फ्रांस का उदार कट्टरवाद

हाल ही में फ्रांस की एक अदालत ने एक मुस्लिम व्यक्ति को इस आधार पर तलाक प्रदान कर दिया था कि सुहागरात के समय उसकी पत्नी वर्जिन न थी, जैसा कि उसने दावा किया था। यह तलाक की बहुत ही अजीबोगरीब वजह थी क्योंकि स्त्री का हाइमेन स्पोट्र्स या अन्य कारणों से भी टूट सकता है और यह जरूरी नहीं कि वजह शारीरिक सम्बंध ही हो। इसके अलावा आज के दौर में यह आवश्यक भी नहीं कि शादी के समय महिला कौमार्ययुक्त ही हो। कौमार्ययुक्त होने की मांग से स्त्री के बराबरी के अधिकार पर चोट लगती है क्योंकि ऐसा कोई पैमाना नहीं है जिससे यह मालूम किया जा सके कि शादी के पहले पुरुष भी शारीरिक मामलों में अनुभवहीन है या नहीं। इसलिए अदालत के इस फैसले पर विवाद होना ला़जमी था। लेकिन अभी इस विवाद पर विराम लगा भी न था कि फ्रांस में एक और विवाद ने जन्म ले लिया है। एक मुस्लिम महिला को सिर्फ इसलिए फ्रांस की नागरिकता नहीं दी जा रही कि वह बुर्का ओढ़ने को प्राथमिकता देती है। फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि बुर्का ओढ़ने की प्राथमिकता फ्रांस के बुनियादी मूल्यों से मेल नहीं खाती है।

32 वर्षीय फाय़जा एम. एक फ्रांसीसी नागरिक की पत्नी हैं और सन् 2000 से पेरिस के पूर्वी हिस्से में रह रही हैं। उनके तीन बच्चे हैं जिनका जन्म फ्रांस में ही हुआ है। वे बहुत अच्छी फ्रेंच बोलती हैं। फ्रांस की सामाजिक सेवाओं की रिपोर्ट के अनुसार फाय़जा एम. अपने पति के प्रति “पूर्ण समर्पण भाव’ के साथ रहती हैं। मूलतः वह मोरक्को की रहने वाली हैं जहां वह बुर्का नहीं ओढ़ती थीं, लेकिन फ्रांसीसी नागरिक से शादी और फिर उसके कहने पर उन्होंने बुर्का ओढ़ना शुरू कर दिया है। सन् 2005 में फ्रेंच नागरिकता के लिए उनकी अर्जी को यह कहकर ठुकरा दिया गया था कि उनका फ्रांस में “घुलना-मिलना अपर्याप्त’ है। फाय़जा एम. ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और फ्रांस के संविधान में धार्मिक आजादी के अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी फ्रांस के बुनियादी मूल्यों को चुनौती देने का प्रयास नहीं किया है। लेकिन जून में फ्रांस की उच्चतम प्रशासनिक संस्था काउंसिल ऑफ स्टेट ने उनकी अपील को निरस्त कर दिया।

काउंसिल ऑफ स्टेट ने अपने फैसले में कहा, “फाय़जा एम. ने अपने धर्म की एक कट्टर प्रथा को अपनाया है जो फ्रेंच समुदाय के आवश्यक मूल्यों के अनुरूप नहीं है, खासकर लिंगों के बराबरी के सिद्घांत के यह खिलाफ है।’

फ्रांस में यह पहला अवसर है, जब किसी शख्स की व्यक्तिगत धार्मिक रीति-रिवाज को आधार बनाकर नागरिकता देने से इनकार किया गया है और कहा गया है कि ऐसा करके कोई फ्रांसीसी माहौल में आत्मसात नहीं हो सकता। गौरतलब है कि फ्रांस में नागरिकता प्रदान करने की मुख्य शर्त यह है कि व्यक्ति फ्रांसीसी माहौल में कितना रमा हुआ है। अब तक इसका अर्थ यही समझा जाता था कि वह फ्रेंच भाषा अच्छी तरह से बोल सकता है या नहीं। अगर वह फ्रेंच भाषा फर्राटे से बोल लेता था तो उसे मान लिया जाता था कि वह फ्रांस के माहौल में रम गया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, फाय़जा एम. बहुत अच्छी फ्रेंच बोलती हैं। उनकी नागरिकता की अर्जी इस बात पर ठुकरायी गयी है कि वे क्योंकि बुर्का ओढ़ती हैं इसलिए महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं मानतीं, यानी बराबरी के सिद्घांत के विरुद्घ हैं।

