फूलां

सत्य कहूँ, उसने मुझे कोहनी से पकड़ लिया था। “”आपने मेरे रांझू को तो नहीं देखा? कहॉं होगा मेरा रांझू? परदेसी बाबू! आपने जरूर देखा होगा?” किसी युवती का स्पर्श मुझे कंपा गया था। मैं थोड़ी देर के लिए घबरा गया था। वह युवती कोई बीस बरस की रही होगी। लंबे बाल, अस्त-व्यस्त कपड़े। किसी अच्छे खानदान की रही होगी, मैंने अंदा़जा लगाया। उसके पीछे दस-पंद्रह बच्चे दौड़ रहे थे। मुझे देखकर बच्चों के पॉंव थम गये थे। वह युवती नंगे पॉंव थी। पॉंव के अंगूठे पर हल्की रक्त की धारा साफ दृष्टिगोचर हो रही थी। मैं यात्रा की थकान को भूल चुका था। जैसे कोई स्वप्नलोक में विचरण कर रहा होऊँ। ऐसी मेरी स्थिति थी।

“”बाबू जी, बुरा मत मानना, पागल है, वक्त की मारी है। सभी को ऐसे ही पकड़ लेती है। किसी को जाने नहीं देती। नासमझ है, बुरा मत मानना।” एक सयाने बुजुर्ग ने मेरी बांह छुड़वाते हुए कहा। मैं कभी उस वृद्घ को तो कभी उस युवती को देखे जा रहा था।

“”पागल होगी तेरी मां, तेरी भैण, बुड्ढे तेरा सारा वंश। जरा मुँह संभाल कर बात करना।”

“”बुरा मत मानना बाबू जी, मेरा आपको बतलाना फर्ज है। यह हमारे गॉंव के सम्मान का प्रश्र्न्न है।” कहकर वृद्घ महाशय अपनी राह हो लिए।

“”ओ मेरा रांझू आई गिया, बवरू बनाओ, हलुआ बनाओ।” कहते हुए वह एक ओर भाग गई।

सामने मेरी भाभी का मायका था। समीप ही गॉंव का कुआँ था। क्वाली से उतरती मेरी दृष्टि भाभी पर पड़ी। मॉं की आज्ञा थी कि भाभी को लेकर आना। किसी रिश्तेदार की शादी में शामिल जो होना था भाभी को। भाभी समीप आ गईं। मैंने उन्हें प्रणाम किया। वह मुझे देख हैरान थीं। “”सरप्राइज विजिट।” “”ओ रतन! तू आज कैसे?” भाभी ने छूटते ही प्रश्र्न्न दाग दिया। “”भाभी जी! आप भी न भुलक्कड़ हो। कई बार कह चुकीं अपने मायके से एक चॉंद का टुकड़ा लाऊँगी। भूल गयीं क्या? मैं उसे ही पसंद करने आया हूँ।” मेरी बात सुनकर भाभी जी मुस्कुरा उठीं।

“”तू इक बार हामी तो भर देवरा। मैं कुड़ियों की कतार लगा दूँगी।” कहती हुई वह कुएँ की मुंडेर पर चढ़ गईं। भाभी की फुर्ती दर्शनीय थी। सभी औरतों के घड़े भाभी ने भर दिये थे। मैंने हाथ लगाया। घड़ा भाभी के सिर पर था। भाभी ने सभी की कुशल-क्षेम पूछी। अमलतास एवं कचनार के वृक्ष प्राकृतिक सौंदर्य को द्विगुणित कर रहे थे।

गोहरनें शुरू हो चुकी थीं। उसके उपरांत कच्चे स्लेटों के घरों की कतार शुरू हो चली। कहीं-कहीं खपरैल, सरफड़ से छाये घर भी दिखाई दे रहे थे। मैं भाभी के पीछे-पीछे चलने लगॉं, दूर कहीं स्वर गूँजा, “”ओ आया मेरा रांझू। ओ देखो, यहॉं है मेरा रांझू।” बच्चों का स्वर भी कानों में सुनाई पड़ा।

