किताब कोना

बिन्दु से सिंधु – बिंदू जी महाराज “बिंदू’

 

पुस्तक का नाम : योगीराज डॉ. बिंदूजी महाराज “बिंदू’

– सिंहावलोकन

लेखक : श्रीकांत पाण्डेय “पियूष’

पृष्ठ संख्या : 40, मूल्य : 25 रुपये

प्रकाशन : आचार्य श्रीचंद्र कविता महाविद्यालय एवं

शोध संस्थान, 13-3-391, निर्वाण अखाड़ा

पुरानापुल, हैदराबाद – 500 006.

भारत भूमि संत-महंतों का देश रही है। संत चिंतन-मनन करते रहे और महंत धर्म की रक्षा करते हुए प्रचार-प्रसार में लगे रहे। समय के साथ महंतों ने अपने-अपने अखाड़े बना लिये।

सन् 1990 ई. में नासिक (त्र्यम्बकेश्र्वर) कुंभ का आयोजन हुआ था, जिसमें सह-प्रबंधक के रूप में युवा महंत बिंदूजी महाराज “बिंदू’ ने उत्साहपूर्वक जिम्मेदारी निभाई थी। यहॉं “बिंदूजी’ ने अपनी कर्मठता, वाक्पटुता, चिकित्सीय, व्यवहारिक एवं सामाजिक सेवा से अपनी अलग पहचान बनाई। यह वही “बिंदूजी’ हैं, जिन्हें आप हैदराबाद की सड़कों पर काला चोगा, काली पगड़ी, काला चश्मा और माथे पर काला तिलक धारण किए, हाथ की दसों उंगलियों में विभिन्न प्रकार के रत्नों जड़ित अंगूठियॉं पहने, अपनी एक अलग छवि में देखते हैं।

डॉ. बिंदूजी महाराज “बिंदू’ हैदराबाद के पुराना पुल स्थित निर्वाण अखाड़ा के महन्त हैं। इनके जुझारू जीवन की संक्षिप्त कथा उनके युवा शिष्य श्रीकांत पांडेय “पियूष’ ने “योगीराज डॉ. बिंदूजी महाराज “बिंदू’- सिंहावलोकन’ नामक एक छोटी-सी पुस्तिका में लिखी है। लेखक डॉ. बिंदूजी के बारे में बताते हैं कि उन्होंने सन् 1980 में मैहर, सतना के सिद्घ शारदा पीठाधीश्वर संत स्वामी नीलकण्ठजी महाराज (स्वामी नारायणदासजी उदासीन) का शिष्यत्व ग्रहण किया और परम्परानुसार ब्रह्मचर्य संन्यास का पालन किया। उन्होंने वाराणसी, कोलकाता, जबलपुर, मथुरा आदि स्थानों का भ्रमण किया तथा यहॉं के गुरुओं और मठाधीशों से मिलने और उनसे ज्ञान बटोरने का अवसर पाया – संस्कृत से लेकर चिकित्सा शास्त्र (आयुर्वेद आदि), तंत्र-मंत्र (शिव-शक्ति साधना, बंगालमुखी साधना, श्यामाकाली साधना, वाणी साधना आदि) तक अथवा जो कुछ भी शिक्षा-दीक्षा गुरुओं से मिली हो।

त्र्यम्बकेश्र्वर कुंभ की व्यवस्था में बिंदूजी के सिाय योगदान को देखते हुए उदासीन मठ, इलाहाबाद प्रधान कार्यालय ने यह निश्चित किया कि हैदराबाद के निर्वाण अखाड़ा को चुस्त-दुरुस्त करने का काम इन्हें सौंपा जाय। बिंदूजी ने अपनी सूझ-बूझ और वाक्पटुता का एक और उदाहरण देते हुए यहॉं की अराजक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया। उदासीन मठों में आज निर्वाण अखाड़ा अपना एक विशेष स्थान रखता है।

“बिंदूजी’ न केवल तंत्र-मंत्र के विशेषज्ञ हैं, अपितु हैदराबाद के हिन्दी जगत में वे आचार्य श्रीचन्द कविता महाविद्यालय एवं शोध संस्थान, हंस वाहिनी, हिन्दी साहित्यकार परिषद तथा हिन्दी हाइकु क्लब जैसी संस्थाओं का संचालन भी कर रहे हैं। उनके पचासवें जन्म दिवस पर हिन्दी प्रेमियों ने एक अभिनन्दन ग्रन्थ “फक्कड़ मसीहा’ नाम से प्रकाशित किया था।

इन्हीं सब जानकारियों को देने के लिए जब श्रीकांत पाण्डेय “पियूष’ ने एक लेख लिखने लिए कलम उठाई, तो उस जुझारू जीवन का लेख इतना लम्बा हो गया कि इसे पुस्तकाकार देने का निर्णय लिया गया। इस पुस्तिका के अंत में हैदराबाद के वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी बिंदूजी की जीवनी और लेखनी पर अपने विचार व्यक्त किये हैं।

कवि नरेंद्र राय “नरेन’ ने बिंदूजी महाराज “बिंदू’ की शख्सियत को अपनी कविता में यूँ समेटा है –

बिंदूजी महाराज को, कहते योगीराज।

परम स्नेही मित्र पर कवियों को है ना़ज।।

डॉक्टर, वैद्य और तांत्रिक, कवि लेखक श्रीमान।

बिंदु में सागर बसा, बीज में तरु समान।।

– चंद्र मौलेश्र्वर प्रसाद

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