आर्थिक-सामाजिक समस्या है वेश्यावृत्ति

वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे प्राचीन व्यवसाय है। विश्र्व में भारत, चीन व मिस्र की सबसे प्राचीन माने जानी वाली संस्कृतियों में भी इसको सामाजिक मान्यता प्राप्त थी। जातक कथाओं में भी काली, सामा व सुलसा गणिकाओं का वर्णन है। ये इस पेशे के जरिये पॉंच सौ कार्षापण रोज कमाती थीं। महावग्ग में सालवती व आम्रपाली का वर्णन है। विडम्बना यह है कि फिर भी इन्हें नीच, पतिता व निकृष्ट कहा जाता है जबकि इन्हीं के पास मनुष्य बड़े उत्साह से अपनी भूख लेकर जाता रहा है। इसमें दो राय नहीं कि जब तक जीवन है, मानव है, तब तक यह व्यवसाय जारी रहेगा। क्योंकि यह मानव की आवश्यकता है और सच यह भी है कि इसका जनक भी मानव ही है। राष्टीय यौन रोग नियंत्रण कार्याम का सर्वे भी इसकी पुष्टि कर चुका है कि मानव ही अपने स्वार्थ के लिए लड़कियों-बच्चियों को इस व्यवसाय में धकेलता रहा है। इस संदर्भ में आज से करीब साढ़े चार दशक पूर्व लखनऊ के झण्डेवाला पार्क में आयोजित वेश्याओं के राष्टीय सम्मेलन में हैदराबाद की एक वेश्या के कथन का उल्लेख करना यहॉं उचित होगा। उसने कहा था कि- “समाज हमें घृणा, तिरस्कार व उपेक्षा से देखता है जबकि असलियत में हम जो समाज की सेवा करती हैं, यदि वह न करें, तो हर गली-कूचे में अऩारकली फैल जायेगी और लोग मॉं, बहन, बेटी का भेद करना भूल जायेंगे। हम समाज, परिवार यहॉं तक कि पत्नी से पीड़ित-दुःखी-उपेक्षित लोगों को जो हमारे पास आते हैं, राहत देती हैं। सुख देकर दुःखों को भूलने में मदद करती हैं ताकि वे परिवार के दायित्व को अच्छी तरह निबाह कर बेहतरीन जिंदगी गुजार सकें। इतना सब करने के बाद भी समाज हमें जीने नहीं देता, हमें नीच और हमारे पेशे को अऩैतिक कहा जाता है। इसमें हमारा कसूर क्या है? कोई यह तो हमें बताये।’ दुःख तो इस बात का है कि आज तक इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।

गौरतलब है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दिये जाने का सवाल काफी लम्बे अरसे से बहस का मुद्दा बना हुआ है। सरकार वेश्यालय जाने वालों पर दंड स्वरूप 50 ह़जार रुपये जुर्माना लगाने और उन्हें जेल में बंद करने पर विचार कर रही है। उसका मानना है कि इस तरह वह वेश्यावृत्ति रोकने में कामयाब होगी। विडम्बना यह है कि केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी द्वारा संसद में प्रस्तुत अनैतिक गतिविधियां निरोधक संशोधन कानून में शामिल इस प्रावधान का सरकार के बाहर तो विरोध हो ही रहा है, उसका अन्दर भी व्यापक विरोध है। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार व एशिया पैसिफिक एरिया में बने न्यूटल कमीशन के सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली कमेटी की एचआईवी पर जारी स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि एशिया में एड्स का वायरस पुरुषों द्वारा सेक्स हेतु पैसा देने की प्रवृत्ति के चलते बड़ी ते़जी से बढ़ रहा है। आज हालत यह है कि साढ़े सात करोड़ के करीब पुरुष वेश्याओं से शारीरिक संबंध बनाते हैं और एक करोड़ से ज्यादा महिलाएं इस धंधे में शामिल हैं। यदि इस सरकारी योजना को संसद की मंजूरी मिल जाती है, फिर भी खुलेआम न सही गुपचुप तरीके से यह पेशा जारी रहेगा और एड्स संामण रोक पाने का सरकार का सपना सपना ही रह जायेगा।

दरअसल वेश्याओं की मांग है कि “उन्हें कानूनी अधिकार मिले, उनके साथ जोर-जबरदस्ती-अत्याचार न हो। हम पैसे के बदले शरीर बेचती हैं, इसलिए इसे व्यवसाय का दर्जा और हमें श्रम का अधिकार मिले। 18 साल से कम उम्र की बच्ची-लड़की इस पेशे में न लायी जाये। संप्रग सरकार की शुरुआत के समय महिला व बाल विकास राज्यमंत्री कांति सिंह ने वेश्याओं को लाइसेंस देने की मांग की थी। इससे उन्हें जहॉं पुलिसिया आतंक और शोषण से निजात मिलेगी, वहीं समाज में समानता के अधिकार के साथ जीकर अपनी संतानों को राष्ट की मुख्य धारा में लाने में समर्थ होंगी। लेकिन आज तक यह मुद्दा संसद में विचार के लिए नहीं उठा और न इस पर मत्रिमंडलीय समिति में विचार ही हुआ। इसे बढ़ाने में हमारी सामाजिक संरचना, गरीबी, पुलिस-प्रशासन, व्यवसायी-ठेकेदार-अभिजात्य वर्ग और नेताओं की अहम भूमिका है। आज यह धंधा इस पेशे के लिए आरक्षित क्षेत्र विशेष की सीमा-रेखा लांघकर पॉंच-सितारा होटलों, पॉश कॉलोनियों, फार्म हाउसों, फ्लैटों, ब्यूटी व मसाज पॉर्लरों, पार्कों, बंद पड़े स्कूलों और गली-कूचों तक पहुँच गया है। अब यह पहचान कर पाना कठिन है कि किस घर में यह धंधा हो रहा है?

