कवि-मित्र ने डॉक्टर से मेरा परिचय “कवि’ कहकर कराया तो उसने मुझे गौर से देखा और मुझे दाखिल कर लिया। मित्रों के आने से मेरे चेहरे पर खुशी की एक पतली-सी लहर दौड़ती थी। भोजन कवि-मित्रों के घर से आ जाता था। वे कहते, “”इसमें मेरी पत्नी का करुण-रस है, छोड़ना नहीं, पूरा खाना।” मेरी शल्य-चिकित्सा हुई थी। दर्द दो औरतों की बात खत्म न होने जैसा था। कवि-मित्र कहते, “”अपने अनुभव को कलमबंद करना मत भूलना।” जबकि मैं कलम पकड़ना ही भूल गया था।

बेड नं. 33 में फेरी वाला प्रीतम था। जब वह अस्पताल लाया गया तो उसके साथ दो और थे। तीनों खून से तरबतर। उसके मुंह में सूजन थी। आंखें किसी तरह बची हुई थीं, जबड़े हिले हुए थे। दांत घर छोड़ने को थे। फेरी लगाकर वे एक मंदिर के अहाते में खाना खाकर लेटे थे कि तीन नशेड़ी, जिनसे उनकी अच्छी जान-पहचान थी, आए और बीड़ी मांगी। उनके पास बीड़ी नहीं थी। नशेड़ियों को न सुनने की आदत नहीं थी। तीनों नशेड़ियों ने उन तीनों पर लोहे की राड से वो पिटाई की कि बेचारे अस्पताल में ही आकर सांस लेने लगे। प्रीतम को खाने में बड़ी तकलीफ होती थी, लेकिन वह पनीर खा सकता था। दूसरे दिन समाचार-पत्र में उन तीनों की फोटो छपी थी। ऐसा लगता था, उन्हें फोटो छपने की खुशी थी। रामदीन मसखरा कहता था “”मार खाई तो क्या हुआ? फोटो भी तो छप गयी।”

वार्ड नं. 4 दुखियों का एक मयखाना था। जहॉं न धर्म का झगड़ा था, न राजनीति का टंटा। जिसके घर से ज्यादा खाना आता, मिल-बांट कर खाते थे, दारुण गर्मी थी। वार्ड तीसरी मंजिल में होने से छत से आंच फूटती थी। रामदीन के पास मिट्टी का घड़ा पानी से भरा रहता था, जो वार्ड नं.4 की प्यास बुझाता रहता था। इस तरह यहां दुःख हरियाली का संस्पर्श पा लेता था और बीमार फिर से तरोताजा हो जाता था।

– उदय ठाकुर

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