तरक्की का मतलब

हममें से अधिकांश लोग इस बात से सहमत होंगे कि आज की तारीख में दुनिया में बड़ी ते़जी से तरक्की हो रही है, लेकिन अगर उनसे यह पूछा जाय कि आखिर तरक्की का मतलब क्या है? तो हर आदमी की इस बात पर अलग-अलग राय होगी। यह राय उस आदमी की वैचारिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है। यहॉं पर हम कुछ ऐसी ही चीजों पर विचार करेंगे।

क्या तरक्की का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जब हम सड़क पर निकलें तो वाहनों की चिल्ल-पों सुन-सुन कर हमारा दिमाग-चकराने लगे। सड़क पार करने में हमें खासी मशक्कत करनी पड़े। घर से निकलें तो हम किसी चौक-चौराहे पर लम्बे जाम में फंस जायें और यहॉं से निकलने के लिए हम अनायास ही अपने इष्टदेव को याद करने लगें। बढ़ते प्रदूषण से हमें सांस लेना भी भारी लगने लगे और तेज रफ्तार वाहनों की भागमभाग के बीच से जब हम सुरक्षित अपने गन्तव्य पर पहुँच जायें, तो ईश्र्वर को तत्काल धन्यवाद देने लगें। सुबह को जब हम अखबार के पन्ने पलटें तो वाहन दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें हमें रोजमर्रा का रूटीन लगे और हम उन पर सरसरी नजर डालकर ही आगे बढ़ जायें।

क्या इस दौर-ए-तरक्की का एक अर्थ यह नहीं हो सकता कि लाख से लेकर करोड़ तक का घोटाला हमें राई या तिनके-सा ही महसूस हो। जब हम भ्रष्टाचार को तरक्की का वरदान समझने लगें, नैतिकता की बात हमें महज एक कॉमेडी लगने लगे।

पहले जहॉं पैसे देकर हम किसी भी सरकारी ऑफिस से अपना काम शार्टकट में करा लेते थे, लेकिन आज पैसे देकर भी हमें बाबू टरकाता रहे। हम धक्के खाते रहें। हमारा धन, धर्म सब कुछ लेकर भी हमारा काम न बने- तो हमें तरक्की की बात पर पक्का यकीन हो सकता है।

इसी तरक्की का एक मतलब यह भी हो सकता है कि शहर में रोज ही कोई न कोई जुलूस निकलता मिले और उसकी वजह से हम अपने गन्तव्य पर एकाध घंटा लेट पहुँचें या फिर किसी मंत्री की गाड़ियों का काफिला हमारा रास्ता अवरुद्घ करे और कुछ देर के लिए ही सही, मगर हम सड़क पर चलने का अधिकार ही खो बैठें।

जरा-जरा-सी बात पर धरना या प्रदर्शन हो और जिन्दाबाद, मुर्दाबाद के शोर से हमारे कानों के परदे फटने लगें। सरकार किसी भी समस्या को तब तक कोई तवज्जो न दे और जब तक उसका विकरालतम स्वरूप प्रकट न हो जाए और जब तक ध्यान दे, तब तक काफी कुछ खो चुका हो। क्या ये लक्षण तरक्की के नहीं हो सकते?

क्या तरक्की का एक अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम इतने आत्मकेन्द्रित हो जायें कि हमें अपने चारों तरफ के परिवेश की कोई परवाह ही न रहे। हमारा ऩजरिया इतना क्षुद्र हो जाय कि हमें रात-दिन अपना ही घर भरने की चिन्ता लगी रहे। हमारे परिवार में से हमें जन्म देने वाले माता-पिता का ही नाम कट जाये और हम अपनी बीवी और बच्चों को ही अपना सम्पूर्ण परिवार समझने लगें। हमारे पड़ोस में कोई भूखा है या नंगा है तो हमें क्या? हमारा पेट भरना चाहिये। समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है- इन बातों को भूलकर हम अपने मनोरंजन में व्यस्त हो जायें, तो यह सारे लक्षण हमें तरक्कीशुदा सिद्घ करने के लिए काफी हैं।

तरक्की का मतलब यह भी हो सकता है कि एक अकेली महिला घर से बाहर निकलने से पहले सौ बार सोचे। उसके मन में रह-रह कर यह ख्याल आने लगे कि सड़क पर कोई भूखा भेड़िया तो उसको नोचने को तैयार नहीं बैठा है? जवान लड़की अपने ही घर में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। उसे हर पल अपने ही किसी परिजन द्वारा अपनी इज्जत लुटने का डर सताने लगे।

जब मासूम बच्चे-बच्चियॉं भी समाज के संभ्रांत लोगों से डर महसूस करने लगें, स्त्री घर-बाहर कहीं भी खुद के उत्पीड़ित होने की आशंका से घिरी हो, वासना के बाजार में वह मात्र एक प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल होने लगे- तो समझ लेना चाहिये कि यह समाज वाकई प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

तरक्की का एक लक्षण यह भी हो सकता है कि आदमी खुद को शिक्षित व सभ्य समझने लगे। उसके खान-पान व रहन-सहन की शैली में व्यापक बदलाव होने लगे, किन्तु आचरण में उसका रुख निरन्तर अधोगामी होने लगे। सूट-बूट पहन लेने से ही वह खुद को समाज का प्रगतिशील नागरिक अनुभव करने लगे और नैतिकता जैसी कोई चीज उसके शब्दकोश में न रहे। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में मानवीय मान-मर्यादा को अपने पैरों से कुचलता चला जाय। इस आपाधापी में आदमी ही आदमी से भयभीत होने लगे। कानून सिर्फ कागजों में रह जाय और इसे बनाने वाले ही इसे पैरों से रौंदते नजर आयें- तो क्या यह सब समाज की तरक्की का पैमाना नहीं हो सकता?

क्या हमें इस तरक्की का यह अर्थ नहीं निकालना चाहिये कि इन्सान और शैतान के बीच का फर्क मिटने लगे। समाज में हिंसा और नफरत फैलाने वाले तत्वों का सम्मान होने लगे। रक्षक भक्षक बन जायें, बाड़ ही खेत को खाने लगे। नेता या तो श्रोता बन जायें या विक्रेता। जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग अपना कर्त्तव्य भूलकर सिर्फ अधिकार याद रखने लगें।

हरामखोरों का व्यवस्था पर वर्चस्व कायम हो जाय। आपसी विश्र्वास और भाईचारे का खात्मा होने लगे। हर आदमी का ध्यान किसी भी तरह से ज्यादा से ज्यादा धन कमाने पर लग जाय। सच्चाई और ईमानदारी का सर्वत्र मखौल उड़ने लगे। साधु और डाकू की पहचान मुश्किल होने लगे। चोर और सिपाही का फर्क मिटने लगे- तो ऐसे माहौल को हम तरक्की नहीं तो और क्या कह सकते हैं?

 

– प्रेमस्वरूप गंगवार

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