नेशनल एड्स कंटोल आर्गेनाइजेशन (नाको) के महानिदेशक के. सुजाता राव की राय है- “सरकारी सख्ती इस पेशे को रोक नहीं पायेगी और यह जहॉं गुपचुप तरीके से और ते़जी से होने लगेगा, वहीं एड्स संामण रोक पाना सरकार के बूते से बाहर होगा। स्वीडन का उदाहरण प्रमाण है कि वहॉं रोक के बावजूद यह व्यवसाय रुका नहीं और जिन वेश्याओं को रोकने का प्रयास किया गया, वे नार्वे में जाकर पेशा करने लगीं। चूंकि पेड सेक्स की हमेशा मांग रहेगी, इसलिए सप्लाई का जरिया भी निकाल ही लिया जायेगा। पुरुषों को दंडित कर इसे रोकने की यह सरकारी योजना कारगर नहीं होगी।’ नब्बे के दशक में संयुक्त राष्ट मानवाधिकार आयोग के विशेषज्ञ दल की ओर से जिनेवा में 12वीं अंतर्राष्टीय एड्स कांग्रेस में इस पेशे में ते़जी से हो रही बढ़ोत्तरी पर अंकुश लगाने की दुनिया के देशों से अपील की गई थी। शायद उसका असर हमारी सरकार पर अब हुआ है और वह इस व्यवसाय को जुर्मना लगाकर व ऐसे लोगों को जेल भेज कर रोकना चाह रही है। जबकि यह सच है कि हजारों सालों से चले आ रहे इस पेशे को खत्म नहीं किया जा सकता। इस बारे में केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस का कहना है- “जब तक इनसान है, देह व्यापार चलता रहेगा। इसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता।’ बाइबिल में भी इसका उल्लेख है। मैंने तो जिस दिन सी. रंगराजन ने यह रिपोर्ट पेश की थी, उसी दिन देह व्यापार को कानूनी वैधता दिए जाने की बात कही थी। आज ़जरूरत है कि समाज में सुधार किया जाये न कि देह व्यापार खत्म करने की दिशा में इस तरह की कोशिशें की जायें।’ इसमें दो राय नहीं कि आज यह व्यवसाय आर्थिक-सामाजिक समस्या का रूप ले चुका है। वेश्याएं भी समाज का अंग हैं। अतः उन्हें भी हर क्षेत्र में समान हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। इनकी चिकित्सा, पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन व जीवन स्तर में सुधार का दायित्व समाज व सरकार का है। तभी वे और उनके बच्चे राष्ट की मुख्य धारा में शामिल होकर विकास में सहभागी हो सकेंगे। अमेरिका, ाांस, हांगकांग, ग्रीस और नीदरलैंड की तरह इस पेशे को मान्यता देना समय की मांग है। इसे मान्यता देने से एड्स पर भी अंकुश लग सकेगा, यह सरकार को समझना होगा। इससे इन्हें नीदरलैंड की तरह आयकर देना पड़ेगा और ग्रीस की तरह हर सप्ताह अपने स्वास्थ्य की जांच करवानी होगी। यदि सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो इसमें संदेह नहीं कि भविष्य में कुलीन घरानों या मध्यम वर्ग की महिलाओं द्वारा अपने पतियों से संतुष्टि न मिल पाने के कारण दिनोंदिन बढ़ती पुरुष वेश्याओं की मांग से उपजी समस्याओं से भी उसे दो-चार होना पड़ेगा। अब सरकार के ऊपर है कि इस दिशा में क्या कदम उठाती है? वैसे समाज के किसी भी वर्ग और सामाजिक संस्थाओं ने इस पेशे को मान्यता दिये जाने का विरोध नहीं किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज की मानसिकता बदल रही है और उसे इस पर कोई एतराज नहीं है। फिर सरकार का इस सवाल पर मौन और इसे रोकने की दिशा में ऐसे प्रयास का मतलब समझ नहीं आता कि वह वास्तविकता को नकार कर समस्या के समाधान से मुंह मोड़, इतनी बड़ी आबादी वाले तबके के भविष्य के साथ खिलवाड़ क्यों कर रही है?

– ज्ञानेन्द्र रावत

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