पड़ाव

आज गांव के सभी लोग उस छोटी-सी पहाड़ी नदी में नहाने के लिये जाने को उतावले थे। बच्चे-बूढ़े भी यहां गांव में रह कर कुएं में नहाना नहीं चाहते थे। युवा लड़के अपनी-अपनी बैलगाड़ियां व छकड़े दुरुस्त कर बैलों को खिलाने में लगे हुए थे, क्योंकि थोड़ी ही देर में गांव का एक बड़ा-सा काफिला गंगा-दशहरा के पर्व पर नहाने के लिये निकलने वाला था। मनोहर ने अपने हृष्ट-पुष्ट बैलों की पीठ पर प्यार से हाथ फेरा और छकड़े में जोत दिया। देखते ही देखते दो दर्जन के करीब छकड़े गांव से निकल कर उस नदी की ओर जाने वाली कच्ची सड़क पर भागने लगे।

धूल के उड़ते गुबार ने आकाश को ढंक लिया था। मनोहर की आंखें धनेसर चाचा की बैलगाड़ी को खोज रहीं थीं, क्योंकि सांवली ने साथ नहाने का वादा किया था। अगर आज वह न आयी होगी तो वह क्या कर लेगा? लेकिन आयेगी क्यों नहीं? “”जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा।” गीत वह गुनगुनाने लगा।

नदी पर आज मेले जैसा ऩजारा दिखाई दे रहा था। जहां तक नजर जाती थी, बैलगाड़ियां और भीड़-भाड़ ही दिखाई दे रही थी। उसने भी एक बबूल के पेड़ के नीचे अपनी गाड़ी खोल दी। तभी उसने देखा, सांवली भी उस भीड़ में किसी को खोजने के लिये इधर-उधर देख रही है। दोनों ने एक-दूसरे को देख लिया तो ऐसा लगा, जैसे नहाये बिना ही दोनों को गंगा-दशहरा नहाने का पुण्य मिल गया। दोनों के चेहरों पर स्वाभाविक मुस्कान तैर गई।

सबकी आँख बचाकर दोनों नदी के पूर्वी मुहाने पर पहुंच गये तथा एक ऊंचे स्थान से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुये नदी में छलांग लगायी। यहां नदी कुछ अधिक गहरी भी थी। दोनों तैरने लगे, किन्तु नदी की धारा उन्हें आगे बहा ले जाने के लिये कटिबद्घ थी। दोनों का उत्साह भी कुछ कम नहीं था। तैरते हुए दोनों दूसरे किनारे पर पहुंच गए। उथले पानी में खड़े हुए मनोहर ने कहा, “”जानती हो सल्लो, हम लोग अपने पड़ाव से कितनी दूर आ चुके हैं? सब लोग हम लोगों की तलाश कर रहे होंगे। यहां से वापस चलने में एक घंटा लगेगा। अब तो धारा उल्टी पड़ेगी।” “”तो क्या हुआ?” सल्लो ने कहा और मनोहर का हाथ अपने हाथ में ले लिया। जैसे वह कह रही हो कि तुम्हारे लिये तो हम सारे जहां को छोड़ सकते हैं। वह कुछ बोली नहीं, किन्तु मनोहर उसके मनोभावों को समझने का प्रयास कर रहा था। “”सल्लो कुछ बोलो तो, क्या डर रही हो?” “”नहीं, डर तो नहीं रही हूँ, केवल एक ही बात मुझे परेशान किये है कि मैं तुम्हारे गांव में दो-चार दिन की ही मेहमान रह गई हूं। जीजा की चिट्ठी आ चुकी है। मुझे बुलाया है। यहां से जाकर कब दुबारा तुमसे मुलाकात होगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना कहे देती हूं, अगर तुमसे मेरी शादी न हुई तो मैं अपनी जान दे दूंगी।”

