मेरे ही ़ज़ख्मों से इक चिं़गारी सुलगाता रहा

वह जिसे ओढ़ता रहा सुनता रहा बिछाता रहा

मुझे बस उसी ़ग़जल के शेरों में उलझाता रहा

रूई के सुंदर सफ़ेद पर्वतों पर चढ़ाकर मुझको

मेरे ख्वाबों को अंदर ही अंदर से जलाता रहा

बुझी हुई चिंगारी में ढूँढ कर शोलों का वजूद

मेरे ही ़ज़ख्मों से इक चिं़गारी सुगाता रहा

मं़िजल की तलाश में जाने ना दिया इधर-उधर कभी

मेरा मसीहा बन मुझे ही उमर भर भटकाता रहा

एक ़खौफ को सीने पर टांग दिया के ़जुबां बंद रहे

हर लम्हा दर्दीली टीस मेरी रूह से टपकाता रहा।

 

– बी.एल. अग्रवाल “स्नेही’,

ऱ्ैदराबाद

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