क्या सामयिक है तीन सौ सत्तर का मुद्दा?

भारतीय जनता पार्टी ने अपने पिछले शासनकाल में भले ही अपने राजग के अन्य सहयोगियों के दबाव में जम्मू-कश्मीर से संबंधित धारा 370 को नेपथ्य में डाल दिया था, लेकिन 2009 के चुनावों के पहले वह इस मुद्दे को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखने का मन बना चुकी लगती है। जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति विस्फोटक बनी हुई है। श्राइन बोर्ड को भूमि आवंटन का मुद्दा महीनों से गरम है, और इस मुद्दे पर इस राज्य के दोनों संभाग, जम्मू और कश्मीर घाटी, सांप्रदायिक आधार पर स्पष्टतः विभाजित दिखाई देते हैं। घाटी में अलगाववादी जमातों ने भारत-विरोधी मुहिम के साथ ही कश्मीर की “आ़जादी’ और पाकिस्तान में विलय का आंदोलन तेज कर दिया है। दोनों ही संभागों में स्थिति इस कदर अराजक और अशांत हो चुकी है कि सुरक्षाबलों के जरिये सरकार का शांति स्थापना का हर प्रयास विफल सिद्घ हो रहा है। कर्फ्यू आयद होने के बावजूद लोग ह़जारों की संख्या में घरों से बाहर निकल कर प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे हैं।

इस विषम परिस्थिति में इस अशांत राज्य को समाधान-बिंदु तक पहुँचाने के लिए देश के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के पास एक नायाब नुस्खा है, धारा 370 की समाप्ति। ़गौरतलब है कि संविधान की यह धारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देती है। भाजपा का स्पष्ट मानना है कि इस राज्य में अलगाववादी प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए धारा 370 को समाप्त कर इस राज्य को भी अन्य राज्यों के समकक्ष लाया जाना चाहिए। ़गौरतलब यह है कि भाजपा की यह मांग तबसे है जब वह भारतीय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। इस धारा की समाप्ति को उसने अपनी कार्यसूची में हमेशा वरीयता दी है। उसके अनुसार भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसी के चलते अपनी आत्माहुति भी दी थी। अतः जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में वह अपनी इस पुरानी मॉंग को नये सिरे से प्रस्तुत करने का मन बना रही है। भाजपा ने 21 अगस्त को पूरे देश में “जम्मू-कश्मीर बचाओ, देश बचाओ’ का मुद्दा लेकर रैलियों की श्रृंखला आयोजित करने का फैसला लिया है। अपनी इन रैलियों में धारा 370 की समाप्ति को वह बहुत पुरजोर तरीके से उठायेगी। इसके अलावा इसे वह बौद्घिक वर्ग में बहस का मुद्दा भी बनाना चाहती है। उसने अपने इस इरादे का खुलासा तो किया है लेकिन इस पर उसके अन्य सहयोगी दलों की राय सामने नहीं आई है।

हालॉंकि जम्मू-कश्मीर की स्थिति विस्फोटक-बिन्दु के उच्चतम स्तर पर पहुँचती दिखाई देती है, लेकिन यह राज्य तभी से एक समस्या बना हुआ है जबसे इसका विलय भारतीय संघ में हुआ है। अलगाववादी प्रवृत्तियॉं इस राज्य में हमेशा से सिाय रही हैं। विशेष दर्जा देने का उपहार भी इन प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए ही दिया गया था। लेकिन इस उपहार ने इनकी उग्रता को शांत करने की जगह इन्हें और बढ़ाया ही है। बल्कि इस कदर बढ़ाया है कि अब घाटी में खुलेआम पाकिस्तानी झंडा लहराया जा रहा है और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाये जा रहे हैं। इन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भाजपा की पेशकश को ़खारिज भी नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके औचित्य-अनौचित्य पर राजनीति से हट कर राष्टीय संदर्भ में विचार होना चाहिए। कश्मीर में उभरने वाली अलगाववादी प्रवृत्तियों का एक मात्र कारण धारा 370 को भले न माना जाय, लेकिन किसी न किसी स्तर पर इसने भी इसे ताकत देकर मजबूत किया है। हम भाजपा की भाषा भले न बोलें, लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि इस राज्य के प्रति केन्द्र सरकार की नीतियॉं शुरू से गलत और दिशाहीन रही हैं। हम यह जुमला बार-बार दुहराते रहे कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन इसे अभिन्न बनाये रखने के लिए जिन अलगाववादी प्रवृत्तियों का दमन होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। उनको हम अपनी गतिविधियों को बिना किसी भय के चालू रखने का मौका भी मुहैया कराते रहे। भारत सरकार की कश्मीर संबंधी नीति का सबसे खतरनाक पहलू यह रहा कि वहॉं भारत के ़िखलाफ सा़िजश रचने वालों को तो दूध पिला कर पाला गया और राष्टवादी तत्वों को छाछ से भी वंचित रखा गया। अब वही विशेष दर्जा प्राप्त दूध पीने वाले फण उठाकर डंसने को आमादा हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि अलगाववाद और उसी के गर्भ से उपजे कट्टरपंथी आतंकवाद को संचालित करने का काम पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने किया है। कश्मीर के मौजूदा हालात बहुत हद तक उसके पक्ष में हैं और वह इसका अंतर्राष्टीयकरण भी करना चाहता है। अतएव धारा 370 को वर्तमान संदर्भ में ले आना किसी तरह सामयिक नहीं होगा। इसका फायदा हर हाल में पाक समर्थित अलगाववादी जमातें ही उठायेंगी। हालात का त़काजा यह है कि जम्मू-कश्मीर के सांप्रदायिक विभाजन को रोका जाय और सभी संबंधित पक्ष वर्तमान अमरनाथ श्राइन बोर्ड के भूमि आवंटन के मुद्दे का हल तलाश करें। लेकिन इसके साथ ही अगर कश्मीर को बचाने के प्रति सचमुच सरकार और राजनीतिक दल गंभीर हैं, तो उन्हें किसी भी हालत में इसे चुनाव का मुद्दा बनाने से परहेज करना होगा। भाजपा जिस धारा 370 को रद्द करने की बात कह रही है, उस पर विचार अवश्य होना चाहिए, लेकिन चुनावी राजनीति से अलग हट कर।

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