खाली आरक्षित सीटें सामान्य को दें

देश के विभिन्न आईआईटी और आईआईएम संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए आरक्षित सीटों में से 432 सीटें अब भी खाली पड़ी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद इन सीटों को सामान्य श्रेणी के छात्रों को आवंटित नहीं किया गया है। गौरतलब है कि 10 अप्रैल 2008 के अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ओबीसी की मलाईदार परत को छोड़कर उसके लिए देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण तो दिया जाएगा, लेकिन शैक्षिक योग्यता से समझौता नहीं किया जाएगा। इसलिए अगर पर्याप्त शैक्षिक योग्यता के ओबीसी छात्र नहीं मिलते हैं, तो उनकी जगह सामान्य श्रेणी के छात्रों को प्रवेश दे दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बावजूद ओबीसी के लिए आरक्षित सीटें जो खाली पड़ी हुई हैं उन्हें सामान्य श्रेणी के छात्रों को आवंटित नहीं किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि आईआईटी, दिल्ली विश्र्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्र्वविद्यालय और मानव संसाधन मंत्रालय इस दृष्टिकोण के हैं कि आरक्षित कोटे की खाली सीटें खुद-ब-खुद सामान्य श्रेणी के छात्रों को आवंटित नहीं हो सकतीं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में यह भी समस्या है कि ओबीसी छात्रों को प्रवेश देने के लिए कटऑफ मार्क को और गिराया नहीं जा सकता।

दरअसल, अपने उच्चस्तर को बरकरार रखने के कारण ही देश की आईआईटी और आईआईएम ने दुनियाभर में अपना लोहा मनवा रखा है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘अगर सामान्य श्रेणी के लिए कटऑफ मार्क प्रवेश परीक्षा में 50 प्रतिशत हैं तो आप उन ओबीसी छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकते जिन्होंने सिर्फ 25 प्रतिशत अंक ही हासिल किए हैं। आप योग्यता से पूरी तरह समझौता नहीं कर सकते।’ ध्यान रहे कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय खंडपीठ ने दिया था जिसमें मुख्य न्यायधीश के.जी. बालाकृष्णन, न्यायधीश अर्जित पसायत, न्यायधीश सी.के. ठक्कर, न्यायधीश आर.वी. रविन्द्रन और न्यायधीश दलवीर भंडारी शामिल थे। दो न्यायधीशों ने कहा था कि ओबीसी के लिए कटऑफ मार्क सामान्य श्रेणी की तुलना में 5 प्रतिशत कम हो सकता है और एक न्यायधीश ने 10 प्रतिशत कम के लिए कहा था। यानी 3 न्यायधीश इस पक्ष में थे कि अगर सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए कटऑफ मार्क 50 प्रतिशत है तो ओबीसी के लिए 45 प्रतिशत से कम नहीं हो सकता। अब ओबीसी के छात्र जब 45 प्रतिशत अंक भी प्रवेश परीक्षा में नहीं लाए, तो उनके लिए आरक्षित सीटें खाली रह गईं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार यह सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों से भर देनी चाहिए थीं क्योंकि प्रतिष्ठित संस्थानों में सीटों का खाली रहना राष्टीय हानि है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

इससे ़जाहिर हो जाता है कि उच्च संस्थानों और मानव संसाधन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी की है। इसी को मद्देनजर रखते हुए आईआईटी चेन्नै के पूर्व निदेशक पी.वी. इंद्रसेन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके प्रार्थना की है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ओबीसी के लिए आरक्षित जो 432 सीटें आईआईटी/आईआईएम में खाली पड़ी हैं, उन्हें फौरन सामान्य श्रेणी के छात्रों द्वारा भरा जाए। उनकी इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की उसी बैंच जिसने 10 अप्रैल का निर्णय दिया था, ने बीती 15 सितंबर को केन्द्र को नोटिस जारी किया कि आरक्षित सीटों को खाली क्यों रखा गया है? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने नोटिस में 2 बातों का स्पष्टीकरण केन्द्र से मांगा है। एक, उच्च शिक्षा संस्थानों में रिक्त पड़ी सीटों की क्या स्थिति है? दूसरा यह कि केन्द्र का ओबीसी छात्रों के लिए कटऑफ मार्क पर क्या नजरिया है?

केन्द्र की तरफ से पेश होते हुए सोलिस्टर-जनरल जी.ई. वाहनवती ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वे केन्द्र से दिशा-निर्देश प्राप्त करने के बाद अपनी प्रतििाया अगले दो सप्ताह के भीतर दाखिल कर देंगे। अगली सुनवाई आगामी 29 सितंबर को होगी।

यहां यह बताना भी आवश्यक है कि ओबीसी की खाली पड़ी आरक्षित सीटों को न भरने के पीछे मानव संसाधन मंत्रालय यह दलील देता आ रहा है कि इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट नहीं है। साथ ही मंत्रालय में यह भी गहन विचार-विमर्श हो रहा है कि ओबीसी की सीटों को भरने के लिए ओबीसी के लिए कटऑफ मार्क और घटा दिया जाये।

लेकिन इन दोनों ही बातों पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया एकदम स्पष्ट है। न्यायधीश पसायत ने कहा कि रिक्त सीटों को भरने में कहीं कोई अस्पष्टता व उलझन नहीं है। न्यायधीश पसायत, न्यायधीश ठक्कर और न्यायधीश भंडारी ने 10 अप्रैल के अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि खाली सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों को जाएंगी। कहने का अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट का इरादा एकदम साफ था कि खाली सीटें खाली नहीं रहेंगी और उन्हें सामान्य श्रेणी के छात्रों को आवंटित कर दिया जाएगा। न्यायधीश भंडारी ने भी कहा कि फैसले में कहीं कोई उलझन नहीं है।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर भी स्पष्ट है कि ओबीसी के लिए कटऑफ मार्क और नहीं घटाया जाएगा। इससे ़जाहिर है कि जो सामान्य श्रेणी के लिए कटऑफ मार्क है, उससे ओबीसी के लिए कटऑफ मार्क 5-10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट के एकदम स्पष्ट फैसले के बावजूद अगर अब तक उच्च संस्थानों में आरक्षित पड़ी सीटों को खाली रखा गया है, तो इससे सिर्फ यही ़जाहिर होता है कि वोटों की सियासत को मद्देनजर रखकर ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अनदेखा किया जा रहा है। यह सही है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ओबीसी के छात्रों को भी आईआईटी व अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि शैक्षिक योग्यता से पूरी तरह से समझौता कर लिया जाए और सामान्य श्रेणी के छात्र को तो प्रवेश परीक्षा में 50 प्रतिशत अंक लाने पड़ें और ओबीसी के छात्र को 20-25 प्रतिशत अंक लाने पर ही प्रवेश मिल जाए। यह न सिर्फ जबरदस्त भेदभाव होगा बल्कि इससे शिक्षा का स्तर भी गिर जाएगा। इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का 10 अप्रैल का फैसला बिल्कुल दुरूस्त है और उसे लागू न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर को जो केन्द्र को नोटिस जारी किया है, वह भी सही है। उम्मीद की जाती है कि मानव संसाधन मंत्रालय जल्द खाली पड़ी सीटों को सामान्य श्रेणी के छात्रों को आवंटित करेगा और ओबीसी के लिए कटऑफ मार्क का प्रतिशत और कम नहीं करेगा।

 

– शाहिद ए चौधरी

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