दो पाटन के बीच में

यह बात बड़ी तसल्ली देने वाली है कि छोटी-छोटी बातों पर झल्लाकर युवा पति-पत्नी तलाक की अनुमति मांगते हुए कचहरी का दरवाजा खटखटाते हैं, तो भी हमारे कई न्यायाधीशों की यही कोशिश रहती है कि रूठे हुए पति-पत्नी को समझा-बुझाकर उनमें समरसता उत्पन्न करें। उनकी सहानुभूति उन निरपराध मासूम बच्चों के प्रति अधिक रहती है, जिन्हें विलग होते मॉं-बाप के बीच में असमंजस और अनिश्र्चय की जिन्दगी बितानी पड़ती है। ऐसे ही एक मामले में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरिजित पसायत ने कहा, “हिन्दू मैरिज एक्ट ने घरों को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम ज्यादा किया है।’ हमारे देश में तलाक के जो प्रकरण बढ़ रहे हैं, उनका विनाशकारी प्रभाव टूटते परिवारों के बच्चों पर पड़ता है। बच्चों की खातिर मॉं-बाप का अहम् टूट जाता है।

आकाशवाणी के तिरुवनंतपुरम् केन्द्र से एक संवाद प्रसारित हुआ, जिसका विषय था, “बढ़ते हुए विवाह विच्छेद’। उसमें इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गई कि साक्षरता और शिक्षा में आगे रहने वाले केरल में औसतन प्रति घंटे एक विवाह विच्छेद का मामला कचहरियों में आ रहा है। संवाद में भाग लेते हुए एक महिला कह रही थी कि पुराने जमाने में स्त्रियों को परिवार संभालने के लिए पति के वेतन पर आश्रित रहना पड़ता था। अब स्थिति बदल चुकी है। शिक्षित और कामकाजी महिलाओं में आर्थिक स्वावलंबन इतना आ गया है कि वे अपनी ही आय से परिवार संभाल सकती हैं। ऐसी हालत में यदि पति उनसे बुरा बर्ताव करें, उनके चरित्र पर सन्देह करें, शराब पीकर उनको पीटें तो उनका अहम् आहत हो जाता है और वे सीधे विवाह विच्छेद का रास्ता पकड़ती हैं।

एक ने सुझाया कि विवाह के पूर्व लड़कियों को काउन्सिलिंग देने की प्रथा ईसाई धर्म में है। संभवतः इसी कारण ईसाइयों में तलाक की दर अन्य धर्मों की अपेक्षा कम है। हिन्दुओं और मुसलमानों में तलाक की दर में चिंताजनक वृद्घि हो रही है।

जिन बच्चों की कस्टडी को लेकर मॉं-बाप के बीच संघर्ष चलता हो, उन बच्चों पर बीत रही विपदा का जरा अनुमान कर लीजिए। न घर का न घाट का वाली स्थिति। दो नावों पर पांव रख कर नदी पार करने की विवशता। कभी पिता के मुख से माता का चरित्रहनन सुनना पड़ता है तो कभी माता के मुख से पिता का चरित्रहनन सुनना पड़ता है। दोनों स्थितियां उनके कोमल हृदय पर दुःख और चिन्ता के जो अंगारे बरसाती हैं उसके संबंध में ये टकराते मॉं-बाप जरा सोचें। बच्चे यही चाहते हैं कि मॉं-बाप मेल-मिलाप के साथ एक ही घर में रहें, ताकि उन्हें दोनों का समान प्यार-दुलार और संरक्षण मिलता रहे। समय किसी की राह नहीं जोहता। बच्चों का बचपन शीघ्र ही बीत जाता है। मॉं-बाप के वात्सल्य दुग्ध से वंचित होकर जिन्हें अपना बचपन बिताना पड़ता है उनका व्यक्त्वि यदि विफल हो जाए, उनमें समाजविरोधी प्रवृत्तियां पनपने लगें तो दोष किसको दें?

ऐसे बच्चे मॉं या बाप से अपना प्रेम खुले दिल से प्रगट नहीं कर पाते जिस कारण वे अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं। यदि पिता के संबंध में कोई अच्छी बात कहें तो माता उस पर टूट पड़ेगी और माता के संबंध में पिता के सामने वह कोई अच्छी बात कह गया तो पिता आग-बबूला हो जाएगा।

 

 

– के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

 

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