देवताओं की काश्त किया करते थे कुल्लू के लोग

kullu-ke-logकुल्लू के लोग जमीन के औपचारिक बंदोबस्त से पहले देवताओं के मुजारे थे। ये लोग देवताओं की जमीन से अनाज पैदा करते थे और बदले में उन्हें कर देते थे।

कुल्लू में देवताओं का इतिहास बहुत प्राचीन है। इन देवताओं की अपनी एक अनूठी व्यवस्था है। प्रत्येक गांव का एक प्रमुख देवता है। उसके आगे चार-पांच गांव के समूह का एक साझा देवता होता है। इन्हीं गांवों के समूह को देवता की “हार’ यानी “प्रजा’ कहते हैं। समूचे कुल्लू जनपद के प्रमुख अधिष्ठाता देवता कुल्लू के रघुनाथ जी हैं। कुल्लू में रघुनाथ को “ठाकर’ भी कहते हैं। इसी प्रकार यहां की अधिष्ठात्री देवी “हिडिम्बा’ है।

ऐतिहासिक प्रसंग प्रसिद्घ है कि कुल्लू के राजा जगत सिंह ने ब्रह्महत्या का प्रायश्र्चित करने के लिए अयोध्या से रघुनाथ जी की प्रतिमा मंगवाकर कुल्लू में प्रस्थापित की। अपना राजपाट रघुनाथ जी को सौंप दिया और स्वयं देवता का छड़ीबरदार बनकर राज्य करने लगे थे। यह घटना विजयादशमी के दिन की है। इस अवसर पर घाटी के सभी देवताओं ने कुल्लू पधार कर रघुनाथ जी का अभिनंदन किया था।

जब राजा ने समस्त राज्य रघुनाथ जी को समर्पित कर दिया तो उसी समय स्थान-स्थान के देवता स्वतः ही वहां की भूमि के मालिक बन गये। ऐसे में गांवों के सभी लोग भूमिहीन हो गये। तब देवताओं की स्थानीय समितियों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर दी कि देवता की इस जमीन को बराबर हिस्सों में “हार’ अर्थात प्रजा में बांट दिया, मगर “हार’ उस जमीन का मालिक नहीं थी। लोग देवता की जमीन पर काश्तकारी करते थे और बदले में देवता के खजाने में अपनी उपज का कुछ भाग दे देते थे। देवता के भंडार में बड़ी मात्रा में अनाज इकट्ठा हो जाता था।

वर्षभर ग्राम स्तर पर बड़े-बड़े यज्ञों व प्रीतिभोजों का आयोजन होता था। इसी इकट्ठे किये हुए अनाज या धन का एक हिस्सा रघुनाथ जी को दिया जाता था। देवताओं के लिए यह अनिवार्य था कि वे दशहरा के अवसर पर कुल्लू में पधार कर रघुनाथ जी को श्रद्घा-सुमन भेंट करें। देवता दशहरे से कुछ दिन पूर्व पधार कर लगभग दो सप्ताह तक रघुनाथ जी के अतिथि बनकर श्रद्घा प्रकट करते थे। देवताओं की अखंड श्रद्घा और अटूट निष्ठा का यह सिलसिला बहुत वर्षों तक निरंतर चलता रहा। इस नियम को तोड़ने या इसके विरुद्घ चलने का किसी ने साहस तक नहीं किया।

मुजारा प्रथा की यह परंपरा जगत सिंह के बाद के राजाओं ने भी यथावत् जारी रखी। इधर देश पर मुगलों के बाद अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने सुधारवादी प्रिाया शुरू कर दी, परंतु उनके लिये भी मुजारा प्रथा समाप्त करना आसान नहीं था। कुल्लू में 1862 के दौरान बंदोबस्त की प्रिाया शुरू हुई, जो 1865 तक जारी रही। अब अंग्रेजों के सामने समस्या यह थी कि देवताओं के नाम की जमीन (भले ही यह रिकॉर्ड में नहीं थी) को गांवों के लोगों में कैसे बांटा जाये। धर्मभीरू और भगवत प्रेमी भोलाभाला जनमानस भी यह नहीं चाहता था कि देवता की जमीन उनके नाम हो। यह तो देवता को नाराज करने वाली बात थी।

