काछवो काछवी रहता समंद में दोनों हरि का दास भजन

काछवो काछवी रहता समंद में दोनों हरि का दास
दर्शन करवा निसरी यारे धार लियो विसवास
संता ने आवत जानीया रे पकड झोली में दालीया रे
तडप मत का छब कुडीरे सावरारी रिवा रूडी रे
भक्ति रा भैद भारी रे लके कोई संत मुरारी रे
संत जन कृपा करीरे भक्ता ने लिया उठाय
डेरा पर संत आवीया रे हाड़ी दिन्ही चढ़ाय
पकड़ हाड़ी में दाली थारे तले से आग लगाई रे
उठ तो बलु मैं बैठू तो बलु मैं लले लगाई आग
ओजू अलक आर्वीयो रे प्राण निसरीयो जाय
कटे सोरग प्राणी रे मोत वाली याही नीसानी रे
बल्ले है तो बैठ पीठ पर राखु प्राण आधार
निंदा मतकर नाथ की रे लागे कलेजे बाण
सांवरों आसी भारू रे आपा ने उबारण सारूरे
तिन लोकरा कृष्णरायजी बेगी सुनो पुकार
जलली अग्न महु उबारणो रे काच्छ बने किरतार
प्रभु जग हासी म्हारी रे प्रभु पत जासी थारी रे
पिछम धरासु उबारी यारे गहरा बादल चाय
तीन खुणारी झुपड़ी रे उड़ आकाशा जाय
धना धन इन्द्र गाजे रे पानी वाला पोटा बरसे रे
तीन लोक रा कृष्णरायजी बेगी सुनी पुकार
जलती अगन में उबारीया का छब ने किरनार
भजे भोजोजी बानी रे टीकम ने आय सुनानी

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