मुक्तक

अपना दाना सबकी ऩजरों से बचा ले जाएगा,

उसको उसकी जीत का, पहला नशा ले जाएगा।

पंख ़ज़ख्मी हैं परिन्दे के, म़गर तुम देखना,

घोंसले तक उसको, उसका हौसला ले जाएगा।

 

कहते हैं हमसे संत कि, दौलत असार है,

ये एकतरफ़ा आपका, कैसा विचार है।

देते नहीं हैं आप तो उपदेश मुफ़्त में

बतलाइये फ़िर आपको क्यूं इससे प्यार है?

 

हिम्मत न थी तो दुनिया में आया ही क्यूँ भला,

फिर ़िंजदगी से हाथ मिलाया ही क्यूँ भला।

हथियार डालना ही था बु़जदिल तुझे अगर,

फिर फ़़र्ज की तलवार उठाया ही क्यूँ भला।

 

– नरेंद्र राय

 

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