ध्यान एवं योगनिद्रा से मनःशक्तियों का जागरण

तंत्रिका-तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार मानवीय मस्तिष्क दो भागों में विभक्त है – बायॉं भाग और दाहिना भाग। मस्तिष्क के वाम भाग को उसकी क्रियाओं का संचालक व नियंत्रक कहा जाता है। मनुष्य द्वारा सोचे अथवा कल्पना किये गये चिंतन को क्रियान्वित करने का कार्य इससे संपन्न होता है। इसे मानवीय चेतना की जाग्रत अवस्था भी कहा जा सकता है। बायां मस्तिष्क अचेतन और अर्द्घचेतन मन के स्तरों के विचारों को चेतन स्तर पर लाने का कार्य करता है। साधारणतः मनुष्य अपनी इस क्षमता का दस प्रतिशत से भी कुछ कम ही उपयोग कर पाता है।

मस्तिष्क के दक्षिण भाग को विशाल कोश कहना अत्युक्ति न होगी। मस्तिष्क के इस भाग का अर्द्घचेतन एवं अचेतन मन के स्तरों के क्रियाकलापों से संबंध होता है। कल्पनाशक्ति एवं स्वप्न देखने की क्षमता मस्तिष्क के इसी भाग में होती है। व्यक्ति की असाधारण प्रज्ञा की जाग्रति भी इसी केंद्र से होती है। मानव मन रूपी असीम अथाह सागर में समस्त मानव जाति का इतिहास, भूतकाल का संपूर्ण ज्ञान, प्रज्ञा का अपूर्व भंडार निहित है। मस्तिष्क के इस भंडार को विख्यात मनोविज्ञानी जुंग ने “कलेक्टिव अनकान्शस’ कहा है। इस अद्भुत भंडार का मनुष्य लगभग सात प्रतिशत भाग ही उपयोग में ला पाता है। इसका पूरा उपयोग करके तो मनुष्य महामानव, ऋषि, मुनि एवं देवता स्तर तक पहुँच सकता है।

ध्यान के माध्यम से मस्तिष्क की शक्तियों को जाग्रत किया एवं उपयोग में लाया जा सकता है। ध्यानावस्था में अर्द्घचेतन मन के स्तर पर छिपे विचारों को देखा जा सकता है और आत्मशक्ति की प्रेरणा द्वारा क्रियान्वित भी किया जा सकता है। किसी भी कार्य को पूर्णता एवं अच्छे ढंग से संपादित करने के लिए मस्तिष्क के दोनों भागों में एवं क्रिया में पूरा संतुलन होना आवश्यक है। सजग चेतना से ही मनुष्य विज्ञान, कला या सृजनादि के कार्यों को करने में सक्षम होता है। मस्तिष्क का दायां भाग ध्यान एवं वाम भाग कर्मयोग के अभ्यास से सजग-सिाय एवं जाग्रत होता है। इस संबंध में अमेरिका की मूर्द्घन्य विज्ञानी डॉ. एलिस ग्रीन ने अचेतन एवं अर्द्घचेतन मन से उठने वाले विचारों-कल्पनाओं को जानने के लिए विश्र्वविद्यालय के छात्रों पर शोध-कार्य किये। उन्होंने विभिन्न अवस्थाओं में प्रयोग करके देखा कि योगनिद्रा जैसी उनींदी अवस्था में मनुष्य के मन में नये विचार एवं कल्पनाएँ उत्पन्न होती हैं अथवा उन्हें अपनी मानसिक समस्याओं का समाधान मिल जाता है। फ्रांस के सुप्रसिद्घ गणितज्ञ पोंकेयर को इसी प्रकार की स्थिति में एक जटिल समीकरण का हल मिला, जिसे वे बहुत प्रयास करने पर भी जाग्रत अवस्था में हल नहीं कर सके थे।

मानवीय मन की सृजनात्मक शक्ति अनेक रूपों में प्रकट होकर परिलक्षित होती है। कला और विज्ञान के नवीनतम आविष्कार इसी प्रकार से हुए हैं। महामानव इसी शक्ति से समाज का ढांचा बदल सकने में समर्थ हुए हैं। मन की सृजनात्मक क्षमता के अनेक प्रकार व अनंत संभावनाएँ हैं। ध्यान द्वारा अर्जित संतुलित मनःस्थिति से मस्तिष्क के दोनों भागों के नियंत्रित उपयोग से, न केवल विविध प्रकार के मानसिक रोगों से, बुरी आदतों व कुसंस्कारों से छुटकारा पाया जा सकता है, वरन मनुष्य अपने लिए महानता का व मोक्ष का द्वार भी खोल सकता है।

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