बहुत ही अजीब तर्क है। बुर्का ओढ़ना या न ओढ़ना किसी भी महिला की अपनी मर्जी पर निर्भर करता है। अगर वह बुर्का ओढ़ती है तो इसका अर्थ यह कैसे निकाला जा सकता है कि वह महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं मानती? यह सही है कि फाय़जा एम. मोरक्को में बुर्का नहीं ओढ़ती थीं और फ्रांस आने के बाद अपने पति के आग्रह पर बुर्का ओढ़ने लगीं। जिसके बारे में उनका कहना है कि वे धार्मिक कट्टरता की बजाए आदतन और अपने पति की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए बुर्का ओढ़ती हैं। लेकिन फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि फाय़जा एम. अपने पति की “गुलामी’ में रहती हैं, वे इसे पूर्णतः सामान्य बात मानती हैं और कभी इस बात को चुनौती देने का विचार उनके दिमाग में नहीं आया। इसलिए वे फ्रांस के बराबरी के सिद्घांत में विश्र्वास नहीं रखतीं। इसका अर्थ यह हुआ कि वे फ्रांसीसी माहौल में पूरी तरह रम नहीं सकी हैं। इसलिए उन्हें नागरिकता प्रदान नहीं की जा सकती।

फ्रांस में कानून के प्रोफेसर डेनियल लौचक का कहना है कि यह बहुत ही बेहूदा तर्क है कि अगर कोई महिला अपने पति के प्रति बहुत अधिक समर्पित है तो उसे नागरिकता न दी जाए। अगर इस तर्क को गौर से देखा जाए तो इसका अर्थ होगा कि जिन महिलाओं को उनके पार्टनर्स पीटते हैं वे भी फ्रेंच होने के लायक नहीं हैं। प्रो. डेनियल लौचक की इसी बात को मद्देनजर रखते हुए फ्रांस की मानवाधिकार लीग के प्रमुख ली मोंडे जीन-पैरी डुबायस इस मामले में अधिक जानकारी एकत्र कर रहे हैं।

दरअसल इस पूरे किस्से को पश्र्चिम के उस प्रोपेगंडा की रोशनी में देखा जाना चाहिए जिसके तहत सभी गैर-ईसाइयों विशेषकर मुस्लिमों को पश्र्चिमी संस्कृति का दुश्मन समझा जाता है। इसी के चलते जो सिख पगड़ी बांधते हैं या जो लड़कियां मुस्लिम हिजाब ओढ़ती हैं, उन्हें फ्रांस के सरकारी स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जाता। हालांकि फ्रांस में लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता की जबरदस्त दुहाई दी जाती है लेकिन जब इन्हीं सिद्घांतों के तहत कोई गैर-ईसाई अधिकार मांगने लगता है तो उसे ऊल-जुलूल तर्क देकर शांत करने का प्रयास किया जाता है जैसा कि फाय़जा एम. के सिलसिले में हो रहा है।

फ्रांस में लगभग 50 लाख मुस्लिम रहते हैं। इनमें से तकरीबन आधों को फ्रेंच नागरिकता मिली हुई है। पूर्व में उन मुस्लिमों को नागरिकता देने से इनकार किया गया जिनके बारे में समझा जाता था कि उनके अतिवादी तत्वों से सम्बंध हैं या जो कट्टरवाद का खुलकर समर्थन करते हैं। लेकिन यह पहला वाकया है जब बुर्का ओढ़ने को लेकर नागरिकता प्रदान करने से इनकार किया गया है।

बहरहाल, सवाल यह है कि क्या बुर्का फ्रेंच नागरिकता के अनुकूल नहीं है? लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता का यही तका़जा है कि व्यक्ति जिन आस्थाओं और मूल्यों के साथ रहना चाहता हो, रहे, बशर्ते कि दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन न हो रहा हो। फाय़जा एम. अपनी मर्जी से अपने पति की बात मानकर बुर्का ओढ़ रही हैं। इससे किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों को चोट नहीं पहुंच रही है। साथ ही पति की बात को मानने का अर्थ यह नहीं है कि वे उसकी “गुलामी’ में रह रही हैं या वह बराबरी के सिद्घांत को नहीं मानतीं। इसलिए इस घटना से सिर्फ यही बात समझ में आती है कि फ्रांस के अधिकारी कोई न कोई बहाना लेकर मुस्लिमों को नागरिकता नहीं प्रदान करना चाहते। यह न सिर्फ खतरनाक टेंड है बल्कि इसमें भेदभाव की भी बू आती है। बुर्का ओढ़ना इस्लाम में जरूरी नहीं है लेकिन अगर कोई बुर्का ओढ़ना चाहता है तो उसको डेस करने की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। क्या यह जरूरी है कि महिला अपने अंगों का प्रदर्शन करे तभी वह पुरुष के बराबर आ सकेगी और स्वतंत्र कहला सकेगी? नहीं। इसलिए फ्रांस की सरकार को चाहिए कि न सिर्फ लोगों की स्वतंत्रता को बरकरार रखे बल्कि पगड़ी पहने हुए सिखों व हिजाब ओढ़े हुए मुस्लिम लड़कियों को स्कूलों में प्रवेश भी दे क्योंकि गुलदस्ता वही अच्छा लगता है जिसमें सभी रंग के फूल हों।

– शाहिद ए. चौधरी

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