जंगल की हवा

अभी पूरी तरह से सुबह हो भी नहीं पायी थी कि बड़े साहब ने फॉरेस्टर साहब का दरवाजा बजा दिया।

फॉरेस्टर साहब ने दरवाजा खोला और सामने अपने एमडीओ को देखा तो तुरंत सेल्यूट मारा और पूछा, “”सर कोई अर्जेन्ट काम है?”

“”हॉं पुरी, हम सोच रहे थे आज तुम्हारे कूप में चलकर थोड़ा दौरा कर लें।” बड़े साहब ने कहा।

“”सर आप अंदर तो आइये, बस मैं तैयार हो रहा हूं।” कहकर उसने दरवाजे के सामने से रास्ता दिया। साहब ने अंदर प्रवेश किया और सोफे पर बैठ गये।

पुरी साहब अंदर ोश होने चले गये। पत्नी ने बिटिया के हाथ चाय भिजवाई थी। पुरी ोश होते-होते विचार कर रहे थे, यह नये साहब आये हैं, इनके बीबी-बाल-बच्चे कुछ नहीं हैं, दिन भर फालतू रहते हैं। कुछ और नहीं सूझा तो कहने लगे, जंगल चलो। अरे भाई! मैं तो बाल-बच्चे वाला हूं। समय पर उठना, समय पर कार्यालय व जंगल जाना चाहिए। ये कोई बात है कि आप कभी भी किसी के घर मुंह उठाए और चले आये, क्या कहें बड़े साहब जो ठहरे, सीआर खराब कर सकते हैं। पता नहीं जंगल में जा रहे हैं। कब लौटना होगा? लेकिन हम छोटे कर्मचारी तो कभी विरोध कर ही नहीं सकते हैं।

पुरी साहब तैयार होकर जब बाहर आये, तब तक सूर्य किरणों ने धरती को छू लिया था। पत्नी ने दोनों के लिए टेबल पर नाश्ता लगा दिया था। पुरी साहब ने नाश्ता करते-करते प्रश्र्न्न किया, “”साहब, मैडम कब तक आ जायेंगी?”

“”सॉरी पुरी, मेरी पत्नी का स्वर्गवास हुए तीन साल हो चुके हैं, मेरे दो लड़के सेटल हो चुके हैं, एक लड़की हॉस्टल में है।” बड़े साहब ने संक्षिप्त में अपने विषय में सब बता दिया। पुरी ने चेहरे पर दुःख लाकर कहा, “”सॉरी सर, मेरा मतलब आपको दुःख पहुँचाना नहीं था।”

“”मैं समझ सकता हूं” बड़े साहब ने बड़ी विनम्रता से कहा।

नाश्ता करके दोनों जीप में जंगल की ओर निकल गये। पुरी उन्हें मार्ग बता रहा था। बड़े साहब स्वयं गाड़ी डाइव कर रहे थे। सुबह की मस्त-शुद्घ बयार जंगल में बह रही थी। एक-दो आवारा पशु, जीप के सामने से कूद कर झुरमुट में खो गये थे। पक्षियों का कलरव पूरे वातावरण को संगीतमय कर रहा था। जीप अपनी गति से आगे बढ़ रही थी। बड़े साहब ने एक जगह जीप को रोका और पुरी से प्रश्र्न्न किया, “”क्यों पुरी साहब, यहां जंगल कटाई की क्या स्थिति है?”

“”सर, जंगल तो खुली अलमारी है, कहां-कहां से कटने से रोकें? फिर भी काफी पाबंदी कर दी है।” पुरी ने सफाई देते हुए कहा।

“”ये जंगल कटाई में कौन लोग इन्वाल्व हैं?” बड़े साहब ने प्रश्र्न्न किया।

पुरी का माथा ठनका। ये कैसा बड़ा साहब है, क्या सब कुछ जान लेना चाह रहा है? लकड़ी-चोरों के कितने लंबे हाथ हैं, यह किसी से छिपा है? इधर चोरों को पकड़ा नहीं कि विधायक जी का फोन आ जाता है। विधायक जी की एक लकड़ी काटने की आरा मशीन भी जंगल में है। उसे किसी ने आज तक बंद नहीं करवाया। यहां से लकड़ी कट कर दिल्ली तक जाती है, ये बड़े साहब पता नहीं किसको पकड़ने का विचार कर रहे हैं।

“”सर, इस विषय पर मैं क्या कह सकता हूं?” पुरी ने गले में आये थूक को निगलते हुए कहा।

“”फिर भी कोई हिस्टीशीटर तो होगा?” बड़े साहब जैसे आज इन घने जंगल में सब जान लेने को आतुर थे। पुरी ने बड़े साहब को थोड़ा घुमाते हुए कहा, “”सर, ये जंगल में बसे गौड़ ठाकुर लोग ही नुकसान पहुँचा रहे हैं।”

“”ये लोग कितनी लकड़ियॉं काटते होंगे?”

