अब बदलेंगे फूलों के रंग

सौ वर्ष पहले जब चेकोस्लोवाकिया के एक गांव के पादरी ग्रेगोर मेंडल ने फूलों वाली मटर में संकरण करके तरह-तरह के रंग वाले फूल पैदा किए एवं वंशगति के नियम बनाकर आनुवंशिकी की नींव रखी, तब उन्हें क्या पता था कि इसी आनुवंशिकी के गर्भ से उपजी बायोटेक्नोलॉजी फूलों के रंग बदलने में माहिर हो जाएगी।

एक जमाने तक तरह-तरह के फूलों के रंग ही रंगाई के काम आते थे। ये प्राकृतिक रंग न आँखों को कोई हानि पहुँचाते थे, न त्वचा को। फिर कोई सौ वर्ष पहले अंग्रे़जी रसायनवेत्ता विलियम हेनरी पार्किन ने पहली कृत्रिम डाई (रंजक) मॉवीन बना डाली। दूसरी ओर फूलों की पिगमेंटों (वर्णक) की रासायनिक रचना ज्ञात की गई एवं इस प्रकार खेतों की बजाय प्रयोगशालाओं एवं उद्योगों में रंग बनने लगे।

अमेरिका में मेरीलैंड के बेल्ट्सविल में स्थित एग्रीकल्चर शोध संस्थान के शोधकर्ता डॉ. रॉबर्ट ग्रीसबैंक की देखरेख में ये शोध चल रहे हैं। उनका कहना है कि अब फूलो में रंग पैदा करने वाले पिगमेंट यानी वर्णकों के तीन समूहों को नियंत्रित करने वाले वंशाणुओं का पता चल गया है, इसलिए नीले गुलाब या सतरंगी गुलाब पैदा करना अब कोई कठिन काम नहीं रह गया है। शीघ्र ही बा़जार में ऐसे फूल आ जाएंगे, जिनमें प्रत्येक जन की पसंद के रंग होंगे। इसी आधार पर फूलों की आकृतियां भी बदली जा सकती हैं, जैसे – उनका आकार बड़ा या छोटा किया जा सकता है। उन्हें गोल या चौकोर या तिकोना या झुरमुटा बनाया जा सकता है। इस प्रकार प्रकृति से खिलवाड़ करना आगे चलकर क्या-क्या गुल खिलाएगा, इस बारे में जीनियागिरी के ये जादूगर चुप हैं। मसलन, पिटूनिया के पौधे में मक्का का वंशाणु डाला गया। इसमें नीले की बजाय नारंगी फूल आने लगे। यह वंशाणु एक प्रकार के रसायन स्विच का काम करता है, जो कोशिकाओं को आदेश देता है कि अब तुम फूल का रंग नीले की बजाय नारंगी कर दो। हाल ही में एक शोध अध्ययन में वैज्ञानिक ग्लोवर एवं मार्टिन ने फूलों की चमक और आकृति का संबंध परागण करने वाली मधुमक्खियों और तितलियों आदि से जोड़ा है। उनका कहना है कि फूलों की पंखुड़ियों पर पड़ी धारियां इन कीट-पतंगों को मकरंद तक पहुंचने का रास्ता बताती हैं। सफेद एवं हल्के रंग उन्हें आकर्षित नहीं करते। उन्हें भी चटख रंग भाते हैं। मधुमक्खियों की अलग-अलग रंग पहचान लेने की क्षमता से भी वैज्ञानिक चमत्कृत हैं। अपने पैरों और एंटीनाओं के स्पर्श से पंखुड़ियों के खुरदुरेपन एवं चिकनाहट में भेद करके मधुमक्खियां यह पहचान लेती हैं कि इस फूल में अच्छा मकरंद मिलेगा या नहीं।

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