चिकित्सकों का कानून बनाम मरीजों की गुलामी

चिकित्सक यानी सेहत का रखवाला, दुःखहर्ता, कुदरती बीमारियों और तकलीफों से निजात दिलाने वाला शख्स और सामान्य व्यक्तियों की निगाह में भगवान, ईश्‍वर, देवता। जी हाँ, दुनियाभर में चिकित्सकों के साथ ये उपमाएं सदियों से प्रयुक्त होती आ रही हैं। गुजश्ता समय में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैैंं, जब वे इन उपमाओं पर खरे उतरे हैं लेकिन पिछले कुछ बरसों में चिकित्सकों के मरीजों के प्रति रवैये में जो बदलाव आए हैं वे सभी के सामने हैं। भौतिक चकाचौंध और प्रतिस्पर्धा ने मानव सेवा का पेशा कहे जाने वाले क्षेत्र की इस भगवान बिरादरी को भी संभवतः भ्रमित कर दिया है। इंदौर स्थित मध्यप्रदेश राज्य के सबसे बड़े सरकारी दवाखाने यानी महाराजा यशवंतराव अस्पताल में इलाज के दौरान एक मरीज की मौत से गुस्साए परिजनों द्वारा चिकित्सकों से मारपीट के बाद जूनियर चिकित्सक यह कहकर हड़ताल पर चले गए कि उन्हें कानूनी सुरक्षा चाहिए। यही हाल मध्यप्रदेश के दूसरे शहरों समेत राजस्थान, दिल्ली जैसे राज्यों में भी है। हड़ताली चिकित्सक काम पर लौटने से पहले समूह की शक्ल में दबाव बनाकर सरकारों को ऐसे कानून बनाने के लिए बाध्य कर रहे हैं, जिससे मरीजों को गुलाम की तरह रख सकें।

इलाज में लापरवाही, देरी या अड़ंगे लगाने के कारण जब मरीज के शरीर को स्थायी नुकसान हो जाता है, तो उसके सगे-संबंधी और मित्र, चिकित्सकों को निशाने पर ले लेते हैं और ‘पूजनीय’ की ‘पूजा’ उतार देते हैं। ऐसे में अस्पताल में तोड़फोड़ की घटनाएं भी होती हैं। चिकित्सकों के तमाम संगठनों का कहना है कि ऐसा कानून बनाया जाए जिससे मारपीट करने वाले के खिलाफ गैर ज़मानती वारंट जारी हो और उसे कम से कम तीन साल की जेल भुगतनी पड़े। छह महीने पहले डॉ. राजशेखर रेड्डी की आंध्रप्रदेश सरकार ने इस गुजारिश पर अमल किया और चिकित्सकों को कानूनी तौर पर महफूज रखने के लिए ‘चिकित्सा सेवा, व्यक्ति और चिकित्सा सेवा संस्थान अधिनियम 2007’ लागू कर दिया। इसके बाद से ही देश के अन्य हिस्सों में सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों ने लामबंद होकर आंध्रप्रदेश जैसे कानून की मांग शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने हड़ताल का सहारा लेकर बेकसूर मरीजों की जिंदगियों को भी खतरे में डालने से परहेज नहीं किया।

यहाँ दो सवाल हैं, एक तो यह कि क्या इस कानून की वाकई ज़रूरत है? और दूसरा यह कि क्या कानून बन जाने से इन पर होने वाले हमले कम हो जाएंगे? कानून की ज़रूरत और इसमें जोड़े जाने वाले प्रावधानों की बात करें तो साफ होता है कि यह कानून अन्याय को बढ़ाने वाला अधिक और उन्हें सुरक्षा देने वाला कम रहेगा। यदि कोई चिकित्सक किसी मरीज के साथ लापरवाही करता है और मरीज की सेहत पर बुरा असर पड़ता है तो भारतीय दंड संहिता की धारा 336, 337 और 338 के तहत अपराध पंजीबद्ध किया जाता है। इन तीनों ही धाराओं को जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है। तीनों में ामशः तीन माह, छह माह और दो साल तक की जेल हो सकती है। भारतीय अदालतों का इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में लापरवाही सिद्ध करना बेहद ही मुश्किल काम है। यही वजह है कि या तो लोग कोर्ट पहुँचते ही नहीं या उन्हें निराशा हाथ लगती है। अब बात आंध्रप्रदेश में बने कानून के प्रावधानों की। इसमें चिकित्सकों के साथ मारपीट को गैरज़मानती अपराध की संज्ञा दी गई है। यह अप्राकृतिक न्याय नहीं है तो और क्या है?

अब बात कानून की ज़रूरत पर। चिकित्सक यह मान रहे हैं कि उनके पक्ष में कोई ठोस कानून बन जाएगा तो ढंग से इलाज करें या लापरवाही से, वे पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। लेकिन यह उनका भ्रम है क्योंकि पोटा और एनडीपीएस एक्ट जैसे सख्त कानून के बावजूद इनके दायरे में आने वाले अपराधों में कोई खास कमी दर्ज नहीं की गई है। मतलब केवल कानून बनाने की जिद पूरी करवाने से ही समस्या का हल नहीं निकलेगा। इसके लिए सबसे पहले तो चिकित्सकों को ही अपनी मानसिकता बदलनी होगी। सरकारी अस्पतालों में उनके चेहरे से लेकर पूरे माहौल में जो उदासीनता और मजबूरी में काम करने का भाव पसरा रहता है उसके स्थान पर मरीजों व परिजनों से आत्मीय व्यवहार करना होगा और हावभाव में तत्परता लानी होगी। दूसरा उपाय यह हो सकता है कि अस्पतालों में मरीज के साथ आने वाली अनावश्यक भीड़ की रोकथाम के लिए सख्त कदम उठाए जाएं। बेहतर होगा कि अस्पताल परिसरों में ऐसे बदलाव किए जाएं कि प्रवेश के समय ही यह बात सुनिश्‍चित हो जाए। एक अन्य उपाय यह हो सकता है कि अस्पतालों में तैनात पुलिस बल को ज्यादा मुस्तैद, ज्यादा चौकस और ऐसे मौके आने पर त्वरित कार्रवाई के लिए प्रेरित करने के प्रबंध किये जाएं। बहरहाल, खास बात यही है कि यदि चिकित्सक अपने व्यवहार और मरीजों के प्रति अपने दायित्व को गंभीरता से लें तो शायद किसी नए कानून की मांग करने की उन्हें ज़रूरत ही न पड़े और शायद मारपीट जैसी घटनाओं की नौबत ही नहीं आए।

 

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