भारत की संस्कृति के प्रतीक हैं त्योहार

दुनिया के हर देश का अपना ज्ञान है, अपनी संस्कृति है, अपना धर्म है। भारत का ज्ञान, भारत की संस्कृति, भारत का धर्म उसका वैदिक ज्ञान है। भारत की विश्र्व सत्ता का यही आधार है। इसी आधार पर भारत जगद्गुरु कहलाता है। अपने इसी वैदिक ज्ञान के उजाले से भारत पूरे विश्र्व को प्रकाशित करता है। आज विडम्बना यह है कि भारत अपने इन्हीं वैदिक सिद्घान्तों की उपेक्षा कर पश्र्चिमी नीतियों में फंसा हुआ है। भारत के कर्ताधर्ता विकास के पश्र्चिमी रोड-मैप को अपना आदर्श मानकर उसी पर चल रहे हैं। विकास का भारतीय रोड-मैप तो उसका वैदिक ज्ञान है, जो सारे विश्र्व प्रशासन का संविधान है। जिस संविधान से सारा विश्र्व चल रहा है, वह वेद ही है।

भारत की वैदिक परम्परा में वैदिक-धर्म के महत्व की बात होती है, वेद की सत्ता की बात होती है, वेद के क्षेत्र की बात होती है। भावातीत सत्ता वेद की सत्ता है और भावातीत क्षेत्र वेद का क्षेत्र है। भावातीत सत्ता पर अधिकार से वेद का ज्ञान हो जाता है। सर्वज्ञ-सर्वसमर्थ वैदिक सत्ता पर अधिकार हो जाता है तो हर क्षेत्र में सर्वज्ञता और सर्वसमर्थता व्यावहारिकता में उतर आती है। भावातीत सत्ता पर अधिकार कैसे होता है। यह होता है अपने वैदिक-धर्म में रहने से, वैदिक परम्परा में बताये गये विधानों से। वैदिक परम्परा में वैदिक-धर्म क्या है? ध्यान, योग, भक्ति, यज्ञ, अनुष्ठान, वेद-पाठ, मंत्र-जाप सहित सभी वेद विधायें वैदिक-धर्म हैं, जिनका पालन करने से सर्वज्ञता और सर्वसमर्थता आ जाती है अर्थात् भावातीत सत्ता पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। यह भारत का धर्म है, भारत की संस्कृति है। देवभूमि भारत की संस्कृति त्योहारों पर झलकती है।

भारतीय अपनी ज्ञान-परम्परा को अपने यहां मनाये जाने वाले त्योहारों के माध्यम से जानते आये हैं। देवभूमि भारत के लोग अपनी दैनिकी में, विभिन्न पर्वों, त्योहारों, उत्सवों के लिए निर्धारित दैवी अनुष्ठानों से, त्रिकाल संध्या-वंदन से, यज्ञ-अनुष्ठान से, वेद-पाठ से, मंत्र-जाप से विभिन्न त्योहारों-उत्सवों पर विभिन्न देवी-देवताओं के लिए निर्धारित दिन पर उनके शक्ति जागरण के विधानों के आयोजन से, चेतना से सर्वगुण सम्पन्नता जागृत होती है। भारत के गांव-गांव में यह विद्या प्रचलित है।

– महर्षि महेश योगी

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