दहशत से दहलता देश

अपने अस्तित्व से लड़खड़ाता भारत जहॉं एक ओर स्वर्गिक मौज-मस्ती और बेलौसपन देखकर स्तब्ध है, वहीं दूसरी ओर हजारों बंदिशों और बेबसी से उपजे मौन और मौत की हृदय विदारक दास्तान भी बयां कर रहा है। लोकतंत्र के चौराहे पर खड़ी अनेक असहनीय कष्टों से जूझती एवं मुसीबतें ढोकर भी जीने को विवश परेशान हाल जनता सुकून और खुशी के रास्ते पर चलना चाहती है, परन्तु एक से बढ़कर एक तीखे तीर बन चुके चारों रास्तों ने उसका सीना छीलकर तड़पने को छोड़ दिया है। एक ओर आतंकवाद का खौफनाक नाग है तो दूसरी ओर अलगाववाद और क्षेत्रवाद की भयंकर आँधी, तीसरी ओर महंगाई की भीषण विभीषिका है तो चौथी ओर षडयंत्रकारी गोरखधंधे की घासमंडी बन चुकी विकृत राजनीति।

जब जयपुर में 9 आतंकी सीरियल बम ब्लास्टों ने 67 लोगों को मौत के घाट उतार सैकड़ों को जख्मी कर दिया था, तभी आतंकवाद पर आम राष्टीय सहमति पर जोर दिया गया था, परन्तु लगभग ढाई महीने बाद 25 जुलाई को सूचना प्रौद्योगिकी के गढ़ बेंगलूरू में 75 मिनिटों के अंतराल पर नौ सीरियल धमाकों और उसके तुरंत बाद अगले ही दिन रेड अलर्ट करने के बावजूद अहमदाबाद में 26 जुलाई को केवल 90 मिनिटों के दरम्यान 17 आतंकी विस्फोटों द्वारा 50 लोगों की मौत और 100 से अधिक लोगों का बुरी तरह घायल हो जाना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आतंकी तंत्र बहुत शक्तिशाली और सटीक है। वे जहां चाहें, जब चाहें अपना रक्त रंजित खेल, खेल सकते हैं और हमारा सुरक्षा तंत्र आतंकवादियों के मुकाबले बिल्कुल जीरो है। बेंगलूरू में तो सभी बम मिट्टी के नीचे प्लांट किए गए थे, जिसमें काफी समय लगा होगा परन्तु हमारे खुफिया विभाग को भनक तक नहीं लगी। इसी लापरवाही का फायदा आतंकवादियों ने अहमदाबाद में उठाकर ऐसा मौत का तांडव रचा कि लोग विस्फोट से कई फुट ऊपर उछल गए। चारों ओर खून, मांस के चीथड़े और हाहाकार। इतने खतरनाक मंसूबे कि घायलों को अस्पताल पहुँचाने से रोकने के लिए अस्पतालों को भी विस्फोट की जद में ले लिया गया। अब राजधानी दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने एक बार फिर जनता की जान-माल की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिया है।

आतंकवादियों के दिनोंदिन तेजी से बढ़ते हौसले सरकार की नाकामियों का परिणाम है। पिछले केवल ढाई वर्षों में ही दिल्ली, वाराणसी, मुंबई, लोकल टेन, मालेगांव, अटारी एक्सप्रेस, हैदराबाद के बाजार और मस्जिद, अजमेर शरीफ और रामपुर सीआर.पी.एफ. शिविर आदि अनेक स्थानों पर 15 से अधिक बम धमाकों ने देश की धरती पर निर्दोषों का खून बहाया। उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन द्वारा भी आतंकवाद विरोधी कानून की आवश्यकता पर जोर देने के बावजूद सरकार पोटा जैसे कानून की समाप्ति को सही ठहराने पर तुली हुई है। गृह-मंत्रालय ने तो जैसे अपना बयान फोटोस्टेट करवाकर रख लिया है, हर आतंकी घटना के बाद उसे जारी कर कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।

रहस्यमयी चोला ओढ़े अनियंत्रित राजनीतिज्ञ हर घटना को वोट बैंक के चश्मे से देखने में लगे हैं। जो स्वयं विस्फोट करने पर तुले हों वे विस्फोटों को क्या रोकेंगे? 22 जुलाई को संसद में जो हुआ, वो जनता के लिए किसी भयंकर विस्फोट से कम नहीं था, जिससे जनमानस की अंतरात्मा तक घायल हो गई। संसद में नोटों को लहराकर जिस प्रकार लहूलुहान होते लोकतंत्र को दम तोड़ने पर विवश किया गया, जिस प्रकार संवैधानिक मर्यादा, निष्ठा और नैतिकता को चीर-चीरकर चरित्रहीनता की इबारत लिखी गई, उससे आतंकियों और गुण्डों के हौसले तो बुलंद हुए हैं परन्तु देश के आम आदमी के दिल में अपनी खुशहाली की आखिरी आशा की किरण भी समाप्त हो गई है।

ऐसा नहीं कि यह घूस की राजनीति की पहली मिसाल है। पहले भी अनेक बार राजनेताओं ने लोकतंत्र को शर्मसार किया है। जीप घोटाला, 1987 का बोफोर्स कांड, 1993 का जेएमएम घूसकांड, 1984 का लखूभाई पाठक धोखाधड़ी घोटाला, 1997 का टेलीफोन खरीद मामला, तहलका कांड, ऑपरेशन दुर्योधन और ऑपरेशन चाव्यूह आदि रिश्र्वतखोरी और कमीशन खोरी की घिनौनी घटनाएँ इतिहास के काले पृष्ठों में समा चुकी हैं, परन्तु अब इसकी इन्तहा नजर आने लगी है। ईमानदारी और पद के प्रति न्याय बरतने वालों का ऐसा हश्र हो रहा है जो लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ दा का माकपा ने किया है। यहां वही टिका रह सकता है, जो जनता की चिन्ता छोड़ अवसरवादिता और वोट बैंक की राजनीति को महत्व दे। इसी वोट बैंक की राजनीति के कारण ही झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, असम आदि राज्यों की जनता नक्सलवादियों और माओवादियों का कहर झेल रही है।

