ईर्ष्या की अग्नि जला देती है मन

जिस प्रकार अग्नि लकड़ी को जला देती है, उसी प्रकार ईर्ष्या भी मनुष्य जीवन की सारी खुशी, सारे उमंग को जला देती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों के लिए तो क्या जी पायेगा, उसका सारा जीवन अपने लिए ही अभिशप्त हो जाता है।

वर्तमान युग में तो यह एक असाध्य रोग के समान फैल गया है। व्यक्ति को अपने हित या अहित का ध्यान नहीं रहता है। दूसरों को आगे बढ़ते देख, सम्पन्न देख, अपने से अधिक सफल देखकर वह मन ही मन अपनी तुलना उससे करने लगता है। उसे अपना जीवन अंधकारपूर्ण प्रतीत होने लगता है। यह इस स्थिति को प्राप्त हो गया और मैं क्यों नहीं हुआ। बस, यही सोच उसके भीतर ईर्ष्या की अग्नि को प्रज्वलित कर देती है।

कुछ लोगों की यह आदत बन जाती है या यूं कहिए कि एक प्रकार का मानसिक रोग हो जाता है। किसी पड़ोसी ने चार मंजिल मकान बनवाया तो वे भी फटाफट बनवाने लगेंगे। अब भले ही उन्हें मकान की चार मंजिलों की आवश्यकता हो या न हो। किसी ने बड़ी गाड़ी खरीदी तो हम भी मारुति छोड़कर बड़ी गाड़ी लेंगे। चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों न उठाना पड़े। कपड़े, जेवर के पीछे तो महिलाओं की ईर्ष्या सारी सीमाएँ पार कर जाती है।

दरअसल, ईर्ष्या एक ऐसी घुटन है, जो व्यक्ति के जीवन का सारा रस सोख लेती है। ईर्ष्या के साथ-साथ ाोध, शक और संशय के बीज भी फूट पड़ते हैं। व्यक्ति का चिंतन भी विषाक्त हो उठता है। उसके समूचे व्यक्तित्व से यह विष छलकता रहता है। दूसरे की उन्नति, दूसरे की लोकप्रियता, दूसरे की प्रतिष्ठा को ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी भी प्रेरणा के समान ग्रहण नहीं करता।

किसी को पदोन्नति मिली है या कोई पुरस्कार मिला है तो इसके पीछे उस व्यक्ति की मेहनत और योग्यता है, ये बात ईर्ष्यालु लोगों की समझ में नहीं आती। ईर्ष्यालु मनोवृति से किसी का भला नहीं होता। यह समूचे समाज के लिए अभिशाप है। अभी कुछ दिन पूर्व कथा के उपरान्त एक वृद्घ महिला मुझसे आकर मिली। उनके साथ उनकी पुत्री थी। पुत्री विवाहित थी, लेकिन उसके पति ने उसे छोड़ दिया था। कारण बड़ा विचित्र था।

जब विवाह हुआ तो पता चला कि ससुराल वाले काफी अमीर थे, लेकिन पति कोई खास पढ़ा-लिखा नहीं था। इधर इनकी पुत्री उच्च शिक्षा प्राप्त थी और नौकरी भी कर रही थी। आयु अधिक होने के कारण विवाह का समय हाथ से निकलता जा रहा था। यही सोचकर इस कन्या का विवाह कर दिया गया।

