महिला और पुरुष

ऐसे बहुत से मुद्दे अभी शेष हैं, जिन पर महिलाओं और पुरुषों का नजरिया भिन्न है या आपस में टकराता भी है। लेकिन एक जगह है, जहां वह एक ही पायदान पर खड़े हुए हैं-   बतौर एक ही टीम के सदस्य के उनमें तालमेल बड़ा जबरदस्त बैठता है। यह स्थिति चाहे क्रिएटिव क्षेत्र में हो या कार्पोरेट क्षेत्र में, दोनों लिंग एक-दूसरे से अच्छा सहयोग करते हैं और विचारों का अच्छा आदान-प्रदान भी होता है। एक टीम के बतौर इनमें जो पूरक गुण हैं, वह सभी संबंधितों को लाभ पहुंचाते हैं। मसलन, यश और अवंति बिड़ला की पति-पत्नी की टीम अपने व्यापार साम्राज्य को जबरदस्त ढंग से चला रही है। शाहरूख खान व जूही चावला की टीम न सिर्फ अच्छी फिल्मों का निर्माण कर रही है बल्कि आईपीएल टीम-कोलकाता नाइट राइडर्स के भी यह मालिक हैं। इससे जाहिर होता है कि अब पुरुष-महिला पार्टनरशिप का भी टेंड चल निकला है।

क्रिएटिव संपर्क

महिला और पुरुष की क्रिएटिव ऊर्जाएं कला और संस्कृति के क्षेत्र में बहुत अच्छी तरह से सहयोग करके आगे बढ़ती हैं। अक्सर यह देखा गया है कि अपने क्रिएटिव कामों को संभालने का नजरिया पुरुषों और महिलाओं का भिन्न होता है। इसलिए सवाल उठता है कि क्या वे आपसी क्रिएटिव सहयोग से लाभान्वित होते हैं? हालांकि बहुत से क्रिएटिव कलाकार अपने विषयों को लेकर अपने आपको अधिक भावुक व क्रिएटिव समझते हैं, लेकिन वे इस बात से भी इन्कार नहीं करते कि विपरीत सेक्स के अपने सहयोगी से, जो उन्हें क्रिएटिव इनपुट्स मिलते हैं, उनसे उन्हें बहुत लाभ मिलता है। यह एक किस्म का साधारण बार्टर सिस्टम है- आप यह दो और बदले में यह लो।

जब विचारों को लागू करने की बात होती है तो हर लिंग अपने साथ विभिन्न कौशल लेकर आता है। मसलन, महिलाएं अधिक संगठित होती हैं। वे खर्च और कार्याम को अधिक संवेदना और जिम्मेदारी से संभालती हैं। वे पागलपन में भी यही रास्ता निकाल लेती हैं।

बोर्डरूम में

कार्पोरेट क्षेत्र में बहुत से संगठन दोनों सेक्सों के बीच सहयोग से उत्पन्न स्वस्थ माहौल से भरपूर फायदा उठाते हैं। जब से महिलाओं ने कार्यस्थल में प्रवेश किया है, श्रम के लिंग आधारित विभाजन को फिर से समझने का प्रयास किया जा रहा है। पुरुष और महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर इस तरह काम करते हैं कि संगठन या उद्देश्य को लाभ मिलता है। दरअसल, दोनों लिंग, एक-दूसरे के जबरदस्त पूरक हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि बड़ी कंपनियों के मानव संसाधन विभाग इस परिवर्तन का नोटिस ले रहे हैं? शायद स्पष्ट या साधारण तरीके से तो नहीं, लेकिन कार्पोरेट परिदृश्य में दोनों लिंगों का मिलना और आपस में सहयोग करने से कंपनियों को लाभ अवश्य मिलते हैं।

हालांकि काम के मामले में महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे से कम नहीं हैं और इनमें कोई फर्क भी नहीं है, लेकिन महिलाएं कार्य और जीवन में बेहतर संतुलन स्थापित करती हैं। इस संतुलन को बनाये रखने और स्वीकार करने में पुरुष भी पीछे नहीं हैं। इसलिए कार्यस्थल पर परफॉर्मेंस बेहतर होता जा रहा है।

एक दिलचस्प दृष्टिकोण उन क्षेत्रों से भी सामने आ रहा है, जहां पुरुष और महिला सहकर्मी पति और पत्नी भी हैं। कविता मीर ने अपने पति के साथ मिलकर 18 वर्ष पहले ब्रॉडकास्ट इण्डिस एग्जीबिशन एंड सिम्पोजियम का गठन किया था। इस संयुक्त वेंचर की कामयाबी इस वजह से है, क्योंकि कुशलता के अनुसार एक-दूसरे के बीच काम का विभाजन है। कविता मीर कहती हैं, “”मेरे पति टेक्नीकल फील्ड से हैं। इसलिए उनकी योग्यता भी महत्वपूर्ण है। मुझे लोगों से संपर्क स्थापित करने में महारत है, इसलिए मैं मार्केटिंग और संगठन को देखती हूं।”

इनके अलावा भी पति-पत्नी की और बहुत-सी टीमें हैं, जो साथ काम और टैवल करती हैं और इस तरह जबरदस्त कामयाबी के साथ व्यक्तिगत खुशी भी हासिल कर रही हैं। कुल मिलाकर देखने वाली बात यह है कि अगर महिला और पुरुष एक ही टीम में हों, तो जबरदस्त फायदा मिलता है। इसलिए भविष्य की कार्पोरेट टीमें महिलाओं और पुरुषों की साझा टीमें ही हुआ करेंगीं, इसमें कोई दो राय नहीं है।

– नरेन्द्र कुमार

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