पुनर्जन्म का तार्किक सत्य

हम आदि सनातन धर्म के लोग तो पुनर्जन्म को मानते हैं, परन्तु आज कुछ धर्मों के लोगों का यह मन्तव्य है कि एक जन्म लेने के बाद मनुष्य दूसरा जन्म नहीं लेता, बल्कि वह “कब्र दाखिल’ ही रहता है। जब कयामत अथवा महाविनाश का समय आता है तब परमात्मा आकर उसे कब्र से निकालते हैं और उसे कर्मों का फल देकर वापस रूहों की दुनिया में ले जाते हैं।

कई लोग ऐसा मानते हैं, परन्तु वास्तव में सत्यता इससे भिन्न है। बात यह है कि एक बार इस मनुष्य-सृष्टि में जन्म लेने के बाद आत्मा कल्प के अन्त तक अर्थात् इस सृष्टि का महाविनाश होने तक पुनर्जन्म लेती रहती है। कल्प के अन्त में वह बिल्कुल अज्ञानता की हालत में होती है। इसे ही मुहावरे में “कब्र दाखिल होना’ कहा गया है। तब परमपिता परमात्मा इस सृष्टि में अवतरित होकर सभी को ईश्र्वरीय ज्ञान देकर “कब्र से निकालते हैं’ अर्थात् अज्ञान-निद्रा से जगाते हैं। परमात्मा उन्हें वापस परमधाम ले जाते हैं और जो पवित्र नहीं बनतीं, उनके कर्मों का लेखा चुकाकर अर्थात् उन्हें फल देकर उन्हें भी वे परमधाम ले तो जाते हैं, परन्तु आज “कब्र दाखिल होने’ का वास्तविक अर्थ न जानने के कारण ही लोग मानते हैं कि आत्मा एक ही जन्म लेती है।

आप किंचित सोचिए कि यदि मनुष्यात्माएँ पुनर्जन्म न लेतीं तो संसार में जन-संख्या क्यों बढ़ती जाती? जनसंख्या के दिनोंदिन बढ़ने से ही स्पष्ट है कि पहले वाली आत्माएँ पुनर्जन्म लेती आ रही हैं और अन्य आत्माएँ भी परमधाम से उतर रही हैं।

वास्तव में मानव के चारित्रिक उत्थान के लिए भी पुनर्जन्म का मानना आवश्यक है, क्योंकि अगर मनुष्य यह नहीं मानेगा कि उसे अपने रहे कर्मों का फल, अगले जन्म में भी मिलेगा अवश्य, तब वह तो अपने कर्मों की अच्छाई और बुराई पर ध्यान नहीं देगा, बल्कि इसी जन्म में ही दूसरों को हानि देकर भी मजे उड़ाना चाहेगा। इससे तो संसार में उच्छृंखलता बढ़ेगी।

– ब्रह्माकुमारी

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