काबुल

kabul-cityकाबुल का नाम लेते ही जेहन में एक खौफनाक तस्वीर उभरती है। धूल भरी वीरान सड़कें, शहर के हर कोने में मौजूद खंडहर, दहशत़जदा लोग और गश्त लगाते अमेरिकी सैनिक। काबुल की छवि एक युद्घग्रस्त शहर की है। जहां हर पल ़खतरा मौजूद है। जहां जंग में स्थानीय कबीले हमेशा उलझे रहते हैं।

लेकिन काबुल हमेशा से ऐसा नहीं रहा। काबुल दक्षिण एशिया के सबसे प्राचीन और कभी सबसे व्यवस्थित शहरों में से एक था। काबुल अकेला शहर है, जिसका जिा ऋग्वेद में मिलता है। फारसी में काबुल को काबोल बोलते हैं। यह अफगानिस्तान की राजधानी होने के साथ-साथ देश का सबसे बड़ा शहर है। समुद्रतल से 6,900 फिट ऊपर बसे काबुल शहर से होकर काबुल नदी बहती है। काबुल अफगानिस्तान के लगभग केन्द्र में है। यह देश का सांस्कृतिक और आर्थिक केन्द्र भी है। काबुल शहर त्रिकोणीय घाटी में बसा है। दो पर्वत श्रृंखलाओं अस्माई और शेर्दवाजा के बीच काबुल सड़क-मार्ग के जरिए अफगानिस्तान के दूसरे हिस्सों से जुड़ा हुआ है। इसके उत्तर में उजबेकिस्तान और पूर्व में पाकिस्तान है।

काबुल का आस्तत्व 3,500 हजार साल से है। ऋग्वेद में काबुल का जिा है। ऋग्वेद ईसा पूर्व 1500 में लिखा गया था। सिर्फ वेदों में ही नहीं अलैकजेंडरिया के भूगोलवेत्ता और ज्योतिषविद पोटलेमी ने भी काबुल का जिा किया है, दूसरी सदी में। काबुल के उत्तर में हिंदूकुश पर्वत है और दक्षिण में गजनी शहर स्थित है। यह भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाले खैबर दर्रे से होकर भारत आने वाले विभिन्न आामणकारियों के रास्ते में पड़ता रहा है। काबुल पहली बार स्थानीय सरकार का केन्द्र 8वीं शताब्दी में बना। 13वीं शताब्दी में जब मंगोल आाांता चंगेज खान ने काबुल में प्रवेश किया, तो उसने काफी हद तक शहर को तहस-नहस कर दिया। काबुल मुगल वंशों की भी राजधानी रहा है। सन् 1504 से 1526 तक यह मुगल शासक बाबर के अधीन रहा और इसके बाद अलग-अलग मुगल शासकों ने इस पर सन् 1738 तक शासन किया। इसके बाद ईरान के नादिरशाह ने इस पर कब्जा कर लिया।

अहमद शाह दुर्रानी ने सन् 1747 में पृथक अफगानिस्तान राज्य की स्थापना की और सन् 1776 में काबुल अफगानिस्तान की राजधानी बना। उन्हीं दिनों पहला अंग्रेज अफगान युद्घ हुआ। अंग्रेजों ने यहां सन् 1842 में जबर्दस्त कत्लेआम किया। उसके बाद उस पैमाने पर मार-काट का सिलसिला एक नये अफगान युद्घ के दौरान सन् 1978 में देखा गया, जब सोवियत सेनाओं ने सन् 1979 में अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। सोवियत संघ ने अपनी मदद से यहां एक कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित की, लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं चल सकी। 1980 की शुरूआत में सोवियत संघ ने हवाई जहाजों के जरिए अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में बड़े पैमाने पर सैनिकों को उतारा। काबुल और उसका हवाई अड्डा सोवियत सेनाओं के कब्जे में आ गया। लेकिन जल्द ही सोवियत संघ की सेनाओं को अंदाजा हो गया कि उन्होंने गलत शिकार चुन लिया है। बहरहाल, गुरिल्ला प्रतिवाद से परेशान होकर अंततः सोवियत संघ की फौजें सन् 1989 में वापस लौट गईं।

लेकिन 90 के दशक में सत्ता हस्तांतरण को लेकर काबुल फिर एक बार खूनी जंग का मैदान बन गया। हजारों लोग मारे गए और आधी से अधिक आबादी शहर से पलायन कर गयी। उन दिनों शहर में तीसरी इमारत खण्डहर में तब्दील हो चुकी थी। एक जमाने का यह समृद्घ और खूबसूरत शहर इसके बाद भी गुरिल्ला दहशतगर्दी से मुक्त नहीं हुआ। सन् 1996 में एक नयी ताकत ने काबुल पर अपना कब्जा जमाया, जिसे दुनिया तालिबान के नाम से जानती है। तालिबान मिलिसिया ने काबुल पर अपना कब्जा कर लिया और इस प्यारे शहर को एक बार फिर नयी तरह की तहस-नहस का शिकार होना पड़ा। अभी यह तालिबानों के कहर से उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि सन् 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली फौजों ने काबुल पर धावा बोल दिया और एक बार फिर से शहर दहशतगर्दी का शिकार हो गया।

काबुल नयी और पुरानी इमारतों का खूबसूरत मिश्रण है। ध्वस्त पुराने शहर में बनी नयी इमारतें बीच-बीच में पुराने स्थापत्य का सुराग बताती हैं। तालिबान ने काबुल के इंफ्रास्टक्चर को थोड़ा सुधारा था और बाद में अमेरिकी आामण में वह ध्वस्त हो गया। काबुल में अब भी तमाम ऐतिहासिक स्मारकें हैं जिसमें कुछ मकबरे यहां के शासकों के हैं। इसके अलावा काबुल में कई बड़े बागीचे भी इन्हीं मकबरों के साथ मौजूद हैं। बाबर के मकबरे और उसके बागीचे के पास ही पुराना काबुल बसा है। यह इलाका शेर्दवाजा के पास है। बार अल अमन के इलाके में संसद और सरकारी विभाग की इमारतें स्थित हैं। एक विश्र्वविद्यालय भी है काबुल यूनिवर्सिटी, जिसकी स्थापना सन् 1932 में हुई थी। हालांकि इस विश्र्वविद्यालय के तमाम इंस्टीट्यूट और दूसरे संस्थान अफगानिस्तान में लंबे समय तक चले गृह-युद्घ के कारण तहस-नहस हो गए हैं, लेकिन अभी भी कई मौजूद हैं और कुछ ध्वस्त हो चुके इंस्टीट्यूट दोबारा से तैयार हुए हैं।

काबुल एक जमाने में औद्योगिक केन्द्र था। सूती कपड़ा, प्लास्टिक, चमड़ा, कांच और चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने के यहां तमाम कारखाने थे। यह कारोबार का भी गढ़ था। मगर लंबे समय तक चले गृहयुद्घ के कारण यहां का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया है। हालांकि अब फिर से खड़ा हो रहा है। काबुल के मौजूदा उद्योग-धंधों में फूड प्रोसेसिंग प्लांट्स, रेयान और ऊन की मिलें, फर्नीचर फैक्टरी, फाउंडरी और संगमरमर का काम काफी अच्छा है। काबुल की आबादी में सबसे बड़ी तादाद दारी यानी फारसी लोगों की है। हालांकि अफगानिस्तान में बड़ी तादाद पख्तून लोगों की है। काबुल की शहरी और उपनगरीय आबादी 35 लाख के आसपास है और मुख्य शहर की 8 लाख।

– पी.के. सिंह

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