“”सर, यही सबसे अधिक चोरी करते हैं, क्योंकि इनके पास सोर्स ऑफ इनकम बिल्कुल नहीं है” पुरी ने बड़े साहब को स्पष्ट किया।

“”यदि ये लोग चोरी करते हैं तो इनके रहने का स्तर तो काफी ऊँचा होगा?” बड़े साहब ने पूछा।

“”सर, ये अमीर हो जाते, लेकिन इनकी आदतें खराब हैं, शराब पीना, फिजूल खर्च करना, पूजा-पाठ, शादी-ब्याह में खर्च करना, इन्हीं सब कारणों से ये लोग आज भी दलित हैं।” पुरी ने बड़े साहब को समझाते हुए कहा।

बड़े साहब ने गाड़ी को पुनः प्रारंभ किया और जंगल की ओर आगे बढ़ चले। आदिवासियों के गांव प्रारंभ हो चुके थे। उनके रहन-सहन में कोई भी परिवर्तन नहीं आया था। सरकारी दावे सब झूठे दिखलाई दे रहे थे। वे लोग निम्न स्तरिय जीवन भोग रहे थे। अगले पहाड़ पर उनकी जीप जंगल के नाके के सामने रुकी। बड़े साहब को आया देखकर नाकेदार चौंक पड़ा। बगैर वर्दी में घूम रहा था। इतने घने जंगल में वर्दी किसको दिखलाता, उसने तुरंत सेल्यूट किया और अदब से खड़ा हो गया।

बड़े साहब ने प्रश्र्न्न किया, “”क्या नाम है तुम्हारा?”

“”मदन, सर।”

“”कब से यहां हो?”

“”सर, चार बरस हो गये।”

“”इस ओर जंगल कटाई कैसी है?”

“”काफी कंटोल है” नाकेदार ने जवाब दिया।

अभी नाकेदार का जवाब पूरा भी नहीं हो पाया था कि एक बूढ़ी औरत और उसके साथ उसकी युवा पुत्री सिर पर लकड़ियों का एक गट्ठा लिए आये और जोरों से गट्ठा वहीं पटक कर नाकेदार मदन से कहा, “”जान निकल जात है लकड़ी लावे में।”

मदन बुरी तरह से घबरा गया। सामने साहब, बड़े साहब और ये आदिवासी बुढ़िया क्या कह रही है? क्या नौकरी से निकलवायेगी?

दोनों महिलाओं को कोई मतलब साहब से नहीं था। वह तो पसीना पोंछ कर पुनः कहने लगीं, “”काहे नाकेदार भैया का हो गओ?”

“”क्यों लकड़ी काटती हो?” नाकेदार ने नाराज होने का अभिनय किया।

युवती खिलखिला कर हंस पड़ी और कहने लगी, “”का आज से काट रहे हैं? रोज काट रहे हैं, कभू मना नहीं करो, आज काहे नाराज हो रहे हो?”

“”चुप्प कर, अभी जप्ती बनाता हूं, सब मालूम पड़ जायेगा।” मदन ने ाोध में चीखकर कहा।

“”काहे का चोरी की है, जो तुम चिल्ला रहे हो? अरे! चोरी के दाम दे रहे हैं कि नहीं।” युवती ने भी नाराजगी से कहा।

बड़े साहब ने नाराज होकर कहा, “”क्यों तुम इनसे रिश्र्वत लेते हो?”

“”सर, यह झूठ बोलती है”, मदन ने झेंपते हुए कहा।

“”काहे मैं झूठ बोल गई हूं, का अम्मा तू बोल ये सच के रओ है?” युवती ने अपनी मां से प्रमाणित करना चाहा। बूढ़ी औरत लजा गई, एक शब्द भी उसने नहीं कहा। पुरी साहब ने एक आंख दबाकर मदन को चुप रहने को कहा और बड़े साहब की ओर मुंह करके कहने लगा, “”सर, मैं कहता था न कि जंगल उजाड़ने में इनकी महत्वपूर्ण भागीदारी है।”

“”सो तो मैं देख रहा हूँ।” बड़े साहब की दृष्टि युवती पर जाकर टिक गयी थी।

फॉरेस्टर पुरी ने तुरंत विचार किया, बरसों से शांत सागर में ज्वार-भाटा आने की संभावना है। पुरी ने पुनः कहा, “”सर, जंगल देख लेते।”

“”जंगल को फिर कभी देखेंगे।” फिर तुरंत स्वयं को संयत करके कहने लगे।

“”मदन ये लोग कौन हैं?”