गांव के सभी लोग नहा-धोकर अपने पड़ाव पर वापस आ चुके थे। मनोहर और सांवली की तलाश हो रही थी। कुछ नवयुवक चटखारे लेकर दोनों की प्रेम-कहानी के चर्चे कर रहे थे, तो कुछ बुजुर्ग किसी अनहोनी की आशंका भी जाहिर कर रहे थे। चारों ओर एक ही चर्चा हो रही थी कि ये दोनों कहां गये होंगे? कहीं दोनों नदी में डूब तो नहीं गये। हंसी-खुशी का माहौल धीरे-धीरे गंभीरता में तब्दील होने लगा। दो-चार लोग मनोहर और सांवली का नाम लेकर जोर-जोर से पुकार रहे थे। जेठ का सूरज तपने लगा था। हवा भी तेज हो गई थी। बालू तवे-सी तपने लगी थी। मनोहर और सांवली के परिवार वालों की उलझन भी गर्म हवाओं की तरह बढ़ती जा रही थी। सब शांत और मन मारे हुए बैठे थे।

तभी एक लड़के ने चहकते हुये कहा- “”अरे चाचा, वह देखो लैला-मजनूं की जोड़ी आ रही है?” जन-समूह ने देखा कि वह दोनों अपराधियों की भांति सिर झुकाये एक-दूसरे का हाथ पकड़े चले आ रहे हैं। दोनों आकर खड़े हो गये। मनोहर हाथ छुड़ाने का प्रयास कर रहा था, पर सांवली ने कसकर उसका हाथ पकड़ रखा था। मनोहर के चाचा का चेहरा तमतमाया हुआ था। वह उठे और गालियों की बौछार के साथ उन्होंने दो-चार हाथ मनोहर के गाल व पीठ पर जड़ दिये। किसी ने इस बात का कोई विरोध नहीं किया। सांवली ने हिम्मत करके कहा, “”आप लोग जो चाहे सजा दें, लेकिन हम लोग एक-दूसरे से अलग नहीं होंगे। अगर फिर भी हमको अलग करने की कोशिश की गई तो गंगामाई की सौगंध हम इसी नदी में कूदकर जान दे देंगे।” थोड़ी देर के लिये वहां सन्नाटा छा गया। कुछ देर में यह काफिला गांव की ओर चल पड़ा।

दूसरे ही दिन सांवली को उसके जीजा के पास भेज दिया गया। वह विवशता से नारी की नियति पर अपने आप को व समाज की रुढ़ियों को कोसती हुई चली गई। किन्तु जाते-जाते अपनी एक विश्र्वस्त सहेली को एक पत्र भी दे गई, जिसमें उसने अपने पूर्व निश्र्चय को दोहराते हुये मनोहर को आगाह किया था कि यदि उसने कोई रास्ता न निकाला तो सांवली जीवित किसी दूसरे की दुल्हन नहीं बनेगी?

मनोहर बेबस था। सांवली को वह रोक नहीं पाया। वह उससे कुछ कह भी नहीं पाया। किन्तु जब सांवली का वह पत्र उसे मिला, तो उसने भी कुछ निश्र्चय कर डाला। आज सांवली को गये लगभग एक महीना गुजर चुका था। आषाढ़ के बादल उमड़-घुमड़ कर चले जा रहे थे। किसान रात-दिन खेतों को तैयार करने में लगे थे। तभी चन्दू ने आकर मनोहर के कान में कुछ कहा। मनोहर के दुःखी चेहरे पर कठोरता के भाव साफ दिखने लगे। उसने कुछ संकल्प-सा कर डाला। चन्दू भयभीत-सा चुपचाप चला गया। उसकी आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई।

सांवली का विवाह था। उसका विवाह शहर से ही हो रहा था। सारा गांव इस बात से खिन्न था कि किसी भी गांव वाले को निमंत्रण नहीं दिया गया। मनोहर सुबह से ही बड़ा उत्साहित लग रहा था, कुछ दोस्त उससे इसका कारण जानने के लिये व्यग्र था, किन्तु वह सभी को झूठे कथनों से खुश करने का प्रयास कर रहा था।

