क्या है आस्तिकता

हम में से प्रत्येक को आस्तिक बनना चाहिए और इसके लिए नित्य नियमित रूप से उपासना की ाम-व्यवस्था दैनिक जीवन में रखनी चाहिए। एक परिपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में ईश्र्वर की किसी छवि का ध्यान करें, उसके गुणों का चिंतन करें और उसी में तन्मय हो जाएं, उसे अपने में धारण करने की भावना करें। वाणी से नाम-जप, मस्तिष्क से स्वरूप का ध्यान, हृदय से एकात्मकता का, परस्पर घुलन-मिलन के उल्लास का अनुभव, यह तीनों िायाएं साथ-साथ चलती रहनी चाहिए। भजन के समय कोई भाव ध्यान में नहीं आना चाहिए। विचारों का न उठना योगाभ्यास का चित्तवृत्ति निरोध साधन तो है, पर भजन में इसका कुछ उपयोग नहीं। भजन में भावनाएं तो रहनी ही चाहिए। जो भावना से तरंगित न हो, वह भजन कैसा?

आस्तिकता की भावना का एक महत्वपूर्ण और उज्ज्वल पहलू समाज-कल्याण की भावना का प्रसार भी है। नास्तिक मनुष्य के उच्छृंखल हो जाने की संभावना अधिक रहती है, जबकि भगवान पर विश्र्वास रखने वाला व्यक्ति दुष्कर्मों से बचने की न्यूनाधिक प्रेरणा किसी न किसी रूप में पाता ही रहता है और उससे प्रायः लाभ ही उठाता है। आस्तिकता का वास्तविक तात्पर्य होता है, अन्य मनुष्यों को एक ही भगवान का पुत्र मानकर उनके साथ भ्रातृभाव की भावना रखना। जिस व्यक्ति का ईश्र्वरीय शक्ति पर विश्र्वास है और जो मानव मात्र में एक ही आत्मा के विद्यमान होने में थोड़ा भी विश्र्वास रखता है, वह दूसरों का उत्पीड़न करने को बुरा समझता है।

बहुत से लोग पूजा-पाठ, उपासना, ध्यान, भजन, कीर्तन, तीर्थयात्रा आदि में विशेष दिलचस्पी रखने वाले लोगों को ईश्र्वरप्रेमी और आस्तिक समझते हैं। साथ ही जब वे उनकी स्वार्थपरता के कारण दूसरे व्यक्तियों के साथ दुर्व्यवहार करते देखते हैं तो उनको आस्तिकता के महत्व पर संदेह होने लगता है। इसमें गलती यह होती है कि केवल पूजा-पाठ या भजन-कीर्तन को आस्तिकता का प्रमाण मान लिया जाता है, जबकि यह उसके बाह्य लक्षण मात्र हैं, जो व्यक्ति इन कार्यों को करते हुए व्यवहार से विपरीत मार्ग पर चलता हो, उनके लिए यही निश्र्चय कर लेना चाहिए कि या तो वह इन कार्यों का वास्तविक तात्पर्य नहीं समझता और केवल परंपरा का पालन करने के विचार से वैसा करता रहता है अथवा दूसरी बात यह है कि अनेक लोग जानबूझ कर अन्य लोगों को बहकाने के लिए भी ऐसा आचरण करते हैं।

आस्तिकता की सच्चाई का सबसे पहला प्रमाण यही है कि उस व्यक्ति में लोक-कल्याण की आंतरिक भावना हो। जो मनुष्य दूसरों के सुख-दुःख में हिस्सा बंटाता और दूसरों के हित के लिए अपने स्वयं का बलिदान करने के लिए प्रस्तुत रहता है, वही वास्तव में आस्तिकता का अनुयायी माना जा सकता है। इस दृष्टि से प्रत्यक्ष में ईश्र्वर-उपासना करने वाले, पर-संसार के अंधकार में संलग्न व्यक्तियों को नास्तिक कहेंगे।

नियमित उपासना के अतिरिक्त हर समय भगवान का ध्यान रखा जाए, उसे चौबीस घंटे के साथी की तरह विश्र्वस्त व आत्मीय समझा जाए, उसे प्रसन्न करने के लिए आदर्शवादिता से परिपूर्ण आचरण किया जाए और उन कुविचारों एवं दुष्कर्मों से दूर रहा जाए, जिनसे ईश्र्वर अप्रसन्न होता है। यह भूलना नहीं चाहिए कि पूजा-अर्चना का उद्देश्य जीवन के कण-कण में आस्तिकता का समावेश करना, दिव्य-जीव की प्रेरणा ग्रहण करना है। आस्तिक व्यक्ति का हर विचार एवं हर कार्य उत्कृष्ट ही होना चाहिए। इस कसौटी पर हम अपनी उपासना को सही सिद्घ करते हुए, भजन ध्यान करें तो उससे ईश्र्वर की सच्ची प्रसन्नता का लाभ मिलना सुनिश्र्चित है।

– पं. लीलापत शर्मा

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