बेईमान राजनीति के नतीजे

किसी को भी यह स्वीकार कर लेने में कोई गुरे़ज या हिचक नहीं होनी चाहिए कि एक अरब से ऊपर की आबादी वाला विशाल भारत अब बारूद की ढेर पर बैठा है। बस एक चिन्गारी इसे एक महाविस्फोट के हवाले कर सकती है। आतंकी हौसले दिन-दिन नई बुलंदियॉं छूते, परवान चढ़ते जा रहे हैं और हमारी सरकारें, हमारा शासन-प्रशासन तथा सुरक्षा-तंत्र लाचारगी में सांप गुजर जाने के बाद लाठी से लकीर पीटता नजर आता है। पक्ष और विपक्ष की राजनीति लगभग संवेदन शून्य होकर ऐसे मौके पर भी अपनी राजनीतिक खिचड़ी पकाने से नहीं चूक रही। ऐसे में क्या यह मान लेना अऩुचित होगा कि देश का मौसम आतंकवादियों के लिए सर्वथा अनुकूल है। इस अनुकूल मौसम का फायदा उठाते हुए अगर वे इस धारणा से ग्रस्त हैं कि उनकी ताकत के आगे इस विराट तथा विशाल और महान देश की ताकत तिनके से भी कम वजन रखती है, तो उनकी इस सोच को न हम गलतफहमी कह सकते हैं और न ही खुशफहमी।

उनकी ताकत और उनके द्वारा विकसित नेटवर्क का अंदा़ज हम इसी से लगा सकते हैं कि अपने सिलसिलेवार बम धमाकों से वे दो प्रांतों के दो महत्वपूर्ण शहरों को सिर्फ चौबीस घंटों में निशाना बनाते हैं। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में वे अगर आधे घंटे के भीतर 9 विस्फोट करते हैं, तो गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में इसी अंतराल में 19 विस्फोट करते हैं। यह हमारे सुरक्षातंत्र का म़जाक उड़ाना ही समझा जाएगा कि वे टीवी चैनलों और अन्य संचार माध्यमों को अंजाम दी जाने वाली कार्यवाही की सूचना भी संप्रेषित करते हैं। इस हौसले के बारे में क्या कहा जाय कि हमें ललकार कर वे कहते हैं कि हमारे ़खतरनाक इरादों को रोक सको तो रोक लो। लेकिन हम रोक नहीं पाते। विस्फोटों के बाद हम लाशों की मर्दुमशुमारी करने में कभी कोताही नहीं बरतते। यह कि बेंगलुरू में 9 मरे और 100 घायल हुए और अमहदाबाद में 49 मरे और 200 घायल हुए। देश का शीर्ष नेतृत्व निन्दा प्रस्ताव पास करता है और शांति बनाये रखने का बयान साया करता है। पुलिस यह पता लगाने में जुट जाती है कि विस्फोट में आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया अथवा यूरिया का। बहुत हुआ तो दो-एक संदिग्धों का स्केच जारी कर आतंकवादियों का चेहरा पहचानने की जिम्मेदारी आम आदमी को सौंप देती है। विपक्ष की भूमिका में खड़ी भाजपा बराबर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को पोटा, टाडा और मकोका जैसा कानून लाने की हिदायत परोस रही है। जैसे जब ये कानून थे तो आतंकवाद के पॉंव में जंजीर पड़ गई थी। वहीं केन्द्र सरकार हर बार उसके इस प्रस्ताव को ़खारिज करती सिर्फ एक जुमले से बंधी समझ में आती है कि आतंकवाद से निपटने के लिए राज्य और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच एक समन्वयकारी फेडरल एजेंसी की ़जरूरत है। गऱज यह कि देश की पक्ष-विपक्ष की राजनीति अपने राजनीतिक हितों और प्रतिबद्घताओं से बाहर आकर इस मसले पर कोई राष्टीय सोच विकसित करने की कोशिशों से लाखों कोस दूर है।

देश को कमजोर मान लेना गलत होगा। दरअसल देश की राजनीति बेईमान हो गई है। देश आज भी अगर उदग्र भाव से खड़ा हो जाय तो आतंकी इरादों को काले समुद्र में डुबोया जा सकता है। लेकिन राजनीति हर प्रयास के रास्ते में अवरोधक है। वह इन त्रासद घटनाओं को भी अपने फायदे के खाते में डालने की कुटिल चालें चलती रहती है। ऐसी हालत में अगर आतंकी इरादों में इजाफा होता है और वे देश की अस्मिता को चुनौती देते हुए उसे अपने रहमो-करम का गुलाम बनाये रखना चाहते हैं, तो गलत उन्हें भले ही ठहराया जाय, उनके हौसले और इरादे कहीं से गलत नहीं हैं। उन्होंने यह तो साबित कर ही दिया है कि वे जो चाहें कर सकते हैं, जहॉं चाहे कर सकते हैं और जब चाहें तब कर सकते हैं। आतंकियों का यह जज्बा जिस खतरनाक ढंग से उभरा है उसने देश के आम आदमी को दहशत के ़खौफनाक साये में जीने को मजबूर कर दिया है। अब कोई ऐसी जगह तलाश नहीं की जा सकती जिसे सुरक्षित कहा जा सके। और यह सब हो रहा है तो उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि सियासत के इरादे बेईमान हो गये हैं। इस सियासत के बड़े सरमायेदार खुद के लिए तो बेहतरीन से बेहतरीन सुरक्षा-कवच, लड़-झगड़ कर अथवा अपनी कीमती जान को खतरे में बता कर हासिल कर लेते हैं और जब आतंकवादियों की ़खूनी सा़िजशें आम आदमी को निशाना बनाती हैं तो ये घड़ियाली आँसू बहाकर फर्ज अदायगीभर कर लेते हैं। देश मजबूत हो सकता है, देश आतंकवाद के हर नापाक मंसूबे को कुचल सकता है और देश अपनी ़जमीन पर उगने वाले सीमा पार के षड्यंत्रों को जड़ से उखाड़ कर फेंक सकता है। यह सब कुछ संभव है और किया जा सकता है, बशर्ते देश की सियासत ईमानदार हो जाय। और जब तक नहीं होगी तब तक हमें हर रोज और हर पल सॉंस रोक कर कभी बेंगलुरू, कभी अहमदाबाद और कभी कहीं, इन जानलेवा धमाकों का इंतजार करते ही रहना होगा। हालात इस कदर संगीन हो चुके हैं कि शायद मारे गये लोगों की गिनती बन्द कर दी जाय और बताया जाय कि अमुक विस्फोट में सिर्फ इतने ही लोग बचे। बकौल एक शायर-

जो सर बचा के तेरी रहगु़जर से लौट आया

़खुदा कसम वह अपनी हुनर से लौट आया।

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