अभिलाषा दुःखों का मूल है

नैतिकता उपदेश नहीं है और न ही दूसरों से की जाने वाली कामना या अभिलाषा है। अन्तर्मन नैतिकता की उर्वरा स्थली है। विचारों और आचरण की जैसी खाद आप उसमें डालेंगे, फलों का स्वाद वैसा ही होगा।

महा-पुरुषों ने नैतिकता युक्त आचरण को सीढ़ी की संज्ञा दी है। लेकिन सांप-सीढ़ी के इस खेल में जगह-जगह सांप बैठे हैं, जो डस रहे हैं और नीचे की ओर धकेल रहे हैं। हम उनसे मुकाबला करने का नैतिक साहस खो चुके हैं। भयभीत हैं, उदास, निराश और बूढ़ों की तरह साहस खोकर ऐसे कठिन संकट के दौर में हम अपने कर्त्तव्य की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख रहे हैं या फिर सिर्फ बातें करके हम अपने कर्त्तव्य का निर्वाह पूरा हुआ मान बैठे हैं।

एक बोध कथा है- गॉंव के लोगों ने एक कुआं खोदा और रात्रि में एक-एक लोटा दूध डालना तय किया। एक ने सोचा, अगर मैं दूध न डालकर पानी डाल दूं तो क्या अंतर होगा, जबकि गांव के दूसरे निवासी तो दूध डाल ही रहे हैं। दूसरे ने भी यही सोचा, तीसरे ने भी, चौथे ने भी, सभी ने यही सोचा। दूसरे दिन सुबह सभी ने देखा कि कुएँ में एक लोटा भी दूध नहीं डाला गया था।

हम दूसरों की चिंता कर रहे हैं, दूसरों को कर्त्तव्य निभाने की सलाह दे रहे हैं। पर अपनी ओर नहीं देख रहे हैं। हम सभी को नैतिकता की इमारत गिरने का भय लगा हुआ है, क्योंकि नींव से ईंटें निकाली जा रही हैं। हम अपने आप से एक प्रश्र्न्न करें कि नैतिकता की इमारत को गिराने में हमारी कितनी भागीदारी है?

यदि समस्या है तो उसका उपचार भी है। हर व्यक्ति के अपने अनुभव होते हैं। क्या हम नैतिकता का क्षरण रोकने के लिए अपने अनुभवों से कोई सार्थक पहल नहीं कर सकते?

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत, यह शाश्र्वत सत्य है। हमारा मन व्यर्थ की व्याख्याओं में उलझा रहता है। समाधान तर्क नहीं, समाधान विश्र्वास है। मनुष्य बहुत हिसाबी-किताबी होता है। परमात्मा के प्रति भी वह मनुष्यों का-सा व्यवहार करने लगता है।

परमात्मा को लालच में नहीं फंसाया जा सकता। परमात्मा के साथ व्यापार नहीं हो सकता। सवा किलो प्रसाद बोलकर अपनी सारी अभिलाषाएँ, कामनाएँ ईश्र्वर की चौखट पर नहीं पायी जा सकतीं।

परमात्मा के आशीर्वाद का आनन्द समर्पण में है, कठिन नहीं, सहज और सरल होने में है। अहंकार के घाव से रिसने वाली पीव बदबू देती है। विचारों की पवित्रता वह सुगंध है, जिससे परिचय हो जाने पर प्रदर्शन खो जाता है।

एक बार स्वामी रामतीर्थ प्रयाग गये। गंगा के किनारे अक्षयवट के फूले-फले विस्तार को देखा तो आनन्द-विठल हो नाचने लगे। और भी कई लोग थे। स्वामीजी के इस आनन्दातिरेक को देखकर वे लोग खड़े होकर स्वामीजी की जय-जयकार करने लगे।

उन्हें संबोधित करते हुए रामतीर्थ बोले, “”कैसा भव्य रूपक रचा है हमारे पूर्वजों ने अक्षयवट के रूप में। ऋचाएँ कहती हैं, यह अक्षयवट ही धरती के बेटे मनुष्य का रूपक है। इसकी जड़ें सात समन्दरों का जल लाकर इसे सींचती हैं, किन्तु इससे वट को तृप्ति कहॉं। भौतिक जल से उसकी प्यास कैसे बुझती? इसलिए आप देखते हो न कि चेतना की सैकड़ों शिराएं वह जल खोजने को भेजता है। देख ही रहे हो कि और भी कई नयी-नयी शिराएं धरती की ओर बढ़ रही हैं, किन्तु वट की अतृप्ति कम होगी क्या? जिस दिन कम हो जाएगी, वट छीजने लगेगा, अक्षय नहीं रहेगा।”

हम सबकी भी यही नियति है। जब चेतना की प्यास जाग जाती है, तब किस-किस पनघट पर जाकर वह अपने घड़े नहीं भरती।

शेक्सपियर का कथन याद आता है – “”अपराधी मन संदेह का अड्डा होता है।” और गांधीजी के अनुसार, “”अपराधी मन चेहरे पर उभर आता है। जब हमें अपने ही प्रति किये गये अपराध का बोध होता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।”

हमें मन में अभिलाषा जगानी होगी, अपने आपको जानने की अभिलाषा। बुद्घ के अनुसार अभिलाषा समस्त दुःखों का मूल है, किन्तु खलील जिब्रान के अनुसार मनुष्य अभिलाषाओं की ठीक से व्याख्या कर ले और अपने प्रति ईमानदार हो जाए, तो सभी अभिलाषाएँ पूर्ण होने लगती हैं। अभिलाषाओं का इंद्रधनुष हमारे जीवन में खुशियों के रंग बिखेर देता है, किन्तु तभी जब हम अपनी अभिलाषाओं को जानते हों। जो व्यक्ति अपने को नहीं जानता, वह अपनी अभिलाषाओं को क्या जानेगा? प्रसिद्घ बौद्घग्रंथ “धम्मपद’ का सूक्ति वाक्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, जिसने स्वयं को समझ लिया है, वह दूसरों को समझाने नहीं जाएगा।

– गणि राजेंद्र विजय

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