अपना हुनर मालूम है उनको!

एक पत्रकार को नेताजी का इंटरव्यू चाहिए था और नेताजी थे कि पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। आये भी तो छूटते ही कह दिया, “”राजनीति पर बात नहीं करेंगे। राजनीति से संबंधित प्रश्र्न्नों के उत्तर नहीं देंगे।” पत्रकार सोचने लगा, तब हेडिंग कैसे बनेगी? मगर हेडिंग बनी और बहुत धांसू बनी! कैसे?

नीचे लिखे सवाल-जवाब पढ़ने की जहमत उठा लीजिए, आप खुद जान जायेंगे। कहा जाता है कि पटरियों के ऊपर से गुजरने का पहला हक रेल का है। है कि नहीं?

बिल्कुल है।

तो आखिरी हक किसका होगा?

अभी दूसरे हक का फैसला हुआ नहीं, और तुम आखिरी हक पर आ गये। अगर तुम्हारा संकेत रेलों से कुचले जाने के हक की ओर है तो तुम जिसे भी चाहो यह हक दिला दो। मैं उस पर कोई दावेदारी नहीं जताऊँगा…। वैसे तुम्हारा सवाल मूर्खतापूर्ण है। क्या तुम नहीं जानते कि अपने देस में अब हक की बात कहना हक गंवाने का वायस है? वैसे भी हक मांगने से नहीं छीनने से मिलते हैं। इन पटरियों को ही देखो, बेचारी छीना-झपटी नहीं कर सकतीं, इसलिए इनके ऊपर से गुजरने का हक तो रेलों के हवाले है, मगर इन्हें किसी के भी ऊपर से गुजरने का हक नहीं है। नाम तो है पटरियॉं, मगर आपस में पटरी बैठाने का हक भी इन्हें नहीं है। टस से मस नहीं हो सकतीं। हो जायें तो रेलें डिरेल होकर रह जाएँ। कितनी भी जिन्दगियों पर मौत अपना हक जताने लग जाये।

छोड़िए भी। आपको फल खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से?

फल तो फल आने पर खायेंगे न। मगर पेड़ गिनते रहना जरूरी है। वरना भाई लोग उन्हें काट ले जायेंगे और हमारे लिये अंगूर खट्टे हो जायेंगे। … देखो भाई, दूसरों की बात मैं नहीं करता मगर मुझ जैसों को तो जंगल में मंगल भी मनाना पड़ता है और शहर में दंगल कराना भी। इसलिए पेड़ भी गिनना पड़ता है और फल भी खाना पड़ता है।

आप पेड़ काटने वालों को ज्यादा सख्त सजा देने की हिमायत करेंगे या वोट काटने वालों को?

देखो, अब तुम राजनीतिक हो रहे हो यानी इस इंटरव्यू की शर्त तोड़ रहे हो। वोट की बात करना राजनीति की बात करना है। आखिरकार राजनीति वोट की ही होती है। फिर भी जवाब दे देता हूँ… सजा से पहले देखा जाना जरूरी है कि किसकी कुल्हाड़ी ने पेड़, माफ करना, नाक ज्यादा काटी। जो ज्यादा काटे उसे ज्यादा चांटे मारने की हिमायत करूंगा मैं।

पेड़ लगाने के बारे में आपका क्या ख्याल है? आपको पेड़ लगाने के लिए कहा जाये तो शुरूआत कहॉं से करना पसंद करेंगे।

अपनी भूमि पर तो कोई भी पेड़ लगा सकता है। मैं तो भाई किसी विरोधी की भूमि से शुरूआत करूंगा। एक पंथ दो काज हो जायेंगे। पेड़ों के साथ फल और भूमि भी अपनी हो जायेगी। सुना नहीं तुमने कभी – एकै साधे सब सधै…

आजकल क्या साध रहे हैं आप? मेरा मतलब है राजनीति के अलावा…

देखो, साध पूरी करने के लिए किसी भी साधना को अधूरी नहीं छोड़ने का संकल्प लिया हुआ है मैंने। पैसा और प्रचार पाने के काम आ सकने वाले किसी भी खेल को नहीं छोड़ रहा हूँ।

क्रिकेट से लेकर कबड्डी तक। छक्के मारना हो या छक्के छुड़ाना, छककर खाना, कोई भी खिचड़ी पकाना या किसी भी सुर में गाना। घड़ियाली आँसू बहाना हो या जबरन मुस्कुराना हो, स्टाइल से या ाी स्टाइल… मुझे अपना हुनर मालूम है।

पुस्तकें-उस्तकें भी पढ़ते हैं कभी?

एकदम्मै नेता समझ रखा है क्या? पुस्तकें पढ़ता भी हूँ और पढ़ाता भी हूँ। मगर लेखकों से एक शिकायत है भाई। छाप देना इसे भी कि राजनीतिक पतन का रोना रोते-रोते वे भी पतित हो गये हैं, एकदम से। सबके काम की किताबें लिखते हैं। यहॉं तक कि आत्महत्या करने वालों के काम की भी और टैक्स चुराने वालों के भी। मगर नेताओं के काम की एक भी किताब नहीं लिखते। तब नेता पढें तो कैसे पढ़ें? क्यों पढ़ें ऐसी किताबें जिनसे उनका हित ही न सधे।

आपके हिसाब से लेखकों को कौन से विषय चुनने चाहिए? खासकर नेताओं के लिये।

अरे भाई, उन्हें विषय-वासना से दूर रहकर लिखना चाहिए। “दंगों की आग कैसे जलाएँ और बुझाएँ?’ “जातिवाद कैसे फैलायें?’ मतदाताओं को कैसे भरमाएँ?’ “चुनाव जीतने के सरल तरीके’ और “चुनावी लहर पर सवारी के वक्त बरती जाने वाली सावधानियॉं’ जैसे शीर्षकों वाली पुस्तकें आयें तो नेताओं में उन्हें पढ़ने की होड़ लग जाये। इस गैर राजनीतिक इंटरव्यू में मैं इससे ज्यादा खुलकर नहीं बता सकता तुमको।

अंतिम प्रश्र्न्न। आपके सामाजिक सरोकार?

सारी रामायण खत्म हो गयी और अब पूछते हो कि मंथरा कौन थी? अगर अभी भी तुमको मेरे सामाजिक सरोकार समझ में नहीं आये तो मेरा इतना बकबक करना बेकार है। फिर भी बता दूँ। अभी तक मेरे पास एक ही बंगला है और एक ही कार है। सो भी लाल बत्ती वाली नहीं। जीवन अकारथ हुआ जा रहा है।

– कृष्ण प्रताप सिंह

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