इंटरनेटिया भाषा के अनोवे रंग

परेशान न हों, यह किसी सभ्यता का शिलालेख नहीं है, न ही इसमें किसी खजाने का राज ही छिपा है। यह इंटरनेट से जन्मी भाषा है। जिसका उपयोग दुनियाभर में जम कर हो रहा है। भाषा पर मनमानी से कुढ़ने वाले इसे युवाओं का बचपना बता रहे हैं लेकिन जिस ढंग से इसकी जड़ें गहरी होती जा रही हैं, उससे जाहिर है कि कुरमुरी भाषा का ककहरा कहीं दूर तक लिखा जाना बाकी है।

दरअसल, यह चैट रूमों से उपजी भाषा है। इसमें कोरियाई युवकों से लेकर भारत के इंदौर जैसे शहरों के किशोर तक शामिल हैं। अब यह भाषा दुनिया में समझी जाने लगी है। इसके कुछ अपने फंडे हैं –

  • शब्द अपने उच्चारण की तरह लिखा जाए।
  • ज्यादा बोल-चाल वाले शब्दों/ वाक्यों को बहुत ही संक्षेप में लिखा जाए।
  • जिन वाक्यों में भाव प्रकट होते हों उन्हें शब्दों के बजाए रेडीमेड चित्रों से व्यक्त किया जाए (इसकी सुविधा तमाम चैट रूमों में है)।

सारे शब्दों के विषय में आप नहीं भी जानते तो चिंता न करें, कुछ दिनों में आपके चैटिया दोस्त आपको इसकी टेनिंग दे देंगे।

इस भाषा के सभी आलोचक हों, ऐसा नहीं है। ई-मेल और चैट की प्रोग्रामिंग से जुड़े एक विशेषज्ञ का कहना है कि भाषा का मतलब है संप्रेषण यानी एक-दूसरे से कुछ कहने का माध्यम। इसका एक लक्षण यह भी है कि जिससे आप बतिया रहे हों, उसे आपकी बात समझ में आनी चाहिए। बात तुरत-फुरत हो, यह भी भाषा की विशेषता होनी चाहिए।

शब्दों को किस तरह से छोटा किया जा रहा है इसकी बानगी देखिए –

र/र जस्ट जोकिंग (मैं तो म़जाक कर रहा था)।

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इसी तरह एक लड़का टु बी ऑर नॉट टु बी को लिखता है- 2ं/-2ं और डायमंड्स आर फार एवर को……….. 4ी, बाई बाई बेबी को लिखा जाता है – ँँँ और यू आर एक्सीलैंट को ळ र्ेत्हू, “”मैं जल्दी ही लौट कर आपसे मिलता हूं” को लिखा जाता है, ँँ अर्थात बी राइट बैक। शब्दों का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। इसकी फेहरिस्त खासी लंबी है। नॉट टू मच को ह2स्, आर यू लेट को ल् थ्8 लिखना तो जैसे आम बात है।

इस भाषा की अपनी खासियत भी है। पहली बात तो यह कि यह किसी उबाऊ पाठ्याम का हिस्सा नहीं है, न ही कहीं से लादा गया है। यह युवाओं की चुहलबाजी से उपजी सहज भाषा है, जो धीरे-धीरे शब्दकोष बनता जा रहा है।

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