शाम घिर आयी। बादलों की गरज के साथ बिजली भी चमक रही थी। मनोहर एक पेड़ की जड़ से लगा निर्विकार भाव से बैठा था। मौसम की पहली बरसात शुरू हो गई। वह धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ाता हुआ चला जा रहा था। बादलों की गरज से भी भयंकर हाहाकार उसके मन में चल रहा था। तभी बिजली चमकी और भयानक घन गर्जना के साथ ही पास के वृक्ष जलकर राख हो गये। उसने सोचा यह बिजली मेरे ऊपर क्यों नहीं गिर गई? शायद उसका जीवन अभी कुछ घड़ी और शेष है।

मनोहर ने घर पहुंच कर भीगे कपड़े बदले और अपनी कोठरी में लेट गया। बाजार से लाये गये जहर की शीशी को एक बार उठाकर गौर से देखा। शीशी निश्र्चित स्थान पर रखी थी। वह सोचने लगा कि आत्महत्या तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उसे कुछ ऐसा उपाय खोजना चाहिये, जो उसकी ही नहीं, हजारों-लाखों प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिये मिसाल बन सके। उसका विवाह सांवली से इसलिये नहीं हो सका, क्योंकि उनके कुल और गोत्र में कुछ ऊंच-नीच की सीमा रेखा खींच दी गई थी। यह झूठी और बेवजह की मान्यता दो प्रेमियों का जीवन समाप्त कर देगी। उसे कोई और रास्ता खोजना होगा, आत्महत्या तो पाप है। वह समाज को सबक सिखायेगा कि विवाह तो एक सामाजिक परम्परा है। वह तो जीवन को सुचारू ढंग से चलाने का एक मान्यता प्राप्त साधन है, उसे साध्य नहीं बनाया जा सकता। हाथ में उठाई गई जहर की शीशी उसने परे फेंक दी। उसका मन कुछ हल्का हो गया। लेकिन उसने एक अभूतपूर्व संकल्प भी किया कि अब वह अन्तर्जातीय विवाह करके समाज के ठेकेदारों को इसका जोरदार जवाब देगा।

सांवली ने आत्महत्या करने का प्रयास किया, लेकिन वह सफल न हो सकी। उसका विवाह एक अधेड़ उम्र के विधुर से कर दिया गया। उसने भी समय से समझौता कर लिया। फिर उसे मनोहर का वह पत्र भी मिला, जिसमें उससे जिन्दा रहने के लिये मिन्नत की गई थी। सांवली ने सोचा, वह जिसके लिये मरना चाहती है, वही उसे जीने को कहता है। ़िजन्दा रहकर कुछ करना संभव हो सकता है, मरना किसी भी तरह ठीक नहीं है।

समय की गति बड़ी बदलाव भरी होती है। इस घटना को कई महीने बीत गये, किन्तु मनोहर ने अपना निश्र्चय नहीं बदला। उसने पड़ोस के गांव की एक अनाथ कन्या से कोर्ट मैरिज कर ली। गांव में एक तूफान उठा और शान्त हो गया। उसे घर से अलग कर दिया गया। ठीक भी है, किसी से मिलने के लिये किसी अन्य से बिछुड़ना तो पड़ता ही है।

सांवली को भी यह समाचार मिला, वह बहुत खुश दिखाई दे रही थी। उसके पति ने कहा, “”आज बहुत प्रसन्न दिखाई दे रही हो, क्या बात है?” सांवली ने कहा, “”हां, आज मैं बहुत खुश हूं, मुझे आज एक अनसुलझे सवाल का जवाब जो मिल गया है। मैंने आपसे कभी कुछ भी नहीं मांगा है, पर आज एक बात कहती हूं। मेरी दिली आरजू है कि आज आप गांव चले जाइये तथा मनोहर और रमिया को मेरी तरफ से कुछ कपड़े और मिठाई दे आइये। उन दोनों को यह तो लगे कि दुनिया में उनका भी कोई है।” सांवली के पति ने कहा, “”ठीक है, तुम मेरा सामान बांध दो, मैं अभी जाता हूं। दोपहर का भोजन भी मैं मनोहर और रमिया के साथ ही करूंगा।”

– डॉ. दुर्गा प्रसाद शुक्ल “आ़जाद’

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