भागीरथी को “कैद’ से मुक्ति दिलाने भगीरथ प्रयास

बीती 13 जून को उत्तरकाशी के मणिकर्णिका घाट पर भगीरथ की गंगा को “कैद’ से मुक्ति दिलाने के लिए बर्कले यूनिवर्सिटी के स्नातक रहे, कानपुर विश्र्वविद्यालय के पर्यावरणीय अभियांत्रिकी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रख्यात पर्यावरणविद् व जल वैज्ञानिक 74 वर्षीय डॉ. गुरदास अग्रवाल अनुष्ठान के बाद आमरण अनशन पर बैठे थे। अनशन से पूर्व उन्होंने कहा कि “एक वर्ष पूर्व वह गंगोत्री आए थे, वहॉं उन्होंने गंगा की पीड़ा देख उसे मुक्ति दिलाने हेतु 14 अप्रैल, 2007 को रामनवमी के दिन संकल्प लिया था। आज उसे वह पूरा कर रहे हैं। गंगा की धारा को सुरंग में कैद करने से धर्म, संस्कृति व पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।’ डॉ. अग्रवाल को प्रख्यात पर्यावरणविद् सुन्दर लाल बहुगुणा, राजेन्द्र सिंह (मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित जल बिरादरी के अध्यक्ष), अनुपम मिश्र, एमसी मेहता सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉयर्नमेंट की निदेशक सुनीता नारायण, राष्टवादी चिंतक गोविन्दाचार्य, योगगुरु बाबा रामदेव, विश्र्व हिन्दू परिषद उाांद के पूर्णसिंह कठैत सहित अनेकानेक स्वयंसेवी-समाजसेवी संस्थाओं, धार्मिक संगठनों व आम जनता का भरपूर सहयोग-समर्थन मिल रहा है और वे इसे राष्टीय स्वाभिमान से जुड़ा मुद्दा करार दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि गंगा भारत की पहचान है, मॉं है, पूजनीया है, वंदनीया है, जन-जन की धार्मिक आस्था की प्रतीक है, जिसका पवित्र जल प्रयोग कर हर धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है, यह विशुद्घ रूप से आस्था का प्रश्र्न्न है, भारत के स्वाभिमान का प्रश्र्न्न है, संस्कृति का प्रश्र्न्न है, राष्टीय जीवन के स्पंदन का प्रश्र्न्न है। गंगा की मुक्ति का यह सवाल भारत की अस्मिता और श्रद्घा से जुड़ा है, गंगा की धारा को सुरंगों और बांधों में कैद किए जाने के खिलाफ और उसके नैसर्गिक रूप से अविरल बहने देने की मांग से जुड़ा है।

असलियत यह है कि गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर ऊपरी क्षेत्र में चलने वाली पनबिजली परियोजनाओं से स्थानीय जलस्रोत सूख गए हैं। इससे गंगा के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। गंगा को रोककर सुरंगों में कैद किया जा रहा है। 90 मेगावाट वाली मनेरी-भाली परियोजना के पहले चरण के लिए गंगा को मनेरी में 14 किलोमीटर लम्बी सुरंग में कैद कर दिया गया है। इसका द्वितीय चरण भी पूरा हो चुका है। भैरों घाटी से ऐसी सुरंगों का सिलसिला शुरू होता है। 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला व 480 मेगावाट की पालामनेरी जल विद्युत परियोजना निर्माणाधीन है व भैरों घाटी प्रथम व द्वितीय पर काम शुरू होने की प्रिाया अंतिम चरण में है। इसीलिए डॉ. अग्रवाल की मांग है कि सरकार 90 मेगावाट वाली मनेरी-भाली परियोजना के गेट खोल दे और लोहारी नागपाला व पालामनेरी परियोजनाओं का निर्माण रद्द करे। जब तक ऐसा नहीं होगा और गंगा को मुक्ति दिलाने वाली नीति नहीं बनेगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

भाजपा शासन में गंगा प्रवाह पर टिहरी बांध के प्रभाव के अध्ययन हेतु 2001 में बनी मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय समिति की रिपोर्ट इसका जीता-जागता सबूत है। जोशी समिति ने रिपोर्ट में संस्तुति की थी कि गंगा का नैसर्गिक अविरल प्रवाह अति आवश्यक है और उसने इसके लिए विशेषज्ञों द्वारा और अध्ययन किए जाने को ़जरूरी बताया था। लेकिन हुआ क्या, वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हुई और रिपोर्ट रद्दी की टोकरी की शोभा बन इतिहास की बात हो गई।

जाने-माने वैज्ञानिक रवि चोपड़ा का मानना है कि “हिमखंडों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ घातक है। इसके परिणाम भयावह होंगे। अन्तर्राष्टीय स्तर पर भी यह स्वीकृत तथ्य है। फिर गंगा कोई बरसाती नदी नहीं, वह पूरे साल हिमखंडों से बहती है जो गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी तक अपनी 2500 किलोमीटर की यात्रा में असंख्य नदियों को आत्मसात् कर लेती है। यह तो पुण्यसलिला, पूजनीया और करोड़ों-करोड़ जनता की धार्मिक आस्था की प्रतीक है। इस मसले पर भारत जैसे धर्मप्रधान देश में सभी को एकजुट हो जाना चाहिए।’ नदियों को बांधों में कैद करने के सवाल पर लम्बे समय से बहस जारी है। जाने-माने पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र कहते हैं, “गंगा या अन्य नदियों का सवाल देश के सामने एक पहाड़ जैसा है। सरकारें कोई भी हों, उनका तो नदी-दोहन ही धर्म है और उसी में उन्हें विकास दिखाई देता है। उन्हें इसके खिलाफ खड़ा व्यक्ति विधर्मी दिखाई देता है। इस दोहन से समाज के बड़े भाग को जो अकथनीय, अपार कष्ट व यातनाएं सहनी पड़ती हैं, उसे विकास, प्रगति या पुनर्वास जैसे शब्दों में छिपाया नहीं जा सकता। इस स्थिति का निर्माण या इस नये धर्म का शंखनाद तो सबसे लोकतांत्रिक, उदार और प्रगतिशील माने गए दौर में भाखड़ा बांध जैसे नए धर्म के मंदिर से हो गया था। आजादी के बाद से आज तक का दौर उसके विस्तार का दौर है। अब नदियों की नये सिरे से न केवल चिंता करनी होगी बल्कि उसे समग्रता से लेना होगा और प्रकृति की देन नदी के उदार स्वभाव व उसकी सरलता-तरलता का सम्मान करना होगा।’

डॉ. अग्रवाल मानते हैं कि बड़े बांध ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं और पर्यावरण के लिए भीषण खतरा हैं। इतने दिन बाद भी देश की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर पसरा सन्नाटा इसका प्रतीक है कि सरकार विकास के भोगवादी एवं सुखवादी मॉडल पर कुर्बान है। उसे करोड़ों देशवासियों की भावनाओं और धार्मिक आस्थाओं की कतई चिंता नहीं है। भले वह गढ़ मुक्तेश्र्वर के बाद मैली हो गई है, फिर भी उसका जल आज भी अमृत है। इसकी रक्षा के लिए किए जा रहे यज्ञ में डॉ. अग्रवाल अन्य संतों, सहयोगियों के साथ अपनी आहुति दे रहे हैं। डॉ. अग्रवाल इस पुनीत यज्ञ की समिधा बनते हैं या प्रह्लाद की तरह विरोधियों को परास्त कर सफलता का वरण कर दूसरे भगीरथ बनते हैं, यह भविष्य के गर्भ में है।

 

– ज्ञानेन्द्र रावत

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