अहिंसा-दर्शन का सार

भगवान महावीर के जन्म के समय सामाजिक तथा राजनैतिक क्षेत्र बहुत ही संकुचित था। शूद्रों को पशुवत जीवन बिताना पड़ता था। नारियों की स्थिति भी बहुत दयनीय थी। हर अधिकार से वंचित उन्हें घर की चारदीवारी में बंद रहना पड़ता था। समाज में भेदभाव की स्थिति बनी हुई थी। यज्ञ करने का अधिकार समाज के प्रतिष्ठित लोगों को था। मूक पशुओं की बलि दी जाती थी। अधर्म, अंधश्रद्घा और रूढ़िवादी परम्पराओं को पोषण मिल रहा था।

राजकुमार वर्धमान का मन वीतरागी हो उठा। उस समय उनके मातृकुल एवं पितृकुल दोनों में ही गणतंत्रीय लोकतंत्र का वातावरण था। इसका प्रभाव उनके जीवन तथा चिंतन पर पड़ा। उन्होंने सोचा कि संपूर्ण विश्र्व को विनाश से बचाने का एकमात्र उपाय अहिंसा है। अपना राज-पाठ, सुख-वैभव सबको तिलांजलि देकर वे मानव के कल्याणार्थ अहिंसा के मार्ग पर निकल पड़े। अब वे महावीर कहलाने लगे। उन्होंने अहिंसा को केवल भौतिक अहिंसा तक ही सीमित न रखकर उसे बौद्घिक या वैचारिक अहिंसा के स्तर पर प्रतिष्ठित किया। जब तक मनुष्य के विचारों में अहिंसा नहीं आएगी तब तक वह भौतिक अहिंसा को मूल्य नहीं दे पाएगा।

भगवान महावीर ने हमें एक संदेश दिया, “”तिन्नाणं तारयाणं” अर्थात् पहले स्वयं तिरो, फिर दूसरों को तारो। अहिंसा सब जीवों का कल्याण करने वाली है। हिंसा का अर्थ ही है किसी को दुःख पहुंचाना। उन्होंने कहा, “”किसी भी जीव का वध मत करो, उसे कष्ट मत दो, कभी मत सताओ, उसमें आधि-व्याधि उत्पन्न करने वाले आचरणों से सदा दूर रहो। उसे अधीन या दास मत बनाओ। यही ध्रुव धर्म है। यही शाश्र्वत सत्य है।” महावीर अहिंसा के प्रचारक हुए। उनकी शिक्षा मानव जाति को निरंतर शांति तथा जीयो और जीने दो का संदेश दे रही है।

भगवान महावीर ने कहा, “”अहिंसा सब जीवों का कल्याण करने वाली है। हिंसा का मुख्य कारण है-परिग्रह। अपरिग्रह के बिना अहिंसा की कल्पना नहीं की जा सकती। इच्छा का परिमाण करो। अपरिग्रह परमो धर्मः से ही अहिंसा की स्थापना संभव है। इस उपभोक्तावाद में सभी वस्तुओं का संग्रह या परिग्रह करने की होड़ लगी है। उन्होंने परिग्रह को सभी पापों की जड़ बताते हुए कहा, “”मनुष्य परिग्रह के लिए हिंसा करता है, संग्रह के निमित्त ही झूठ बोलता है और इसी अभिप्राय से चोरी के कार्य करता है। परिग्रह लिप्सा सबसे बड़ा पाप है और वह छिद्र है, जिसके कारण मध्यम से शेष चार पाप हमारे जीवन में प्रवेश कर जाते हैं और पाप का रिसाव होने लगता है।”

आज उग्रवाद, अलगाववाद एवं आतंकवाद की अमानवीय हिंसक ाूर गतिविधियों से विश्र्व में अशांति व्याप्त हो गई है। विश्र्व के विभिन्न देशों में अधिकाधिक शस्त्रास्त्र एकत्र करने की होड़ चल रही है। यह होड़ विश्र्व शांति के लिए मुख्य बाधा है। इसलिए निःशस्त्रीकरण आवश्यक है, जिसका अर्थ है-संहारक अस्त्र-शस्त्र के दुरुपयोग को रोकना। भगवान महावीर ने कहा है, “”शस्त्रों की होड़ कभी भी अभीष्ट परिणाम नहीं दे सकती। अहं के नशे में आतंक मत फैलाओ, प्राणी-मात्र में भेदभाव उत्पन्न कर शत्रुता की दीवारें मत खड़ी करो।”

विश्र्व के धर्मों ने अहिंसा के पालन पर जोर दिया है। भगवान महावीर ने कहा है, “”धर्म उत्कृष्ट मंगल है। अहिंसा संयम है और तप उसके लक्षण हैं, जिसका मन सदा धर्म में रमता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।” अहिंसा, समता, समस्त जीवों के प्रति समादर के भाव पर उन्होंने जोर दिया है। उनका कथन है कि “”किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो। “”सव्वेजीवा न हंतव्य” अर्थात अहिंसा विश्र्व का प्राण है। उन्होंने उद्घोष किया, “”सव्वेसि जीवियं पीयं” अर्थात् सबको अपना जीवन प्रिय है, मरना कोई नहीं चाहता, अतः हिंसा महापाप है।

भगवान महावीर वसुधैव कुटुम्बकम और विश्र्व शांति, अहिंसा के संदेश से प्रतिष्ठित करना चाहते थे। उनका कथन था – “”जिसे तुम मारना चाहते हो, अधीन करना चाहते हो, शत्रु मानते हो, वह तो तुम स्वयं हो। इस विराट विश्र्व में तुमसे परे तुम्हें सुख-दुःख प्रदाता और उत्तेजक और कोई नहीं है।” महावीर का अहिंसा-दर्शन मानवतावादी है।

भगवान महावीर के अहिंसा दर्शन का सार है, “”वैर से वैर वर्धमान होता है। घृणा से घृणा की परम्परा गतिमान होती है। शस्त्रों की प्रतिस्पर्धा निर्माण से शत्रुता पैदा होती है।” हिंसा की तलवार मैत्री एवं अहिंसा के बल पर झुक सकती है। भगवान महावीर के सिद्घांत आज के इस आणविक युग में उपयोगी, सार्थक, सार्वजनिक और सार्वकालिक हैं।

– लक्ष्मी रानी लाल

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