फूलां के नाम पर मेरे कान खड़े हो गये। उस युवती का नाम फूलां रहा होगा। भाभी ने बरामदे में कुर्सी लाकर रखा और झट चाय का गिलास लेकर आ गईं। हॅंसता माथा, मुस्कुराता चेहरा.. उन्हें देखकर सामने वाले की थकान दूर हो जाए। सचमुच ऐसे कम ही लोग होते हैं। नमकीन, बिस्कुट प्लेट में डालकर मेज पर रख दिये थे। मेरे मन में उसी युवती को लेकर अंतर्द्वंद्व छिड़ा था। भाभी मन पढ़ने में सिद्घहस्त थीं। उनके बोलने से पूर्व ही मैंने प्रश्र्न्न दाग दिया, “”भाभी जी! मेरी समस्या का समाधान करो। यह फूलां और रांझू का क्या माजरा है? मैं बड़ी कशमकश में हूँ।” “”तो इसका मतलब मेरे देवर का वास्ता उस पगली से पड़ गया लगता है। तुझे भी जरूर फूलां ने पकड़ा होगा।”

भाभी दूसरी कुर्सी उठा मेरे पास कर बैठ गयीं, “”क्या बताऊँ मेरे देवर, यह मुटियार फूलवती है।” हमारे पास के गॉंव की अल्हड़। उसका बापू अमृतसर में किसी निजी फर्म में नौकर है। रांझू भी हमारे गॉंव का ही था। वह बी.ए. पास था। नौकरी की तलाश में अमृतसर चला गया। किसी से फर्म का पता पूछकर फूलां के बापू से मिला। आवभगत हुई। पास-पड़ोस के गॉंव के होने के कारण उसका बापू रांझू को अपने घर ले गया। कोई प्रबंध होने तक अपने पास रहने की सलाह दी। रांझू मान गया। वह दूसरे ही दिन से नौकरी की तलाश में लग गया। फूलां तब जमा दो की छात्रा थी। रांझू और फूलां के बीच कोई पॉंच वर्ष का अंतर रहा होगा। फूलां की मां कई बार घर चली जाती। फूलां के बापू ने रांझू से कह रखा था कि “”तू कभी-कभार मेरी बेटी को पढ़ा दिया कर। हमें तो पढ़ना-लिखना आता नहीं है। हमारे जमाने में इतनी पढ़ाई कहां थी।”

रांझू उसी दिन से फूलां को गाहे-बगाहे पढ़ाने लग गया। दोनों घर में अकेले रहते। जवान-जहान लड़की। रांझू भी युवक पट्ठा। आँखें चार हो गईं। प्रेम का पौधा कब वृक्ष में परिवर्तित हो गया, दोनों को पता भी न चला। फूलां, रांझू का विशेष ध्यान रखती।” भाभी श्री की कहानी जारी थी। चाय के गिलास खाली हो चुके थे। कहानी वास्तव में रुचिपूर्ण थी। फूलां का बापू सत्तो काम पर चला जाता, मॉं निपट अनपढ़, सिर नीचा किये रसोई के काम-काज में लगी रहती। इधर दोनों का प्यार परवान चढ़ चुका था।


 

एक दिन फूलां ने रांझू से कहा, “”मैं तो आपको पति-परमेश्र्वर मान चुकी हूँ।” उसकी बात सुन कर रांझू हतप्रभ रह गया।

“”तू इसका अर्थ भी समझती है! अभी मेरी नौकरी कच्ची है। पता नहीं लाला लोग कब निकाल कर बाहर करें। यह ख्याली पुलाव मत पका फूलां। अभी तू बच्ची है।”

“”मुझे तो सब पता है। सब जानती हूँ। आप मुझे छोड़कर मत जाना, यह बात मेरी गॉंठ बॉंध लेना। नहीं तो मैं कुछ खा लूँगी। झूठ मत मानना। मैं बड़ी जिद्दी लड़की हूँ। घर वाले भी यह बात जानते हैं। आप भी समझ लेना।” रांझू उसका चेहरा देखता रह गया। वहॉं उसे दृढ़निश्र्चय की एक रेखा साफ दिख रही थी।

“”तेरा बाप हमें छोड़ेगा नहीं। मेरे अम्मां-बापू क्या कहेंगे? तू सुन रही है, मैं क्या कह रहा हूँ!”

