बच्चों के कविता

करें मेहनत जो भी बच्चे

करें मेहनत जो भी बच्चे

अधिक अंक वे पाते

माता-पिता या शिक्षक से

पुरस्कार वे पाते।

सत्य वचन जो बोला करते

नहीं किसी की

निंदा करते।

तेज हमेशा वे ही बनते

जो भी मन लगाकर पढ़ते।

रोज सुबह में उठकर अपना

पाठ याद वे करते

नहीं किसी से वैर-भाव

या लड़ाइयॉं करते।

अच्छी संगति में ही रहना

नहीं किसी को गाली देना

मम्मी-पापा की सेवा कर

मन ही मन खुश रहना।

जो बच्चे हिल-मिलकर

आपस में भाई-भाई-सा रहते

वे ही बालक बड़े होकर

“महान व्यक्ति’ हैं बनते।

 

– डॉ. पंडित विनय कुमार

 

रेल

 

टीना, राजू, गुड्डू, बबलू

एक बनाए लंबी रेल।

गुड्डू बने टीटी तो राजू भइया गार्ड।

टीना सीटी बजाएगी

और रेल दौड़ी जाएगी।

झंडी हरी दिखा कर बबलू

छुक-छुक को दौड़ाएगा।

खूब म़जा आएगा

जब स्टेशन आएगा।

संग-संग पूड़ी-पिज्जा खाएँ

बिना टिकट

के सैर कराएँ।

जो भी अच्छी

आदत हो

जो भी अच्छी आदत हो

तुम बचपन से ही डालो

घर खुद ही मजबूत बने

तुम पक्की नींव बना लो!!

तुम रीस किसी की करो न

घर में किसके क्या है बच्चों

तुम कभी उसपे नजर धरो न

खुश रहना सीखो हर हाल में!!

है जीभ हमारी बहुत चटोरी

तुम इसको बस में रखना

न मन तरसे कभी तुम्हारा

बस मेहनत का फल चखना!!

– विजय बजाज

 

ठण्डी हवा

 

चली है

ठिठुरन फैली हर गॉंव-शहर,

पर्वत से उतरी शीतलहर।

दिन छोटे, लम्बी होती रात,

दिनचर्या का बिगड़ा है अनुपात।

लादे कंबल, कोट, रजाई,

बाढ़ स्वेटरों की है आई।

कपड़े जितने पहनें ऊनी,

सर्दी लगती उतनी दूनी।

रात और दिन जले अंगीठी,

धूप बहुत लगती है मीठी।

सिकुड़ा-सिकुड़ा हारा-हारा,

दिखता है आंगन चौबारा।

लगता है जैसे बर्फ घुली है,

ठण्डी-ठण्डी हवा चली है।

तन कांप रहा है थर-थर-थर,

पर्वत से उतरी शीतलहर।

सर्दी दौड़ी आई

सूरज की अकड़ अपार,

नहीं धूप के कोई आसार,

सर्द हवाओं की बेहयाई….

देखो सर्दी दौड़ी आई

स्वेटर पहने मफलर ओढ़े,

काका झट-पट आए दौड़े,

कहें रात भर नींद न आई…

देखो सर्दी…

छोटे दिन और लम्बी रातें,

केवल चाय-कॉफी की बातें,

लस्सी, कुल्फी रास न आई…

बाहर है कोहरे का राज्य,

ठप्प पड़ा सब कामकाज,

गप्पू ने भी छुट्टी मनाई…

देखो सर्दी…

– मीरा हिंगोरानी

 

हाथी आया

हाथी आया हाथी आया,

राजू ने है मुझे बताया।

उसका तन तो बहुत बड़ा है,

देखो-देखो बाहर खड़ा है।

बड़े-बड़े हैं उसके कान,

सुनता बहुत लगाकर ध्यान।

उसकी सूंड है इतनी लम्बी,

उसके अपनी जितनी लम्बी।

उसकी पीठ है चौड़ी भारी,

उसपे बैठ के करें सवारी।

– गुलशन मदान

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