थके-हारे परिंदे

पश्र्चिम एक्सप्रेस थोंदला रोड़ की सुरम्य घाटी से सर्पाकार हो गु़जर रही थी। किन्तु उनका मन घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का पान करने की बजाय मेघनगर स्टेशन पर विदा देने आये उनके साथी निहार सिंह की बातों में ज्यादा रम रहा था, “”मास्टरजी, तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम्हारा लड़का बहुत बड़ा इंजीनियर है। अब तुम उसके साथ रहोगे, बढ़िया-बढ़िया खाओगे-पीओगे, पहनोगे-ओढ़ोगे, कार में बैठकर चलोगे, सेवा-टहल के लिए नौकर-चाकर, रोग-दोख के समय सार-संभाल के लिए रत्ती-रत्ती होते बेटा-बहू। मास्टरजी, बुढ़ापे में इन्सान को इससे ज्यादा और क्या चाहिए? मनुष्य का बुढ़ापा संवर गया, समझ लो पूरी जिन्दगी संवर गयी। अंत भला तो सब भला।”

अपने भाग्य के लिए निहाल सिंह की तारीफ सुनकर स्टेशन पर उन्हें विचार आया था कि वह निहाल सिंह से कह दे “”यार! भारी-भरकम इंजीनियर का बाप बनने में भाग्य-वाग्य कुछ नहीं है। यह तो कमरतोड़ मेहनत-परिश्रम, त्याग-तपस्या एवं साधना का महत्व है। हर आदमी कर सकता है, इतनी त्याग-तपस्या, परिश्रम अपनी औलाद के लिए।”

पैंतीस साल की भी कोई उम्र होती है? घरवाली उन्हें इसी उम्र में दगा दे गयी थी। उस समय वह उद्दाम यौवन से प्रदीप्त युवक थे। उनके चेहरे से ओज छत्ते से शहद की तरह टपकता था। रोटी-रोजी से वह लैस थे। भला इस तरह का आदमी इत्ती-सी ही उम्र में विधुर रहने का बोझ क्यों उठाएगा? लेकिन उन्होंने उमेश की खातिर सारे मौज-शौक, इच्छाओं को खूटी पर टांग दिया था। घर में दूसरी आएगी तो अपनी सौतन की औलाद को फलने-फूलने नहीं देगी। उनकी दूसरी शादी के लिए बहुत लोग आये थे। लोगों ने उनसे बहुत कहा था, “”दूसरी शादी कर लो रमेशजी। अभी आपकी कोई बड़ी उम्र नहीं है। इस पहाड़-सी जिन्दगी को अकेले कब तक ढोओगे?” … परंतु उन्होंने उमेश के भविष्य की खातिर किसी एक की भी नहीं मानी। उसके लिए उन्होंने विधुर रहना ही उचित समझा। उमेश को उसकी मां तीन साल का छोड़कर मरी थी। तभी से ही उन्होंने उमेश के समझदार होने तक उसे गले में बंधे ताबीज की तरह, हर समय अपने साथ रखा। वह सुबह अंधेरे में उठते, घर के सारे कामकाज, रोटी-पानी से निपटते। स्वयं तैयार होते, उमेश को तैयार करते। सुबह दस बजे तक तो सारे कामों से फारिग हो, उमेश को अपने साथ ले स्कूल जा पहुंचते। फिर शाम को घर लौटते। घर के कामकाज कर उमेश को पढ़ाते। उन्होंने उसे अपने ही स्कूल में भरती कर लिया था। उमेश जब इंजीनियरिंग कॉलेज में गया, तब तो उन्हें हाड़तोड मेहनत करनी पड़ी। उसके खर्चे के जुगाड़ के लिए उन्होंने अपना तबादला ग्रामीण क्षेत्र से शहर में करवा लिया था। वहां दस-दस बजे रात तक ट्यूशनों में आँखें फोड़ीं। घरवाली के सब गहने-गुड़िया उसकी पढ़ाई में हवन कर दिये। तब कहीं पूरी हुई उसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई।

अब उसकी नौकरी दिल्ली महानगर में लग गई है। साल में एकाध बार आता है उनके पास। कभी-कभी उनसे भी वहीं चलने को कहता है तो अभी तक तो वह उससे यही कहते आये हैं, “”वहां महानगर में मेरा मन थोड़े ही लगेगा भैया। वहां की मशीनी जिंदगी मुझे रास नहीं। आदमी को आदमी से बात करने की वहां फुर्सत नहीं। अड़ोसी-पड़ोसी आपस में अजनबी की तरह रहते हैं। यहां गांव की तरह सुबह-शाम मिल-बैठना, एक-दूसरे के दुःख-दर्द में हिस्सेदारी बढ़ाना। ऐसी आत्मीयता वहां देखना चील के घोंसले में मांस टटोलने के बराबर है। स्वच्छ हवा-पानी के लिए भी मोहताज रहना पड़ता है वहॉं। मार धुआं… धक्कड़… रेलमपेल।”