आरंभ में तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा, लेकिन धीरे-धीरे शिक्षित पत्नी के आगे पति के हृदय में हीनभावना घर करती गई। विद्या के सामने पैसे का गुमान कब तक टिकता। फिर पत्नी की पदोन्नति से तो हालात ज्यादा खराब हो गये। पति के अहम् को पत्नी की उच्चशिक्षा के साथ-साथ उसकी नौकरी चोट पहुँचाने लगी। ईर्ष्या की आग बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ी कि बात तलाक तक जा पहुँची। उस लड़की ने समझौते के तौर पर अपनी नौकरी भी छोड़ दी, लेकिन पति के मन में धधकती ईर्ष्या के आगे उसका यह समर्पण कुछ काम नहीं आया। उसकी पढ़ाई को लेकर बात-बात पर ताने कसे जाते, उसे घमंडी, तुनकमिजाज और भी न जाने कितनी न कहने योग्य बातें कहीं जातीं। तंग आकर वह लड़की अपने पितृगृह वापस लौट आयी। दोबारा आवेदन करने पर उसे नौकरी तो मिल गयी, लेकिन पति की ईर्ष्या के कारण को वह अब तक नहीं समझ सकी। उसने मुझसे कहा, “”महाराजश्री, मैं इतनी पढ़ी-लिखी हूँ, ये बात तो मेरे पति और उसके घरवालों को पता थी। फिर मेरा कसूर क्या था?”

अब कसूर अगर किसी की ईर्ष्या में जड़ बना ले तो कोई क्या कर सकता है? व्यक्ति चाहे तो दूसरों को सफलता की राह पर आगे बढ़ते देखकर प्रेरणा ले सकता है। अपना जीवन भी सुधार सकता है और जो लोग ऐसा करते हैं, वे अपने जीवन में फूलों की बगिया लगा लेते हैं जिनकी सुगन्ध से उनका जीवन महक उठता है लेकिन जो ईर्ष्या का दामन थामते हैं, उनका खुद का जीवन तो नारकीय बन ही जाता है साथ ही वे दूसरों की जिन्दगी का स्वाद भी कसैला कर देते हैं।

ईर्ष्या से सिर्फ नुकसान होता है। लाभ की न तो गुंजाइश होती है और न ही संभावना। व्यक्ति अपने पतन के साथ-साथ दूसरों को भी नीचे धकेल देता है। इस मनोवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि कब उनका स्वयं का सर्वनाश हो गया। कब वे दूसरों से, समाज से कट गये।

ध्यान से देखना, जो लोग इसके अधिक शिकार होते हैं, समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी नहीं रहती। भद्र पुरुष ऐसे व्यक्तियों से सदा दूर ही रहते हैं। ईर्ष्या के कारण ही व्यक्ति सदा निन्दा रूपी पाप में निमग्न रहता है। उसकी सारी ताकत सही को गलत साबित करने में लग जाती है और अन्ततः ऐसा व्यक्ति अपने शरीर को रोगी बना डालता है।

सारी जिंदगी दूसरों की खुशी से जलने वाला, दूसरों की तरक्की से घृणा करने वाला अपने लिए एक टुकड़ा संतोष या खुशी की प्राप्ति नहीं कर सकता।

उसकी जलन धीरे-धीरे एसिडिटी में बदल जाती है, असमय ही वृद्घावस्था घेर लेती है और फिर हृदयरोग बिना किसी निमंत्रण के आकर विराजमान हो जाता है।

इसलिए अगर आपके भीतर भी यह प्रवृत्ति है तो इससे उबरिये। इसकी जड़ों को काट डालिए। परमात्मा ने इस मानव शरीर को देकर जो उपकार किया है, उसके लिये नतमस्तक होकर प्रभु का धन्यवाद करिये। ये संसार परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ सृजना है। यही क्या कम है कि आप भी इसके अंग हैं। आप भी इस दुनिया का हिस्सा हैं।

जिस हाल में परमात्मा ने रखा है, उसमें संतुष्ट रहने का भाव आपके जीवन को अशांत नहीं होने देगा। आगे बढ़ो, तरक्की करो, अच्छी बात है। लेकिन दूसरों की उन्नति देखकर अपने हृदय को ज्वलनशील बना लेना ठीक नहीं है। एक गीत की पंक्तियां मुझे बड़ी अच्छी लगती हैं, “”कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमान नहीं मिलता।” तो बस ईर्ष्या को हृदय से निकाल फेंकिये और मस्त रहिए। प्रतिभाशाली व्यक्तियों के जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर आगे बढ़ने का सत्संकल्प लीजिए, तभी यह मानव-जीवन सार्थक होगा।

-श्री मृदुल कृष्ण महाराज

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