नान्दी-श्राद्घ

भारतीय संस्कृति एवं पुराणों में तिथियों एवं वारों का विशेष महत्व है। इनमें साधक पूजा व दान करके अक्षयफल प्राप्त करता है। सोमवती अमावस्या, शनि अमावस्या, सोम प्रदोष, शनि प्रदोष, अगार की चतुर्थी, बुधाष्टमी, सूर्य सप्तमी आदि तिथियों का आना विशिष्ट-योग माना जाता है, जो संयोगवश ही आती हैं। धार्मिक अनुष्ठानों एवं शुभ कार्यों में ऐसे योग महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन योगों में किये गये मांगलिक कार्यों का फल अनन्त मिलता है। शनि अमावस्या पर पितर की शान्ति के लिए नान्दी-श्राद्घ, पिण्ड-दान एवं तर्पण तथा पीपल के वृक्ष का पूजन करने से उनको सन्तुष्टि प्राप्त होती है, जिससे वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।

जब शनि के दिन अमावस्या आती है, तब ही शनि अमावस्या कहलाती है। शनैश्र्चरी अमावस्या वर्ष में एक या दो बार ही आती है। इस पर्व पर पितर के निमित्त किये गये दान, धर्म, कर्म, तर्पण से वे सन्तुष्ट रहते हैं। इस दिन शनि की पूजा का भी विशेष महत्व है।

शास्त्रों में पितृ-प्रकोप की शान्ति एवं निवारण के लिए नान्दी-श्राद्घ के समय पिण्डदान, तीर्थों में तर्पण एवं अन्न-दान का वर्णन आया है। अगर तीर्थों व गया में पिण्ड-दान व तर्पण न कर सकें तो हर मास की प्रत्येक अमावस्या को उनके निमित्त श्रद्घा युक्त घर पर ही श्राद्घ, तर्पण, पिण्ड-दान, ब्राह्मण-भोज आदि सविधि करने पर पितृ-प्रकोप दूर होता है।

सूर्य भगवान की हजारों किरणों में जो मुख्य किरण है, उसका नाम है आभा। इस किरण के तेज से ही सूर्य देव तीनों लोकों में प्रकाश करते हैं। इसीलिए उसका नाम अमावस्या पड़ा। यही कारण है कि अमावस्या को धर्म-कार्य के लिए अक्षयफल प्रदायी माना गया है।

नान्दी-श्राद्घ विधि

कुशा, जौ, मुनक्का, काले तिल, आंवला, कच्चा दूध, पत्तल-दोना, अगरबत्ती, पान, पुष्प, पंचामृत, जलपात्र, ऋतु-फल, चिराग, नैवेद्य, वस्त्र, कलश, चन्दन, इत्र, लौंग, इलायची व कुछ दक्षिणा ब्राह्मण को दान स्वरूप भेंट देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। इस प्रकार सविधि नान्दी-श्राद्घ करने से शनिदेव की अनुकम्पा बनी रहती है, जिससे पितरों की तृप्ति होती है।

दान का विशेष फल

शनि अमावस्या को पूजा-अर्चना के बाद ग्यारह नारियल भेंट करें। बन्दरों को गुड़, चना, केला, फल खिलायें। गाय को हरी घास, गुड़, फल, रोटी, चने की दाल खिलायें। पीपल के वृक्ष की पूजा एवं परिामा करें। बीज-मंत्र का जाप करें। शनि यंत्र की पूजा करने से विशेष शुभ फल मिलता है।

– पं. महावीर प्रसाद जोशी

 

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