म़जबूत राष्टीय न्यायिक परिषद जरूरी

कोलकाता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन पर महाभियोग चलाने की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश से स्पष्ट हो जाता है कि हमारी उच्च न्यायपालिका अपने सम्मान और कीर्ति की रक्षा करने में विफल रही है। सौमित्र सेन पर आरोप है कि उन्होंने, जब वह वकील थे रिसीवर के रूप में 1993 और 1995 के दौरान 24.57 लाख रुपये प्राप्त किये। उन्होंने समय-समय पर इस रकम में से काफी बड़ी राशियां अपने खाते में डालीं और अपने लाभ के लिए उसका उपयोग किया। बाद में उन्होंने यह राशि वापस कर दी।

उनके मामले की जॉंच के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त तीन सदस्यों की समिति का कहना है कि सौमित्र सेन के आचरण से न्यायपालिका की बदनामी हुई है और न्याय प्रशासन पर जनता के विश्र्वास को ठेस लगी है। धन वापस करने से अमानत में खयानत का अपराध समाप्त नहीं हो जाता। समिति के सदस्य थे- मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एपी शाह, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एपी पटनायक और राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश आरएम लोढा।

सौमित्र सेन के आचरण से जनता की इस धारणा को बल मिला है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय उनके पूर्व इतिहास की जॉंच नहीं की जाती और उच्च न्यायपालिका क्षेत्र में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार प्रवेश कर रहा है। अगर समय रहते कठोर उपाय अपना कर इसे नहीं रोका गया तो इसके विनाशक परिणाम हो सकते हैं। गाजियाबाद में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के भविष्यनिधि खाते में करोड़ों रुपये के घपलों और हरियाणा एवं पंजाब हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश के घर पर किसी व्यक्ति द्वारा 15 लाख रुपये भेजने से उनकी यह धारणा और म़जबूत हुई है।

इधर, पिछले कछ वर्षों के दौरान उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार, पक्षपात, आचार संहिता के उल्लंघन और न्याय के सिद्घांतों के उल्लंघन के आरोप लगाये गये हैं। ये आरोप समाचारपत्रों में सुर्खियों के साथ प्रकाशित हुए। आरोप लगाने वाले लोगों में एक पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और कुछ वरिष़्ठ वकील थे। इन आरोपों की उपेक्षा की गयी। इनकी जॉंच की किसी ओर से कोई व्यवस्था नहीं की गयी। लोकतंत्र और न्यायपालिका के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

इधर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएम वर्मा ने यह रहस्योद्घाटन कर सनसनी फैला दी है कि उन्होंने मार्च, 1997 और जनवरी, 1998 के बीच अपने कार्यकाल के दौरान एक न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी। सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने उस मामले पर विचार करने के बाद राय दी थी कि उक्त न्यायाधीश के विरुद्द कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन प्रधानमनंत्री कार्यालय ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। यद्यपि न्यायमूर्ति वर्मा ने संबंधित न्यायाधीश और प्रधानमंत्री का नाम बताने से इनकार कर दिया। उक्त अवधि में एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे। संबंधित न्यायाधीश पर महाभियोग क्यों नहीं चलाया गया? क्या ऐसा भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और पक्षपात के कारण किया गया? यह स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायाधीशों की मंडली करती है। कार्यवाहक न्यायाधीशों को स्थायी करने का अधिकार भी इसी मंडली को है। लेकिन भारत सरकार द्वारा प्रकाशित सूचना के अनुसार कार्यवाहक न्यायाधीशों को स्थायी करते समय अधिकांश मामलों में मुख्य न्यायाधीश ने न्यायाधीशों की मंडली को विश्र्वास में नहीं लिया। पूर्व कानून मंत्री अरुण जेटली के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति आदि में कार्यपालिका की भूमिका नगण्य है। सौमित्र सेन की नियुक्ति उन्हीं के कार्यकाल में हुई थी।

पिछले दो वर्षों से राष्टीय न्यायिक परिषद गठित करने का प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन है। इस विधेयक के अनुसार इस परिषद के सभी सदस्य सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश होंगे। न्यायाधीश अपनी मंडली में बाहरी लोगों को शामिल करने के विरुद्घ हैं। विश्र्व में कहीं भी न्यायाधीश, न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करते हैं लेकिन यहॉं न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने ये अधिकार अपने पास रखे हैं।

अब विसंगति यह है कि न्यायाधीशों को नियुक्त करने का अधिकार तो न्यायपालिका को है लेकिन हटाने का अधिकार नहीं है। न्यायाधीशों को केवल संसद में महाभियोग चलाकर हटाया जा सकता है। महाभियोग चलाने की प्रिाया अत्यधिक जटिल और समय लेने वाली है। महाभियोग के प्रस्ताव विचारार्थ स्वीकृत करने के लिए लोकसभा के 100 और राज्य सभा के 50 सदस्यों का समर्थन ़जरूरी है। निर्धारित सदस्यों के समर्थन के बाद जब प्रस्ताव विचारार्थ स्वीकृत हो जाता है तो लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति न्यायाधीश के विरुद्द लगाये गये आरोपों की जॉंच के लिए एक समिति का गठन करते हैं। समिति की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद सदन में महाभियोग पर बहस होती है। अगर सदन में उपस्थित दो-तिहाई सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते हैं तो महाभियोग पारित माना जाता है और राष्टपति संबंधित न्यायाधीश को सेवा से हटा देते हैं।

स्वतंत्रता के बाद अभी तक केवल एक न्यायाधीश, हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी पर महाभियोग चलाया गया है। रामास्वामी पर हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में वित्तीय और प्रशासनिक अऩियमितता करने के आरोप थे। महालेखाकार ने उनकी फिजूलखर्ची की कड़ी आलोचना की थी। रामास्वामी के महाभियोग में तीन वर्ष से अधिक समय लगा। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिलने से वह प्रस्ताव गिर गया। प्रस्ताव के पक्ष में विपक्ष के 196 सदस्यों ने मत दिया। कांग्रेस और उसके समर्थक 205 सदस्यों ने सदन में उपस्थित रहने के बावजूद मतदान में हिस्सा नहीं लिया।

रामस्वामी प्रकरण से यह सिद्घ हो जाता है कि महाभियोग का रास्ता व्यावहारिक और कारगर नहीं है। इसका विकल्प मजबूत, स्वतंत्र और पारदर्शी राष्टीय न्यायिक परिषद का गठन है।

 

– नवीन पंत

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