चार दिनों का मेला रे बन्दे भजन

चार दिनों का मेला रे बन्दे।
चार दिनों का मेला॥
हाँ रे मन चार दिनों का मेला॥ टेर ॥
सब मेले है जीते जी के, काम ना आवे कोई किसी के
रंग सुनहरे फिर भी फिके, वक्त पड़ा तो बीच नदी के
भाई ने भाई को ढ़केला॥ 1 ॥
जिक्र सुनाऊँ, था एक बादशाह, देर खबर तक उसका राज था
ना सिकन्दर रुतबा ऐसा
संग गया नहीं धेला॥ 2 ॥
क्यूँ नहीं तूने हरि लगन की, छोड़ दे आशा झूठे धन की
कहता साधु बात पतन की हरिनाथ का चेला॥ 3 ॥

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