ध्यान साधना द्वारा परिवर्तन मस्तिष्क का

dyan-sadna-dwara-parivartan-mastisk-kaएक भाई ने कहा-ध्यान करने बैठते हैं तो विचार आने लग जाते हैं। मैंने कहा-विचार हमारे विकास के द्योतक हैं। कोई बुरी बात नहीं है विचार का आना। जिन प्राणियों में विचार करने की क्षमता नहीं होती उनमें विचार नहीं आता। कीड़े-मकोड़े विचार नहीं कर सकते। गाय, भैंस, ऊँट आदि पशु विचार नहीं कर सकते और करते भी हैं तो अत्यन्त अल्प। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमें विचार करने की अपूर्व शक्ति है। यदि विचार न आना ही ध्यान हो तो कीड़े-मकोड़े निरंतर ध्यान में ही रहते हैं। पेड़-पौधे कब विचार करते हैं? विचार का आना या न आना दोनों ही ध्यान के लक्षण नहीं बनते। विचार आने पर भी ध्यान हो सकता है और विचार न आने पर भी ध्यान हो सकता है। ध्यान का यह अर्थ नहीं है कि विचार न आए।

ध्यान का अर्थ है – भीतर की चेतना जाग जाए, वह सिाय हो जाए। हमारी चेतना सोई-सोई सी रहती है जागृत नहीं होती। बाहर से जागरण-सा लगता है, सिायता लगती है, पर भीतर में इतनी गहरी मूर्च्छा और मोह है कि सच्चाई का पता नहीं चलता। इसलिए कहा गया जानामि धर्म न च में प्रवृत्तिः मैं धर्म को जानता हूं, पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मैं अधर्म को जानता हूं, पर उसमें मेरी निवृति नहीं है। इसका तात्पर्य है कि आदमी धर्म को जानते हुए भी उसका आचरण नहीं कर पा रहा है, और अधर्म को जानते हुए भी उसे नहीं छोड़ पा रहा है। जागरूकता और अप्रमाद हो तो यह अवस्था नहीं बन सकती। बाहरी जागरूकता और भीतर नींद की अवस्था में आदमी जीता है तो वह अच्छाई को जानते हुए भी कर नहीं पाता और बुराई को जानते हुए भी छोड़ नहीं पाता। इस अवस्था को तोड़ना ही ध्यान का प्रयोजन है। ध्यान के द्वारा आदमी बदलता है, उसका स्वभाव बदलता है तो आसपास का सारा वातावरण बदल जाता है। जब आदमी नहीं बदलता तो जैसे को तैसा का सिद्घांत चालू रहता है।

मुंबई की घटित घटना है- बहुमंजिला मकान। एक आदमी नीचे की मंजिल में रहता था। ऊपर की मंजिल में कोई दूसरा रहता था। एक दिन ऊपर की मंजिल में रहने वाले व्यक्ति ने नीचे रहने वाले व्यक्ति से कहा, “”भाई! देखो, तुम जो सिगड़ी जलाते हो, उसका धुआं ऊपर आता है। मेरा कमरा धुएं से भर जाता है। तुम थोड़ा-सा ध्यान दो तो यह स्थिति बदल सकती है।

वह भी तेज तर्रार व्यक्ति था। उसने उस अच्छी बात को भी बुरे रूप में ले लिया। उसने न सहानुभूति से सोचा और न सहानुभूति से उत्तर दिया। उसने गर्मी के साथ ही सोचा और गर्मी के साथ ही उत्तर दिया। उसने कहा, “”सिगड़ी तो जलेगी ही। वह जलेगी तो धुआं भी होगा। क्या तुम नहीं जानते, धुएं का स्वभाव है ऊपर जाना। जो प्रकृति का अटल नियम है, उसे मैं कैसे अन्यथा कर सकता हूं?”

ऊपर वाले के पास तर्क नहीं था। “जैसे को तैसा’ की बात उसके मन में आई। एक दिन नीचे की मंजिल वाले ने देखा कि ऊपर के कमरे की छत में एक छेद है और उससे गंदा पानी नीचे टपक रहा है।

नीचे रहने वाले व्यक्ति ने शिकायत करते हुए ऊपरी मंजिल वाले से कहा, “”भाई! ऊपर के कमरे की छत में एक छेद है और उससे गंदा पानी नीचे टपक रहा है। छेद को दुरुस्त कराओ। गंदे पानी से मेरा कमरा, मेरे कपड़े खराब हो रहे हैं। ख्याल रखना चाहिए।”

वह बोला, “”मैं क्या करूं? इसमें मेरा क्या दोष है? पानी का स्वभाव है नीचे की ओर बहना। मैं इस प्राकृतिक नियम को नहीं बदल सकता।” पारिवारिक उलझनें हों, चाहे सामाजिक और धार्मिक या राजनैतिक उलझनें हों, सब इसलिए बढ़ती हैं कि आदमी बदलता नहीं। आदमी अपने आप में परिवर्तन करना नहीं चाहता, पर दूसरे में परिवर्तन देखना चाहता है। आज तक दुनिया में ऐसा नहीं हुआ कि आदमी स्वयं तो न बदले और दूसरे को बदल डाले। न भूत न भविष्यति। यदि दूसरे को बदलना है तो पहले स्वयं को बदलना होगा।

ध्यान की परिणति है कि उससे हमारी चेतना, भाव और वृत्तियां बदल जाती हैं। जब ये तीनों बदल जाते हैं फिर विचार भी आते हैं तो क्या बुरा है? ध्यान करने वाले का यह काम है कि वह आने वाले विचारों को न रोके, उन्हें द्रष्टाभाव से देखता जाए। विचारों को जबरदस्ती न रोकना है और न उसके साथ संघर्ष करना है। विचार तो भीतर से आ रहा है। आप उन्हें कैसे रोक पाएंगे? इतना किया जा सकता है कि जागरूकता बढ़े और विचार देखना प्रारंभ कर दें। ध्यान के विषय अनेक हैं। हम विचार को भी ध्यान का विषय बना लें। यह एकाग्रता का सुन्दर प्रयोग होगा। जब ध्यान करते-करते विचार आने लगे, उस समय चालू ध्यान को विषय बनाकर उन्हें देखना प्रारंभ कर दें। एक क्षण बाद ऐसा अनुभव होगा कि विचार तो सारे गायब हो गए हैं। कोई विचार आ ही नहीं रहा है। यदि कायोत्सर्ग की मुद्रा में किसी को कहा जाए कि जो विचार आए उसे देखो और बताओ तो वह कहेगा, विचार आ ही नहीं रहे हैं, क्या बताऊँ? विचार शांत हो जाते हैं। जब हम विचार-प्रेक्षा प्रारंभ करते हैं, द्रष्टाभाव से उन्हें देखने लगते हैं, तब वे विचार डरकर अन्यत्र चले जाते हैं। समाप्त हो जाते हैं। विचार एक भूत हैं। भूत से न डरो, न लड़ो। भूत से लड़ने का अर्थ है – उसकी शक्ति को बढ़ाना और स्वयं की शक्ति को क्षीण करना। भूत को पराजित करने का एकमात्र उपाय है, कायोत्सर्ग। भूत के समक्ष जो कायोत्सर्ग की मुद्रा में शांत स्थित हो जाता है तो भूत की शक्ति टूट जाती है। लड़ने का अर्थ है भूत की शक्ति को द्विगुणित करना और कायोत्सर्ग में शांत स्थिर रहने का अर्थ है स्वयं की शक्ति को वृद्घिंगत करना और भूत की शक्ति को समाप्त कर देना।

 

– आचार्य श्री महाप्रज्ञ

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