माया शरणम् गच्छामि

विश्र्वासमत का गुणा-गणित किसके खाते में जीत और किसके खाते में हार दर्ज करता है, यह और बात है क्योंकि पक्ष-विपक्ष का संतुलन अभी बराबर का ही समझा जा रहा है। इस स्थिति में सरकार बच भी सकती है और जा भी सकती है। अतएव इन अटकलबाजियों से बाहर आकर अगर राजनीतिक हानि-लाभ का आकलन किया जाय तो एक नाम निश्र्चित तौर पर उभर कर सामने आता है, जिसके खाते में लाभ का एक बहुत बड़ा हिस्सा जाता दिखाई दे रहा है। वह एकमात्र नाम है- उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का। यह निर्विवाद है कि राजनीतिक अवसरों को अपने ह़क में भुनाने की कला जैसी इस महिला ने प्रदर्शित की है, वैसा प्रदर्शन शायद ही भारतीय राजनीति में अब तक कोई कर सका है। हालॉंकि उन्होंने प्रांतीय राजनीति से बाहर आकर राष्टीय राजनीति की बागडोर संभालने की अपनी इच्छा कई बार और कई अवसरों पर प्रकट की है, लेकिन राष्टीय राजनीति में छलांग लगाने का अवसर इतनी जल्द ़खुद अपने आप चल कर उनके दरवाजे तक आ जाएगा, इसके विषय में उन्होंने शायद ही कभी सोचा हो। हैरत की बात तो यह है कि वे पार्टियॉं जो अब तक उनको भाव देने से परहेज करती रही थीं, बिना मांगे अपना समर्थन उनकी झोली में डाल रही हैं और प्रधानमंत्री पद के लिए उन्हें अपना उम्मीदवार भी घोषित कर रही हैं।

विश्र्वासमत के खिलाफ संख्या बल जुटाने में जिस ताकत का प्रदर्शन मायावती ने किया है, वह ताकत न विपक्ष की भाजपा दिखा सकी है और न ही वामपंथी दल। अपने चिरपिरिचत प्रतिद्वन्द्वी मुलायम सिंह की पार्टी सपा के सांसदों को तो उन्होंने अपने पक्ष में तोड़ा ही है, जिस तरह उन्होंने हाल तक सरकार के पक्ष में जाने का मन बना रही कुछ पार्टियों को अपने खेमे में खींचा है, वह उनकी ताकत को अपरिहार्य सिद्घ करने के लिए काफी है। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा की जद (एस), उत्तर प्रदेश के जाट नेता अजीत सिंह का रालोद और चन्द्रशेखर राव की तेरास अपने शुरुआती दौर में यही संकेत दे रहे थे कि वे विश्र्वासमत के पक्ष में सरकार के साथ जा सकते हैं। उन्हें विपक्षी खेमें में लाने की कवायदें भाजपा और वामपंथियों ने भी ामशः की हैं, लेकिन मायावती के एक इशारे ने उन्हें खुलकर अपने साथ आने की रजामंदी ले ली। यह समझने योग्य एक तथ्य है कि न्यूक डील के मामले पर सरकार गिरा देने की मुहिम चलाने वाली भाजपा और वामपंथी इस मामले पर विपक्षी खेमे के एक भी सांसद को अपने सारे प्रयासों के बावजूद तोड़ नहीं सके। उस खेमें में घुस कर अगर कुछ तोड़-फोड़ करने की सफलतापूर्ण कार्रवाई किसी ने की है तो सिर्फ मायावती ने। इस दृष्टि से विपक्ष की राजनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा अगर मायावती के पीछे खड़ा उनका जयकारा करता दिखाई देता है और उन्हें अपना नेता स्वीकार कर रहा है तो इसे आश्र्चर्यजनक भी कहा जा सकता है और अप्रत्याशित भी। आगे की राजनीति किस दिशा में अग्रसर होती है, इसकी भविष्यवाणी कठिन है, लेकिन यह कहना बहुत आसान है कि इस दलित महिला ने अपने कद के सामने राष्टीय राजनीति में एक लंबे समय से स्थापित लोगों को बहुत बौना साबित कर दिया है।

राष्टपति को अपनी ओर से विश्र्वासमत का प्रस्ताव देने वाले प्रधानमंत्री अपने बहुमत के प्रति पूरी तरह आश्र्वस्त समझ में आते थे। बहुत हद तक उनका यह विश्र्वास काल्पनिक भी नहीं था क्योंकि सपा का समर्थन मिल जाने के बाद कई छोटे-छोटे दलों और निर्दलियों का समर्थन जुटा लेना सरकार के प्रबंधकों के लिए बहुत आसान था। यह निश्र्चित है कि अगर परिदृश्य में मायावती न होतीं, सिर्फ भाजपा अथवा वामदल होते, तो इन्हें कांग्रेस के पक्ष में जाने से कोई रोक भी नहीं सकता था। लेकिन अकस्मात मायावती ने इस राजनीतिक परिदृश्य में प्रवेश कर सरकार के आश्र्वस्त रहने के सारे आधार तोड़ दिये हैं। लड़ाई को खींच कर उन्होंने अगर बराबरी की हैसियत में ला दिया है और सरकार को अपने अस्तित्व के संकट के रूबरू खड़ा कर दिया है, तो यह उनकी ताकत का परिचायक तो है ही, भविष्य की राजनीति का नया दिशा-निर्देश भी है। वामदल अब अपनी सारी लड़ाई मायावती के सेनापतित्व में लड़ने के प्रति रजामंद दिखाई देते हैं। मुलायम सिंह के कांग्रेस खेमे में चले जाने के बाद अपने को असहाय मान लेने वाला तीसरा मोर्चा मायावती के वरदहस्त से संजीवनी पा गया लगता है। इस दृष्टि से विश्र्वासमत की हार-जीत से अलग, आने वाले चुनाव में राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक नया केन्द्र स्पष्ट तैयार होता दिखाई दे रहा है। अब तक जो लड़ाई राजग और संप्रग तक सीमित थी, वह लड़ाई आने वाले दिनों में तीसरे मोर्चे को भी अपने केन्द्र में रख सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती ने जिस राजनीतिक सूझ-बूझ और समीकरण के जरिये सपा, भाजपा और कांग्रेस को एक साथ हाशिये पर डाला है, अगर वह प्रयोग उनका राष्टीय स्तर पर सफल होता है तो उन्हें एक राष्टीय शख्सियत का दर्जा बहुत जल्द मिल जाएगा। उनकी यह ताकत वास्तव में उनके दलित-वोट बैंक की है, जो आँख-मूँद कर उनके इशारे पर अपना वोट न्यौछावर करता है। वे यह भी ताकत रखती हैं कि अपने वोट-बैंक का इस्तेमाल किसी के भी ह़क में कर सकती हैं। बहुत ते़जी से अपना जनाधार खोती जा रही बड़ी-छोटी पार्टियॉं “मायावती शरण गच्छामि’ के नारे के साथ यही लालसा लिए उनके सामने विनीत खड़ी हैं।

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