जहॉं आज तक कोई रह न सका

राजस्थान के दूसरे सबसे बड़े शहर जोधपुर की पहचान न केवल ऐतिहासिक विरासतों के लिए है, अपितु साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश करने में भी यह पीछे नहीं है। शहर के चप्पे-चप्पे पर बने मंदिर व मस्जिद आपसी भाईचारा व प्रेम की ऐसी इबारतें लिख चुके हैं, जिन्हें मिटाना नामुमकिन है।

मारवाड़ के तत्कालीन महाराजाओं ने हिन्दू व मुस्लिम परिवारों को एक समान आदर देते हुए, उनके धर्मों के प्रति अटूट श्रद्घा भी रखी। जोधपुर शहर की तलहटी में यहॉं के तत्कालीन महाराजा राव मालदेव ने सुरक्षा की दृष्टि से चांदपोल दरवाजे का निर्माण करवाया था और इसी दरवाजे के बाहर पूर्व दिशा में छः बीघा क्षेत्र है, जो कि “मियां का बाग’ के नाम से प्रदेश में प्रसिद्घ है और यहीं करामाती पीर “ख्वा़जा फरासत’ की म़जार है, जिसे मारवाड़ नरेश जसवंत सिंह (प्रथम) ने बनवाई थी।

“ख्वा़जा फरासत’ के बारे में बहुचर्चित है कि मारवाड़ नरेश के पिता महाराज गजसिंह की आगरा के किले में वि.सं. 1695 को मृत्यु हुई थी। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र जसवंत सिंह को मारवाड़ का उत्तराधिकारी बना दिया था। बाद में शाहजहॉं ने वि.सं. 1695 में ही आगरा के किले में जसवंत का राजतिलक कर मारवाड़ भेज दिया। शाहजहॉं के विश्र्वासपात्र नरेश जसवंत सिंह को एक बार आगरे की देखभाल के लिए बुलाया गया था, जब वे लाहौर पर चढ़ाई करने जा रहे थे। यहीं वि.सं. 1701 में जसवंत सिंह की इस करामाती पीर से मुलाकात हुई थी। ये न केवल बहादुर ही थे, बल्कि कुशल प्रशासक भी थे। अतः जसवंत सिंह ने इन्हें विश्र्वासपात्र समझ कर जोधपुर का प्रबंध देखने हेतु यहॉं भेजा था। ख्वाजा फरासत ने 3 वर्ष तक जोधपुर के प्रबंध की देखभाल की, लेकिन वे पूरी तरह सफल नहीं हुए, तब वि.सं. 1704 में महाराजा जसवंत सिंह ने इनसे मारवाड़ का प्रबंध व देखभाल का कार्य अपने हाथों में ले लिया।

ख्वाजा फरासत करामाती व खुदा की बंदगी में रमे रहने वाले शख्स थे, इसलिए महाराजा ने इन्हें जोधपुर में ही रहने का अनुरोध किया, जिसे इन्होंने मान लिया। हिन्दू व मुस्लिम इनका यथोचित सम्मान करते थे। इन्होंने अपनी करामात से कइयों को चमत्कृत कर रखा था।

कई वर्षों बाद जब इनका इन्तकाल जोधपुर में हुआ तो महाराजा साहब ने उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ शहर के बाहरी दरवाजे चांदपोल के बाहर दफना दिया और उस जगह भव्य मजार बनवाकर उसे मकबरे का रूप दे दिया।

बाद में इसी पीर से अभिभूत हो, जब औरंगजेब जोधपुर आया, तो उसने भी श्रद्घावश उनकी स्मृति में दो विशाल मीनारें मकबरे के पास बनवाई थीं। ख्वाजा साहब की दरगाह में आसपास बसे हिन्दू-मुस्लिम नियमित रूप से आते हैं, लेकिन यहां रहस्यपूर्ण बात यह है कि जब भी पीर साहब का कोई भी मुर्शिद दरगाह में ठहरने या रात्रि के समय सोने का भी प्रयास करता है तो यहां उसे रहस्यमयी आवाजें सुनने को मिलती हैं। एक अजीबोगरीब डर का एहसास होता है और उसे दरगाह परिसर को छोड़ना ही पड़ता है।

ख्वाजा साहब की दरगाह की देखभाल माली (हिन्दू) करते हैं। ख्वाजा फरासत की मजार के कारण ही बाद में इस क्षेत्र का नाम “मियां का बाग’ पड़ा। इस बाग में पानी की विशाल बावड़ी है, जिसे सवाई राजा शूरसिंह की पुत्री इन्दा कंवर ने बनवाई थी। मियां का बाग में ख्वाजों की कृपा से भरपूर फल व सब्जियां होती थीं। यहॉं के श्रद्घालुओं का कहना है कि यहॉं की हर फसल का एक हिस्सा “भोग’ के तौर पर पीर साहब की मजार पर चढ़ता था। रोचक बात तो यह भी है कि यहां बगीचे में पैदा होने वाली गोभी का एक फूल रजवाड़ों के जमाने में एक चांदी के सिक्के में बिकता था।

बढ़ती आबादी के फलस्वरूप अब मियां का बाग रख-रखाव के अभाव में स्वयं के उजड़ने की पीड़ा भोग रहा है। यहॉं तक कि घाटू के पत्थरों से बनी 30-30 फुट ऊँची कलात्मक मीनारें भी जर्जरावस्था में हैं।

ख्वाजा साहब की मजार व मकबरा अब भी सुरक्षित होने की वजह से हिन्दू-मुस्लिमों की आस्था के प्रतीक इस दरगाह में ख्वा़जा फरासत की हजूरी में श्रद्घालुओं के प्रतिदिन सिर झुकते नजर आते हैं व दूर-दराज क्षेत्र से भी बड़ी तादात में मुस्लिम भाई भी स़जदा करने आते हैं।

– चेतन चौहान

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