“”सर, गांव वाले हैं।”

“”इनकी लकड़ियों की जप्ती बनाओ और इनके अंगूठे के निशान लेकर केस पुटअप करो” बड़े साहब ने कहा।

मदन का चेहरा उतर गया था। बड़े साहब जीप में बैठ गये तो पुरी ने धीमे-से कहा, “”सर, ये गरीब लोग हैं, इनका जीवन इसी से चलता है।”

“”तो क्या गीली लकड़ियां काटने दूं? तुम्हें सरकार किस चीज की तनख्वाह देती है?” बड़े साहब ने कहा।

“”सर, आपकी जो सेवा होगी, लोग कर देंगे।” पुरी ने कहा।

“”मेरी सेवा, क्या मतलब?”

“”किस तरह की सेवा?” कम आवाज में बड़े साहब ने प्रश्र्न्न किया।

“”सर ये, ये लड़की जो है वो वो।”

“”वो क्या?”

“”सर किप है।”

“”किसकी?”

“”मदन की।”

“”ओह तब ही वो कह रही थी दाम।”

“”जी-जी सर।”

“”ये मदन को सस्पेंड करो और चार्जशीट दो”, बड़े साहब ने कहा।

“”जी सर” पुरी ने कहा। मदन का चेहरा उतरा हुआ था। वो मां-बेटी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ? वह पुनः गट्ठा उठाकर सिर पर रखने लगी तो मदन ने कहा।

“”इसे यहीं पटका रहने दे।”

“”काहे?” युवती ने ाोध से पूछा।

“”बड़े साहब ने कहा है” मदन ने बेबसी भरे स्वर में कहा।

“”हमें तो कोई ने आज तक नई रोको”, युवती ने नाराजगी भरे स्वर में कहा।

“”मैं कछु नई कर सकूं” मदन ने ग्रामीण बोली में कहा।

“”गरीबों की रोटी छीनने से ये लोगों हे का मिल जे हे?” कहते-कहते युवती का गला भर आया था।

बड़े साहब ने मदन को इशारा किया कि इन्हें लकड़ी ले जाने दे। दोनों ने लकड़ी के गट्ठे को उठाया और गांव की ओर बढ़ गयीं। बड़े साहब जीप से उतरे और मदन के पास पहुंचे, उसके कंधे पर हाथ रखा और एक ओर ले जाकर धीमे से कुछ कहा। मदन सहमति में सिर हिलाता रहा। बड़े साहब लौटकर पुरी के साथ जीप में बैठ गये। लौटते हुए पुरी से बड़े साहब ने केवल इतना ही कहा, “”जंगल की अपनी ही सुंदरता होती है।” जीप तेज गति से शहर की ओर लौट चली थी।

तीन दिन बाद नाकेदार मदन, बड़े साहब के घर रात को पहुंचा। बड़े साहब अकेले टेबिल पर शराब और प्याला लिये बैठे थे। मदन को आया देखकर कहने लगे, “”आओ आओ मदन, अंदर आओ, क्या-हाल चाल हैं?”

मदन सिर झुकाये था, आवाज में उदासी भरी थी। धीमे-से कहा, “”सर, मैंने उससे आपके पास आने का कहा था।”

“”ओह, तो क्या बोली वह?” साहब ने नशे की स्थिति में ही प्रश्र्न्न किया।

“”सर, मैंने उसे बहुत समझाया, उसने मुझे कहा, हमारे पेट भरने के लिए एक ही लकड़ी का गट्ठा काफी है, बड़े साहब को खुश करके पूरा जंगल भी मिल जायेगा तो हम क्या करेंगे? तुम्हारे बड़े साहब से इतना और कह देना कि, जंगल की हवा अपनी मर्जी से बहती है।”

कहकर मदन चुप हो गया।

साहब के हाथ से गिलास नीचे गिर गया था, चारों ओर टूटे कांच के टुकड़े ही टुकड़े बिखरे पड़े थे।

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