आस्था या करिश्मा कुदरत का

aastha-ya-karishma-kudrat-kaअमवां की सती का स्थान! चबूतरे के पास मरणासन्न अवस्था में कई पुरुष! महिलाएं व बच्चे, जिन्हें क्षेत्र के दूरदराज स्थानों पर सांपों ने डंस लिया था। कुछ के हाथ सांपों के रेंगने जैसे अंदाज में हिल रहे थे, अचानक एक 12 वर्षीय लड़का अंग़डाई लेते हुए उठ बैठा और फिर अपना माथा पटक दिया, परिजनों में खुशी की लहर जाग उठी। सती माई की जय-अमवां की सती माई की जय के उद्घोष के साथ परिजन उसे कुछ समय बाद उठाकर घर ले गये।

यह किसी टी.वी. सीरियल का अंश या किंवदंती नहीं है। यह सत्य घटना है, इसे आप क्या कहेंगे- आस्था या करिश्मा कुदरत का? जी हां! इसमें आस्था के साथ करिश्मा कुदरत का भी है। उ.प्र. के पूर्वी जनपद बलिया के कोटवारी गांव निवासी मुन्नू गोड़ का बारह वर्षीय पुत्र सुनील अपनी दादी के साथ बगल के गांव डेहरी से आ रहा था। लघुशंका की शिकायत पर पास गन्ने के खेत की ओर जा रहा था कि उसके पैरों में गेहुंवन (कोबरा) सांप आकर लिपट गया।

इस पर सुनील शोर मचाने लगा और सांप को पैर से हटाने लगा। इस बीच सांप ने उसे कई जगह काट लिया। परिजन आस्था के चलते आनन-फानन में उसे अमवां की सती माई के स्थान पर ले गये। सांप का जहर उतरने के बाद परिजन उसे घर ले गये। आज सुनील एकदम भला-चंगा है।

उ.प्र. के पूर्वी जिला बलिया के रसड़ा तहसील से बारह किलोमीटर दूर बलिया-गाजीपुर सीमा पर स्थित अमवां गांव की सतीमाई सर्प के जहर का नाश करने वाली मानी जाती हैं। जनपद गाजीपुर के बाराचंवर इलाके में पड़ने वाले अमवा में स्थित सती माई का दरबार इस वैज्ञानिक युग में झुठलाने वाला है। सर्पदंश से मुक्ति पाने के लिए इस स्थान पर न केवल पास-प़डोस के जनपदों से बल्कि अन्य प्रदेशों से पी़डित आते हैं और मुस्कुराते हुए जाते हैं।

यहां आने वाले श्रद्घालुओं, प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय दुकानदारों की मानें, तो यहां पर कई सर्पदंश पी़डितों को जीवन-दान मिल चुका है। देश के अन्य देवी मंदिरों की भांति यहां पर भी चैत्र और आश्र्विन (क्वार) की नवरात्रि में श्रद्घालुओं का पूजा-पाठ के लिए तांता लगा रहता है।

सती माई को लेकर इलाके में एक किंवदंती प्रचलित है, जिसे बड़े-बुजु़र्गों के मुख से आज भी सुना जाता है, जिसके अनुसार अमवां सिंह गांव के परमल सिंह की शादी बलिया जनपद के दौलतपुर गांव में हुई थी। विदाई कराकर अपनी पत्नी को लेकर वह गांव चले आये। अभी सुहागरात भी नहीं हुई थी। वह अपने खेत की तरफ घूमने गये तो रास्ते में ही उन्हें सांप ने डस लिया। फलस्वरूप परमल सिंह की मौत हो गयी। यह खबर उनकी पत्नी को मिली तो वह रोती-बिलखती शव के पास गयी और दहाड़ें मार कर गिर पड़ी और शरीर का त्याग कर दिया। उस वक्त सती का पता नहीं चल सका। अब वह स्थान अमवां की सतीमाई के नाम से चर्चित हो गया।

बुजु़र्गों ने बताया कि काफी दिन बीतने के बाद एक चरवाहा गाय चरा रहा था। उसी दौरान उसे सर्प ने डस लिया। वह अपने घर की ओर भागा जा रहा था, किंतु जैसे ही सती माई का स्थान आया तो वह वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ा। यहां गिरने के कुछ समय बाद सर्प का जहर खत्म हो गया और जीवित होकर भला-चंगा हो गया। कहते हैं कि उसके लौटने के बाद यह चर्चा चारों तरफ फैल गयी और सर्पदंश से पी़डित यहां आकर सर्पदंश के जहर से मुक्ति पाने लगे।

मंदिर के पुजारी अंजनी सिंह सर्पदंश के जहर से मुक्ति पा चुके तमाम लोगों के साक्षात गवाह हैं। यहां प्रत्येक सोमवार और शुावार को भक्तों का हुजूम अपनी मन्नतें पूरी होने पर पूजापाठ करता है।

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