“”मुझे कुछ नहीं सुनना। मैं कुछ नहीं जानती। मुझे इतना पता है कि आप मेरे हैं केवल मेरे। मेरा पहला प्रेम।”

रांझू अंतर्द्वंद्व में फॅंस गया। किंकर्तव्यविमूढ़ पूरी रात सोचता रहा। फूलां का चेहरा उसे तंग करता रहा। निश्र्चल प्रेम। इतनी निर्भय, निडर लड़की! वह सोचता रहा। उसे रात भर नींद नहीं आई।

“”रांझू जी! मैं आपके लिए पूरे समाज से भिड़ जाऊँगी। मुझे अपने जीवन से प्रेम नहीं, प्रेम है तो केवल आपसे। शादी करूँगी तो आपसे। अन्यथा मेरे घर से मेरी अर्थी निकलेगी। सुना आपने? यह पत्थर पर पड़ी लकीर समझना। मैं उन लड़कियों में से नहीं, जो धमकी देती हैं। समय पर आप देख भी लेंगे।” रांझू सचमुच भयभीत हो गया था।

“”फूलॉं! तू ऐसी अशुभ बातें मत किया कर। अगर ऐसी बातें करनी है तो मुझसे मत बोलना। समझी तू।” रांझू उसे झिड़की देता। योगी-मुनि तो था नहीं रांझू। फिर एक दिन वह हो गया, जो नहीं होना चाहिए था। दोनों बहक गये। किसी मुहल्ले वाले ने मॉं को सुना ही दिया, “”फूलॉं की मॉं! अपनी लड़की को संभाल। नहीं तो यह गई, मुई।” तब जाकर उनके कान खड़े हुए। रांझू को जवाब मिल गया। वह घर से बेघर हो गया। सतो ने फूलां के विवाह की बात चलाई। चुपके से फूलां को ऐन मौके पर बताया गया। बेचारी खूब रोई। खुद को जलाने की कोशिश भी की। घर के कोठे पर से छलांग मारने का असफल प्रयास किया। टांग टूट गई। फूलां की स्थिति बिगड़ने लगी। वह पगला गई। “ओ आया मेरा रांझू!’ की टेर पकड़ ली। मेंटल-अस्पताल भी दाखिला करवाया गया। पॉंच-सात बिजली के झटके भी लगवाए, पर कोई फर्क नहीं पड़ा। दवा-दारू काम न आये। हालत बिगड़ती गई और फूलां एकदम पागल हो गई।

रांझू अमृतसर छोड़ किसी और शहर में नौकरी पर लग गया है। इधर फूलां पागलों की भांति दौड़ती है। बच्चे उसके पीछे भागते हैं। बच्चे म़जाक उड़ाते हुए उससे कहते हैं, “”ओ आया तेरा रांझू।” फूलां पूरे गॉंव का चक्कर लगाती है। मॉं-बाप अपनी किस्मत को कोसते हैं। जवान-जहान लड़की को देखकर कलेजा मुँह को आता है। न जाने कौन-से कर्मों का फल है। जो बेचारी भोग रही है। ठाकुर, तेरे रंग न्यारे।” भाभी कहानी समाप्त कर रोने लगीं। मेरी पलकें भी भीग गईं। दूसरे दिन भाभी और मैं बस में बैठे थे। मुझे यूँ लगा, जैसे किसी ने मेरी कोहनी पकड़ रखी हो और कोई कह रहा है- “”परदेशी बाबू! मेरे रांझू को देखो तो कहना तुम्हारी फूलॉं बहुत याद करती है। आपके बिना बड़ी उदास है।” परिचालक ने सीटी बजा दी। बस हल्के से हिचकोले से चल पड़ी। कहीं से शोर उभरा। “”कहॉं है मेरा रांझू?”

“”वह है तेरा रांझू” कोई स्वर उभरा। फूलां उसी ओर दौड़ पड़ी। भाभी ने मेरे कंधे पर हाथ धर दिया।

– रजनीकांत

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