मुशर्रफ की विदाई

अंतिम दम तक महाभियोग का सामना करने का दम भरने वाले पाकिस्तान के राष्टपति परवे़ज मुशर्रफ ने अंततः अपने हथियार डाल दिये। राष्टपति पद से दिया गया उनका इस्तीफ़ा पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार की विजय मानी जाएगी। क्योंकि 1999 में मुशर्रफ ने ऐसी ही एक लोकतांत्रिक सरकार को एक रक्तहीन सैनिक कार्यवाही के जरिये अपदस्थ किया था और वे सैनिक तानाशाह बनकर पाकिस्तान की गद्दी पर काबिज हुए थे। यह भी एक संयोग ही है कि तब जिस व्यक्ति की अगुआई में चलने वाली सरकार को उन्होंने अपदस्थ किया था, उसी व्यक्ति ने 9 साल बाद उन्हें राष्टपति पद से त्यागपत्र देने को सर्वाधिक म़जबूर किया है। और वह व्यक्ति हैं पूर्व प्रधानमंत्री नवा़ज शरीफ। पीएमएल (एन) के सरबराह नवा़ज शरीफ तो जैसे मुशर्रफ से अपना पुराना बदला चुकता करने पर तुले हुए थे। उनका समर्थन भी पीपीपी सरकार को इसी एक मुद्दे की बुनियाद पर टिका था। तल़्खी तो पीपीपी के सहअध्यक्ष आसिफ अली जरदारी के मन में भी मुशर्रफ के प्रति थी, लेकिन एक हिचक भी थी। हिचक यह कि कहीं मुशर्रफ के खिलाफ़ लाया जाने वाला महाभियोग आवश्यक संख्या के अभाव में “फ्लाप शो’ न साबित हो। लेकिन नवाज शरीफ के दबाव में महाभियोग लाकर मुशर्रफ को राष्टपति पद से हटाने का निर्णय उन्हें लेना ही पड़ा। हालॉंकि दबाव इस बात का भी बनाया गया कि वे सम्मानपूर्वक इस्तीफा दे दें।

अन्ततः यह दबाव काम आ ही गया और मुशर्रफ ने यह कहते हुए कि वे पाकिस्तान को राजनीतिक अस्थिरता के दौर से नहीं गुजारना चाहते, अपना पद छोड़ दिया। जबकि अंतिम दम तक उनके बयान यही आते रहे कि वे एक बहादुर सैनिक की तरह अपने ऊपर लगाये जाने वाले आरोपों का सामना करेंगे और उन्हें ़गलत भी सिद्घ करेंगे। उनका इस्तीफ़ा उनके 9 वर्ष के शासनकाल का एक बेहद उतार-चढ़ाव भरा दस्तावेज है। हालॉंकि पाकिस्तान के सैनिक शासकों में उनका नाम चौथे नंबर पर आयेगा, लेकिन सैनिक सुप्रीमो और राष्टपति का पद संभालने वाले पाकिस्तान के इतिहास के वे अकेले शख्स हैं। उनके चढ़ने और उतरने का इतिहास भी लगभग एक-सा है। जिस व्यक्ति को जिस तरीके से उन्होंने गद्दी से बेदखल किया था, उसी व्यक्ति ने लगभग उसी तरह राजनीतिक दबाव डालकर उन्हें राष्टपति पद छोड़ने को मजबूर किया है। उन्होंने अपने इस कार्यकाल में वह दिन भी देखा कि उन्हें घरेलू और बाहरी राजनीति में भारी समर्थन से नवा़जा गया और उन्होंने यह दिन भी देखा कि उनके मुश्किल समय में उनके समर्थन में कोई खुलकर सामने आने को तैयार नहीं हुआ। सर्वाधिक भरोसा उन्हें सेना पर ़जरूर रहा होगा, जिसके उच्च पदों पर उनके द्वारा बिठाये लोग आज भी आसीन हैं। अब तक की पाकिस्तान की राजनीति में सबसे अहम रोल सेना का ही रहा है। आज भी उसकी ताकत निर्वाचित सरकार की अपेक्षा कुछ अधिक ही है। अगर वह चाहती तो मुशर्रफ को पद से हटाने का मंसूबा एक पल में ध्वस्त हो जाता। लेकिन उसकी तटस्थता ने मुशर्रफ को सर्वाधिक निराश किया। इसके अलावा जिस अमेरिका-परस्ती की वजह से पाकिस्तानी अवाम में मुशर्रफ सर्वाधिक बदनाम हुए, उस अमेरिका ने भी उनके मुश्किल समय में अपनी आँखें फेर लीं। अतः उनका भी गद्दी से उतरना वैसा ही मायूसी भरा माना जायेगा जैसा कभी पूर्व प्रधानमंत्री नवा़ज शरीफ के हिस्से में उन्होंने ़खुद डाला था। उनका इस्तीफा निर्वाचित सरकार की विजय का प्रतीक अवश्य है लेकिन पाकिस्तान की राजनीति आतंकवाद के साये में रहते किसी राजनीतिक स्थिरता के मु़खातिब होगी, इसमें संदेह की गुंजाइश बनी हुई है।

चिरंजीवी का राजनीति-प्रवेश

अब तक की आंध्रप्रदेश की राजनीति कांग्रेस और तेलुगुदेशम पार्टी के दो ध्रुवों का ही चक्कर लगाती रही है। वैसे कहने को तो कई महत्वपूर्ण पार्टियॉं प्रदेश की राजनीति में मौजूद हैं, लेकिन कांग्रेस और तेदेपा के वर्चस्व को अब तक तोड़ पाने में कामयाबी किसी को नहीं मिली। इस वर्चस्व के टूटने का कयास अब मेगास्टार चिरंजीवी के राजनीति में प्रवेश से बड़ी ते़जी से हवा में तैरने लगा है। पिछली 17 तारी़ख को चिरंजीवी ने अपने इस फैसले की घोषणा पूरे समारोह पूर्वक की और स्वयं को तथा अपनी बनने वाली पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की अपनी योजना का खुलासा भी किया। महात्मा गांधी, बाबा साहेब अंबेदकर और ज्योति बा फुले के आदर्शों पर चलने की घोषणा तो उन्होंने की ही, पूर्व राष्टपति एपीजे अब्दुल कलाम को भी उन्होंने अपना आदर्श स्वीकार किया।

इतना ़जरूर है कि कांग्रेस और तेदेपा की ओर से भले ही उन्हें ़खास अहमियत न देने की नीति अपनायी जा रही हो, लेकिन इस मेगास्टार ने दहशत तो दोनों खेमों में पैदा कर ही दी है। वैसे तो दक्षिण भारत की राजनीति में कई फिल्मी हस्तियों ने प्रवेश कर स्थापित सत्ता को धराशायी किया है, लेकिन आंध्रप्रदेश के संदर्भ में एनटी रामाराव की करिश्मायी राजनीति की याद अभी बहुत से दिलों में बनी हुई है। एनटीआर ने प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता को उस समय मटियामेट किया था जब कांग्रेस का जलवा अपने चरम पर था। लोग-बाग इस चर्चा में मशगूल दिखाई देते हैं कि चिरंजीवी अपने फिल्मी ग्लैमर से वह चकाचौंध पैदा करने में कामयाब होंगे या नहीं? बहरहाल, इसका फैसला तो समय आने पर ही होगा।

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