मंदी की मार से हताश भारतीय समाज

म़जदूरों में घबराहट है। रोजाना विभिन्न नगरों में एक नियत स्थान पर हर सुबह एकत्र होने वाले मजदूरों को अब कम काम मिल रहा है। 80 से 100 रुपये की दिहाड़ी रोजाना लेने वाले मजदूर अब 50-60 रुपये में भी काम करने को राजी हैं, लेकिन उन्हें काम देने वालों की कमी पड़ गई है। पहले अनेक बार ऐसा होता था कि एक मालिक या ठेकेदार आया और जितने मजदूर मिले, सबको एक साथ ले जाता था। अब बहुत-सी फैक्टियों में काम बंद है।

बहुत-सी कंपनियों/पूंजीपतियों ने नई परियोजनाओं पर काम करना स्थगित कर दिया तथा चल रही परियोजनाएँ कुछ समय के लिए रोक दी हैं। जो परियोजनाएँ चल रही हैं, उनमें कर्मचारियों की छंटनी प्रारंभ कर दी है। इस आर्थिक असुरक्षा के समय में बाजार में ग्राहक कम आ रहे हैं। इससे दुकानदार परेशान हैं और उन्होंने भी 2 से 5 ह़जार तनख्वाह वाले अपने कुछ कर्मचारी हटाए और कुछ ने अपने कुछ कर्मचारियों को अगले कुछ दिनों में दूसरा काम ढूंढ लेने को कह दिया।

बहुत-से बाबुओं ने अपनी बचत का पैसा शेयरों में लगा दिया था, उनकी काफी रकम डूब गई। वे परेशान हैं। उन्होंने कभी कार, बंगला खरीदने या किसी और बड़े काम की कोई योजना बनाकर शेयरों में निवेश किया था। छोटी-मोटी कंपनियों के कर्मचारी परेशान हैं कि न जाने कब मंदी की मार उनकी कंपनी पर पड़ जाए और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।

इसके अलावा उन कंपनियों के कर्मचारी तक आर्थिक असुरक्षा से भयभीत हैं जो कंपनियॉं सैकड़ों साल पुरानी हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है और डूबने की स्थिति में नहीं हैं। अमेरिका के बड़े-बड़े निगम डूब गये, तो क्या पता हमारी कंपनी भी कब हाथ खड़े कर दे। आखिर हर आदमी यह सोचता है कि लंबे समय तक माल बिना बिका पड़ा रहा और उत्पादन नहीं बढ़ा, तो कोई भी कंपनी कब तक टिकी रह सकती है।

आर्थिक मंदी से घबराए बहुत-से लोगों ने नई दुकान खोलने, यहॉं तक कि विवाह जैसे काम तक स्थागित कर दिए हैं। अफसोस की बात यह है कि सब लोग मंदी-मंदी चिल्लाए जा रहे हैं लेकिन वस्तुओं की कीमतों में कहीं कमी नहीं दिख रही।

जब हमारे यहॉं पैटोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाए गये थे, तब कच्चे तेल का भाव लगभग डेढ़ सौ डॉलर प्रति बैरल था। अब जबकि इसके दाम पचास डॉलर प्रति बैरल तक आ गये, तो सरकार और पैटोलियम का कारोबार करने वाली कंपनियॉं विपक्षी राजनीतिक दलों और विभिन्न नागरिक समूहों की मॉंग के बावजूद दाम घटाने को राजी नहीं। बड़ी मुश्किल से दाम पॉंच रुपये लिटर घटाये गये।

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने उद्योग जगत से अपील की कि वे वस्तुओं के दाम घटाएँ। उद्योग जगत ने इस मॉंग को अव्यावहारिक करार देते हुए ठुकरा दिया, पर उद्योग जगत अपने तई बैंकों के कर्ज पर कम ब्याज दरों और अन्य सुविधाओं की मॉंग आज भी कर रहा है।

नागरिक उड्डयन-मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने विमानन कंपनियों से मॉंग कर डाली कि वे किरायों में कमी करें। तेल की घटी कीमतों का यात्रियों को लाभ मिलना चाहिए। किरायों में कुछ हद तक कमी हुई भी, किन्तु हास्यास्पद बात है कि उन्हीं की सरकार न तो चीजों के मूल्यों का निर्धारण कर पा रही है और न पैटोलियम पदार्थों के दाम कम कर रही है। केवल निजी क्षेत्र से मॉंग भर कर रही है। इसका मतलब साफ है कि उसे जनता की दिक्कतों की कोई चिंता नहीं है। वह महॅंगाई रोकने और मंदी से जनता को बचाने का नाटक भर कर रही है। नहीं तो क्या कारण है कि मुनाफाखोरी रोकने को वह कोई कड़ा कानून नहीं ला रही?

निजी क्षेत्र मंदी की आड़ लेकर कर्मचारियों की छंटनी कर रहा है। मंदी का हल्ला इस कदर कर दिया गया कि इसकी आड़ में श्रम कानूनों को आसानी से धता बताया जा सकता है। यही हो रहा है। अमेरिकी वित्तीय संकट का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा ़जरूर, और वह पड़ना भी था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा मुनाफाखोरी हमारा पूंजीपति वर्ग कर रहा है। ़यहॉं के आम आदमी, मजदूर व किसान की उसे चिंता कभी रही ही नहीं। अब उसे बैठे बिठाए मंदी का बहाना मिल गया और वह अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने लगा।

सरकार मूक दर्शक बनी हुई है। सरकार को लगता है कि वह सही लाइन पर चल रही है और जनता उसकी मजबूरी समझ रही है, लेकिन तीव्र संचार के इस युग में जनता को इतनी भोली समझना सरकार की नासमझी है। अब जनता को ऐसी नौटंकियों से बरगलाना आसान नहीं। जनता मजबूर है तो महज इसलिए, कि उसके समक्ष विकल्पों का अभाव है। ले-देकर उसने कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा या तथाकथित वामपंथियों में से ही किसी एक को चुनाव में चुनना है।

जनता जानती है कि चुनाव में चेहरे और नाम बदल जाते हैं, बाकी कुछ नहीं बदलता और जनता बेचारी एक को हटा कर दूसरे को बिठा कर खुश हो लेती है कि हमने पहले वाले को धूल चटा दी। लेकिन सरकार का यही रवैया रहा तो यह स्थिति भी ज्यादा दिन रहने वाली नहीं है। आदमी ने हमेशा नये रास्ते तलाशे हैं, यह उसकी फितरत है।

 

– ए. पी. भारती

Leave a Reply

Your email address will not be published.