अब उनकी उम्र पक गयी है। पता नहीं पके आम की तरह कब पेड़ की टहनी से टूट पड़े? यहां गांव में रहने पर लोग उमेश को बुलायेंगे। वह आयेगा तब तक मिट्टी खराब होती रहेगी। सो अब वह उसी के पास जा रहे हैं। कुछ होने पर किसी को कोई परेशानी न हो। इधर मुसाफिर ने सराय खाली करी। उधर पिंजरा आग के हवाले। छिति, जल, पावक, गगन, समीरा… सब अपने-अपने तत्व अपने-अपने में बिलायमान… कुछ ही घंटों में सारा टंटा साफ। किसी को कोई परेशानी नहीं… न किसी को टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स की आवश्यकता।

सिविल लाइंस की बड़ी-बड़ी कोठियां शाम को डूबते सूरज की लालिमा में दिपदिपा रही थीं। एक बड़ी-सी कोठी के सामने आकर उन्होंने एक युवक से पूछा, “”क्यों बेटा, यह कोठी उमेश सक्सेना एक्स ईएन की ही है न?” युवक ने समर्थन में सिर हिलाते हुए कहा, “”हां बाबा, उनकी ही है….” “”शाबाश बेटा, जुग-जुग जिओ…” वह उसको आशीष देने लगे और कोठी के मुख्य फाटक पर जा पहुंचे। कोठी के बाहर लगी बड़ी भारी नेम प्लेट को भी उन्होंने पढ़ा। स्वयं के मन को फिर तसल्ली दी कि यह उसी की ही कोठी है। कोठी के बाहर फाटक से अंदरूनी दालान तक दोनों ओर करीने से कटी मेहंदी की झाड़ियों के बीच रास्ता बना हुआ था। रास्ते में गुलमोहर के फूल जैसी लाल रंग की मुरम बिछी हुई थी। मेहंदी के अगल-बगल में लंबा-चौड़ा बगीचा था। बगीचे में जूही, मोगरा, रात की रानी, चमेली, गेंदा पता नहीं कौन-कौन से अनोखे-अनोखे फूल खिले थे। दालान तक फैले बगीचे के खिलते फूलों की महक हवा के घोड़े पर सवार हो, उनके फेफड़ों में घुसी तो उन्हें रास्ते की आधी थकान उतरती-सी अनुभव हुई। वह दालान से उमेश को ढूंढने के लिए उसके डाइंग-रूम में घुस गये। वहां उमेश नहीं दिखा, पर डाइंग-रूम की वैभवशाली सजावट देख कुछ देर तक वहीं हक्के-बक्के से खड़े रहे। डाइंग-रूम की खिड़कियों पर रंग-बिरंगे आकर्षक महंगे पर्दे लटक रहे थे। डाइंग-रूम के चारों कोनों में पीतल के चमचमाते घड़ों में मनी प्लांट की बेलें थीं। महंगे-महंगे सोफासेट डाइंग-रूम की शोभा बढ़ा रहे थे। डाइंग-रूम के बीच में ग्रेनाइट की सेंटर टेबल थी। दीवारों पर टंगे हुए बहुमूल्य तैल चित्र थे तथा लकड़ियों की जीवंत कलाकृतियां भी थीं। डाइंग-रूम में आमने-सामने अजूबी पेंटिंग के बड़े-बड़े बोर्ड भी थे। फर्श पर मखमली कालीन बिछा हुआ था। एकाएक उनके मुख से निकल पड़ा, “”मेरे बेटे के ये ठाठ! यह इंद्रपुरी जैसा वैभव।”

डाइंग-रूम में उमेश के न दिखने पर वह अंदर पहुंचे। वहां भी उसके बच्चे, उसकी पत्नी निरमा नहीं दिखी। वह फिर लौट कर दालान में आये। इस बार उन्हें बाग में पेड़-पौधों को पानी देता माली नजर आया। वे उससे ही पूछने लगे, “”एऽऽ भैया! वह…?” किंतु उन्होंने इस बार मुंह से निकलते शब्दों पर ताला लगा दिया, मैं भी यार, निरा मास्टर ही ठहरा। जैसे उमेश भारी-भरकम इंजीनियर न होकर कक्षा दो का विद्यार्थी हो। उसके लिए यह तू-तड़ाक भरा संबोधन। वह पुनः अपने शब्दों पर सम्मान का आवरण पहनाते हुए माली से पूछने लगे, “”अरे भैया…. तुम्हारे साहब?” गोरखा माली उनकी तरफ उन्मुख हुआ, “”क्या चाहता बाबा?” उनके मन में आया कि कहे, “”अरे बेवकूफ ढंग से बोल, मैं तेरे साहब का बाप…।” किंतु उन्होंने तुरंत इस विचार को मन में रमता कर दिया। छोड़ो यार.. काहे को इसके मुंह लगा जाये? छोटा आदमी है, जितनी उसमें लियाकत होगी, वैसी ही तो बात करेगा। “”तुम्हारे साहब के पास आया हूं।”

“”उनके गांव से आया?”

“”हॉंऽऽऽ…”

“”तो इधर ही बैठो, उधर कोठी में नहीं जाने का। साहब-मेम-बच्चा लोग मारकीट गया… जब आ जाय मिल लेना…” कहकर वह पुनः अपने काम में लग गया। कभी-कभी उसकी निगाह उनके सिलवट भरे कुर्ता-पायजामा पर चली जाती थी।

(ामशः)

– विपुल ज्वाला प्रसाद

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