नेता खुद तो एयरकंडीशन कमरों में बैठे मौज उड़ाते रहते हैं। जनता, सुरक्षा बल और जवान आतंकवाद के निशाने पर आ जाते हैं। रांची से 25-30 किलोमीटर दूर स्थिति इतनी विस्फोटक है कि दिन में भी कोई पुलिसवाला वर्दी पहनकर नहीं निकलता और थानों में ताले लटके रहते हैं। अभी 29 जून को उड़ीसा के मल्काजगिरि क्षेत्र में नक्सलियों ने एक नाव को डुबोकर 35 जवानों को मौत के घाट उतारा, जिसमें अनेक घायल भी हुए। 17 जुलाई 2008 को इसी इलाके में कालीमेला-मोटो रोड पर बारूदी सुरंग विस्फोट कर जवानों की वैन उड़ा दी गई, जिससे 21 जवान वहीं मारे गए। रेलवे लाइन उड़ाने, बंद, प्रदर्शन तथा जाम तो जैसे उनकी रोज की चर्या है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में बारामूला हाइवे पर आतंकियों के विस्फोट से 19 जुलाई को 9 जवान मारे गए तथा 20 घायल हुए। उसके बाद 24 जुलाई को बटमालू बस स्टैंड पर हमला कर 6 लोगों को मौत के घाट उतारा और 11 को घायल कर दिया गया।

नेता हैं कि स्वार्थपूर्ण राजनीति को जिन्दा रखने की कवायद में लगे हैं। कोई जातिगत गोलबन्दी की रणनीति बना रहा है तो कोई अलगाववाद की। अभी 10 जुलाई को अलग तेलंगाना राज्य की मांग के समर्थन में टीआरएस द्वारा आयोजित “बंद’ हिंसा में बदल गया। बसों में आग लगा दी गई, टेनें रोकी गईं तथा स्कूल-कॉलेज प्रतिष्ठान तक बन्द करवा दिये गये। ऐसे में रामविलास पासवान का 10 जुलाई को बयान आया कि वे निजी क्षेत्र में आरक्षण के लिए सीधी कार्यवाही करेंगे। उनका यह बयान देश को एक बार फिर गुर्जर आन्दोलन जैसी विभीषिका की ओर धकेलने का संकेत दे रहा है। लोग जाएं भाड़ में, उन्हें तो बस अपनी राजनीति चमकाकर सत्ता सुख भोगने से मतलब है। इसी नीति पर चलकर संशोधन के नाम पर राजनेताओं ने संविधान में 100 से भी अधिक कीलें गाड़कर उसका स्वरूप बदल डाला है।

श्राइन बोर्ड भूमि विवाद इतना भड़का दिया गया कि इन्दौर सहित पूरा देश झुलस गया। राजनीति के साथ अध्यात्म भी गंदला होता जा रहा है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरु राम रहीम समर्थकों एवं विरोधियों के बीच तनातनी से पूरा पंजाब- हरियाणा तोड़-फोड़, मारकाट से जूझ रहा है। तो इसी तर्ज पर आसाराम बापू के आश्रम में बच्चों की मौत से भड़के मामले में अहमदाबाद एवं मध्यप्रदेश में बवाल मचा। हिंसा, मारकाट, आगजनी के दौर में पत्रकारों तक को बेरहमी से पीटा गया। हैरत होती है कि धर्म गुरुओं का अपने अनुयायियों तक पर अंकुश नहीं है। क्या इससे यह सन्देश नहीं जाता कि जनता को आगजनी, लूटपाट और बन्द तथा मजबूरी की भट्टी में झोंकने के वे ही दोषी हैं। ऐसी परिस्थितियों के कारण ही देश में साम्प्रदायिक माहंौल गरमाने लगा है। 24 जुलाई को गाजियाबाद के लोनी शहर में एक धार्मिक स्थल की दीवार तोड़े जाने तथा धार्मिक पुस्तक को अपमानित किए जाने की घटना से भड़के दंगे में शहर की तीन कॉलोनियों में चीख पुकार मच गई, जलते वाहनों और घरों के कारण चारों ओर आग और धुआं फैल गया। जरा-सी भी घटना से लोग तिलमिलाने लगे हैं।

जिस प्रकार सूरत के पुरना इलाके से जिलेटिन की छड़ों ओर अन्य विस्फोटक पदार्थों से भरी कार बरामद हुई और बाद में लगातार बम बरामद होते रहे। लोगों को घर से बाहर न निकलने की एहतियातन सलाह देकर सिनेमाघरों के शो रद्द कर दिए गए, जिस प्रकार दहशतगर्दों द्वारा मुंबई और दिल्ली के मॉल उड़ाने की धमकी दी गई है, मुम्बई का सिद्घि विनायक मंदिर भी आतंक की जद में बताया जा रहा है, उससे लगता है कि पूरे देश में आतंक का साया मंडरा रहा है, उसके मद्देनजर आतंक और अनिश्र्चितता के आवरण में लिपटी जनता के माथे पर असंख्य सलवटें उभर आईं है। जो यही कहानी कहती नजर आ रही हैं कि “दहशत भरे देश में आखिर अगला निशाना कौन है?’

 

– सुषमा जैन

 

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