आखिर अंग्रेजों ने एक उपाय किया। “हार’ (प्रजा) में जमीन बांटी और देवताओं को उसका मालिक बना लिया। बंदोबस्त में रिकॉर्ड भूमि की कॉपियां देवताओं को दी गयीं ताकि कर आदि उगाहने में कठिनाई न हो। बंदोबस्त के बाद भी रघुनाथ जी सर्वोच्च देवता बने रहे। पुराने अभिलेखों के अवलोकन से मालूम होता है कि जो देवता जितना बड़ा था, उसे तदनुसार भू-राजस्व माफ था, जैसे मलाणा के बड़ा देऊ (जमलू) को 838 रुपये, बिजलेश्र्वर महादेव खराहल को 715 रुपये और मणिकर्ण के ठाकुर श्री रामचंद्र को 656 रुपये माफ था। अन्य देवताओं के साथ भी ऐसा ही व्यवहार था। इस माफी के कारण इन देवताओं का दशहरा पर आगमन अनिवार्य हो गया, परंतु रिकॉर्ड के अनुसार इस दौरान दशहरा के अवसर पर 365 देवता पधारते थे।

देवताओं की जमीन पर काश्तकारी की इस प्रथा का एक दोष यह भी था कि देवता के कारिंदे यानी कारदार, कुंजीदार व भंडारी या गांव के नेगी या लेबरदार जैसे प्रभावशाली लोगों ने देवता की बहुत सारी जमीन पर कब्जा किया था। कुछ लोगों के पास बहुत कम जमीन थी या वंचित थे।

देश स्वतंत्र हो गया। सदियों से वंचित और शोषित भूमिहीन जो अब तक बड़े-बड़े जमींदारों की जमीन पर काश्त कर रहे थे, उनके दिन फिरने की आस बंधी। केंद्र सरकार ने मुजारा कानून पास किया। उसके अनुसार जिस जमीन पर जो किसान काश्त कर रहा है, कुछ औपचारिकताओं के बाद वह उस जमीन का मालिक बन गया। देश के बाकी हिस्सों के समान कुल्लू की स्थिति नहीं थी। यहां बड़े जमींदार नहीं, बल्कि देवता थे, जिनके साथ लोगों का लगाव व जुड़ाव भावनात्मक था। वे वास्तव में देवताओं की भूमि पर कब्जा करने के विरुद्घ थे, लेकिन चूंकि कानून ही ऐसा था कि जो एक अर्से से जिस जमीन पर काश्त कर रहा है, वही उसका मालिक बनेगा। लोगों ने अपने को कानून से अलग रखने के लिये न्यायालय से भी प्रार्थना की, लेकिन उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं हुई।

अंततः मुजारा कानून लागू हुआ और लोग देवताओं की जमीन के मालिक बन गये। फिर भी लोगों ने श्रद्घावश कुछ न कुछ जमीन देवता को छोड़ दी। कुल्लू के देवताओं के पास आज भी कुछ जमीन उनके नाम है। जो देवता अब तक अन्न-धन के खजाने थे, अब उनकी आय का साधन खत्म हुआ, फलतः बहुत सारे देवता धनाभाव के कारण दशहरे पर पधारने बंद हुए। इसी कारण 1952 से 1957 तक दशहरा आयोजन बंद रहा। यह अखंड परंपरा टूट गयी।

मुजारा प्रथा आज भले ही बंद हो गयी है, लेकिन कुल्लू के गांवों में लोगों की जमीन को आज भी देवताओं की जमीन माना जाता है या जमीन को देवता के साथ जोड़ा जाता है।

 

– टेकचन्द ठाकुर

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