भ्रम: मस्तिष्क का मायाजाल या कुछ और

आपको यह जानकर आश्र्चर्य होगा कि भ्रम की दशा हमारे मस्तिष्क की एक उलझनपूर्ण स्थिति है और इस स्थिति को समझने के लिए चिकित्सा विज्ञान में अनेक शोध चल रहे हैं। मस्तिष्क के इस रहस्य को जानने-समझने के लिए कई वैज्ञानिकों ने अपने-अपने सिद्घांत भी प्रतिपादित किए हैं, लेकिन आज तक इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा नहीं हटाया जा सका है।

एक सिद्घांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क के दो भाग होते हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे “दो दिमाग’ भी कहते हैं। यह दोनों भाग स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं तथा आपस में लगभग 200 मिलियन नर्व फाइबर्स से जुड़े होते हैं, जिसे “कारपस केलोसम’ के नाम से जाना जाता है। कारपस केलोसम केवल स्तनधारी प्राणियों में पाई जाती है, जिसका मुख्य कार्य है मस्तिष्क के एक भाग से दूसरे भाग को यह कहना कि वह क्या कर रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य का बायां मस्तिष्क उसके शरीर के दायें भाग को तथा दायां मस्तिष्क शरीर के बायें भाग को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के ये दोनों भाग देखने में एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब लगते हैं, परन्तु उनके कार्यों में काफी अंतर होता है।

वैज्ञानिकों द्वारा मस्तिष्क के दोनों भागों का स्कैन करने पर यह पाया गया कि बायां मस्तिष्क दायें मस्तिष्क की अपेक्षा अधिक सिाय होता है। बायें मस्तिष्क की अधिक सिायता की पुष्टि इस बात से भी होती है कि संसार भर में लगभग 90 प्रतिशत लोग अपने दैनिक-कार्य जैसे भोजन करना, किसी वस्तु को पकड़ना या उठाना, लिखना तथा कलात्मक कार्य करना आदि अपने दायें हाथ से ही करते हैं और मस्तिष्क के दायें भाग का नियंत्रण या संचालन बायें मस्तिष्क से होता है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह बात सामने आई है कि जो कार्य अधिक कठिन, सूक्ष्म तथा विश्लेषणात्मक होते हैं, उन्हें बायां मस्तिष्क और जो कार्य भावनात्मक मन, ज्ञान एवं किन्हीं घटनाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं, उन्हें दायां मस्तिष्क नियंत्रित करता है। इस प्रकार मस्तिष्क के दोनों भागों में अलग-अलग कार्यों की अलग-अलग इमेज बनती है। कई बार हम किसी घटना, डरावनी आकृति, व्यक्ति या जीव-जंतु से इस प्रकार घबरा या डर जाते हैं कि वह हमारे दिमाग में पूर्णतया अंकित हो जाता है। जब मस्तिष्क के दोनों भागों में उसका प्रतिबिम्ब चला जाता है, तब दिमागी कार्यों में व्यवधान पैदा होता है। इसे भ्रम की अवस्था कहते हैं। ऐसी स्थितियों में हमारा मस्तिष्क कुछ समय के लिए यह तय नहीं कर पाता कि उसे इसे किस भाग से नियंत्रित करना है और हम रस्सी को सांप, परछाई को भूत आदि समझने का भ्रम पाल बैठते हैं।

जब कोई व्यक्ति अधिक परेशान होता है या किसी घटना से डरा-सहमा हुआ होता है, तब उसे अपने आसपास उसी घटना से संबंधित पात्र नजर आते हैं और उसका दिमाग भ्रमपूर्ण स्थिति का शिकार होने लगता है। मस्तिष्क की भ्रम अवस्था पर अभी भी अनेक शोध चल रहे हैं, लेकिन इस अनसुलझी पहेली का आज तक आधुनिक विज्ञान कोई सटीक हल नहीं निकाल पाया है। आशा है, भविष्य में हमारे वैज्ञानिक मस्तिष्क के इस मायाजाल को तोड़कर उसका रहस्य उजागर कर पाएंगे।

– उमेश कुमार साहू

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