दर्द का अहसास

dard-ka-ehasasआदित्य बहुत ही चंचल प्रवृत्ति का लड़का था। वह सारा दिन मौज-मस्ती और शरारत में बिताता था। पढ़ाई के प्रति भी वह बहुत लापरवाह था। उसके मम्मी-पापा उसे बहुत समझाते थे मगर उसके कान पर जूँ तक नहीं रेंगती थी।

एक दिन उसकी छोटी बहन अदिति को बुखार आ गया। उसके पापा ने उसे डॉक्टर से दवाई लाने के लिए भेजा। जब वह दवाई लेने जा रहा था, तो रास्ते में उसे उसके कुछ दोस्त खेलते हुए दिखाई दिये। वह भी उनके साथ खेलने लग गया। खेलते-खेलते शाम हो गई। अचानक उसे ध्यान आया कि उसे अदिति के लिए दवाई लेने जाना था। वह जल्दी से डॉक्टर के पास गया और दवाई लेकर घर पहुँचा। घर आते ही उसके मम्मी-पापा उस पर बरस पड़े, “”अरे नालायक! तुझे अपनी छोटी बहन का ़जरा भी ख्याल नहीं आया। देख तो सही, इसका शरीर कितना तप रहा है और तू अब दवाई लेकर आ रहा है। शर्म आती है हमें कि हमने तेरे जैसा बेटा जना है।”

“”मुझे माफ कर दो पापा! मैं आज के बाद कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा।” आदित्य ने छोटा-सा मुँह बनाते हुए कहा। उसके पापा ने सोचा, शायद आदित्य में परिवर्तन आ गया है। इसलिए उन्होंने उसे माफ कर दिया।

मगर उसकी आदतों में अभी भी कोई सुधार नहीं आया था। एक दिन उसके पापा को बहुत तेज बुखार आ गया।

उसकी मम्मी ने फिर उसे दवाई लाने के लिए भेजा। जब वह दवाई लेने जा रहा था तो रास्ते में एक मदारी तमाशा दिखा रहा था। वह वहीं रुककर तमाशा देखने लगा। तमाशा खत्म होने पर वह दवाई लेने पहुँचा तो वहॉं मरीजों की बहुत भीड़ लगी थी। आज भी उसे दवाई लाने में काफी देर हो गई थी। उसकी मॉं ने उसे बहुत डॉंटा। वह नीची गर्दन किये चुपचाप खड़ा होकर डॉंट सुनता रहा।

एक दिन आदित्य के मम्मी-पापा को बाहर जाना पड़ा। उस दिन अचानक उसके पेट में ़जोर का दर्द हो गया। वह दर्द से कराहने लगा। जब उसकी छोटी बहन ने उसे दर्द से तड़पते देखा तो वह तुरंत डॉक्टर के पास गई और दवाई लाकर आदित्य को खिलाई। कुछ ही देर में उसका दर्द ठीक हो गया। आज उसे अहसास हुआ था कि पीड़ा क्या होती है? वह अदिति से हाथ जोड़कर माफी मॉंगने लगा, “”बहना, मुझे माफ कर दो। जब तुम्हें बुखार था तो मैं तुम्हारी तकलीफ की परवाह किए बगैर अपने दोस्तों के साथ खेलता रहा। पापा को बुखार आया तो मैं मदारी का तमाशा देखने में मस्त हो गया था। यदि आज तुम समय पर दवाई नहीं लाती तो दर्द के मारे मेरा तो दम ही निकल जाता। आज मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। मैं अब भविष्य में कोई लापरवाही नहीं बरतूंगा। मेहनत और लगन से काम करूंगा।” आदित्य की बात उसके मम्मी-पापा भी वहीं खड़े-खड़े सुन रहे थे। आदित्य के मम्मी-पापा खुश थे कि आदित्य के पेट-दर्द ने उसमें परिवर्तन ला दिया है और अब उसे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होने लगा है।

 

– विनोद वर्मा “दुर्गेश’

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