कौंडण्यपुर : जहॉं से कृष्ण ने किया था रुक्मिणी का अपहरण

महाराष्ट के विदर्भ क्षेत्र में से अमरावती जिले में स्थित चार सौ वर्ष पुराना ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल कौंडण्यपुर भगवान कृष्ण द्वारा रुक्मिणी के “अपहरण-स्थल’ के नाम से विख्यात है। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला से घिरी इन सुरम्य पहाड़ियों के मध्य बहने वाली वर्धा नदी के तट पर बसे अमरावती शहर से 35 कि.मी. दूर स्थित इस ऐतिहासिक स्थल का पूर्व में नाम कुंडिनपुर था, जो कालांतर में कौंडण्यपुर के नाम से विख्यात हुआ।

इस पौराणिक स्थल का नाम कौंडण्य ऋषि के नाम पर पड़ा था। कई सदियों तक यह विदर्भ की राजधानी के रूप में भी प्रसिद्घ था। पुराणों में वर्णित है कि अंजलि ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा, राजा दशरथ की माता इंदुमति, नलराजा की पत्नी दमयंती भी विदर्भ क्षेत्र की ही राज कन्याएँ थीं। इन्हीं के वंशजों में राजा भीष्मक भी थे। इनके पांच पुत्र व एक लावण्यमती कन्या थी। बड़े पुत्र का नाम रुक्मी तथा पुत्री का नाम रुक्मिणी था। कहा जाता है कि राजा भीष्मक के ज्येष्ठ पुत्र रुक्मी के आग्रह पर रुक्मिणी का विवाह चेदी राज्य के राजा शिशुपाल के साथ तय हुआ था। लेकिन रुक्मिणी कृष्ण के यश व कीर्ति से प्रभावित थी। उसने कृष्ण को देखे बिना ही मन ही मन में उनसे विवाह करने का निश्र्चय कर लिया था। यही नहीं, उसने अपने राज्य के प्रसिद्घ सुदेव नामक ब्राह्मण के हाथों श्रीकृष्ण के नाम एक गुप्त पत्र भेजकर उनसे विवाह करने की अपनी इच्छा बता दी थी। रुक्मिणी ने पत्र में श्रीकृष्ण से आग्रह भी किया था कि वे स्वयं कौंडण्यपुर स्थित मां अंबिका के मंदिर में आकर उससे मिल लें। रुक्मिणी प्रतिदिन अपनी कुलदेवी मां अंबिका के मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाती थी। एक दिन भगवान कृष्ण रुक्मिणी की आसक्ति से प्रभावित होकर अंबिका के मंदिर में प्रकट हो गये। तब रुक्मिणी ने तन-मन से उन्हें अपना पति मान लिया और कृष्ण को भी उससे अगाध प्रेम हो गया। बाद में रुक्मिणी ने ही कृष्ण से आग्रह किया कि वे इसी मंदिर से उसका अपहरण कर विवाह रचा लें।

इधर रुक्मिणी के विवाह की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। आखिर, वह दिन भी आ ही गया, जब रुक्मिणी का विवाह राजा शिशुपाल से होना था। पूरा कौंडण्यपुर जो उस समय स्वर्णनगरी कहलाता था, को खूब सजाया गया। दूर-दूर के देशों से राजा भी आये। साथ ही शाही भव्यता के साथ राजा शिशुपाल की बारात भी आई। इधर समय बीतते जाने के साथ-साथ रुक्मिणी को कृष्ण की चिंता सताने लगी कि कृष्ण अभी तक नहीं आये।

इस बीच स्वयंवर के लिए सजी-धजी रुक्मिणी ने अचानक फेरे होने से पूर्व अपनी कुलदेवी के दर्शनों की इच्छा जताई। मंदिर में भगवान कृष्ण पहले से ही पहुंच चुके थे और उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

काफी देर तक रुक्मिणी के राजमहल में न पहुंचने पर सभी को चिंता होने लगी, लेकिन जैसे ही उसकी सखियों से सच्चाई का पता चला तो पूरे राजमहल में हड़कंप मच गया।

रुक्मिणी का भाई रुक्मी अपनी बहन के इस व्यवहार से इतना ाुद्घ हो उठा था कि तुरंत सेना लेकर कृष्ण पर आामण करने के लिए मंदिर में जा पहुंचा। रुक्मी के सैनिकों ने अंबिका मंदिर को चारों तरफ से घेर लिया। कृष्ण को जब बचने का कोई उपाय न दिखा तो रुक्मिणी के साथ मंदिर की खिड़की से कूद कर भाग निकले।

रुक्मी व उसके सैनिकों ने भागते हुए कृष्ण व रुक्मिणी का पीछा किया और कृष्ण को युद्घ के लिए ललकारते हुए, आामण कर दिया। कृष्ण के परााम से रुक्मी की सेना पराजित हो गयी। तब रुक्मिणी ने कृष्ण से आग्रह किया कि वे उसके भाई को छोड़ दें। पराजित रुक्मी शर्मसार हो कौंडण्यपुर न जाकर अमरावती से 15 कि.मी. दूर भातकूली चला गया, बाद में कृष्ण ने अमरावती जाकर वहां स्थित अम्बादेवी मंदिर में विवाह रचा लिया। कौंडण्यपुर में भगवान कृष्ण व रुक्मिणी की स्मृति में बने भव्यमंदिर में काले पत्थर से बनी विशाल मूर्तियां हैं। इससे थोड़ी ही दूर पहाड़ी पर बना रुक्मिणी की कुलदेवी मां अंबिका का मंदिर है। इस मंदिर में उस खिड़की को लोहे की जालियां लगाकर सुरक्षित रखा गया है, जहां से कृष्ण व रुक्मिणी कूदे थे। मंदिर के समीप बहती नदी व सघन हरे-भरे क्षेत्र में पहाड़ियों के बीच बने इस मंदिर को देखने के लिए दूर-दराज से श्रद्घालु आते हैं, कृष्ण जन्माष्टमी पर यहां भव्य मेला भी भरता है।

– चेतन चौहान

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