मैनपुरी

पश्र्चिमी उत्तर-प्रदेश का मैनपुरी नगर महर्षि मयन की तपोभूमि है। प्राचीन काल में यहां नागरिया ग्राम में मयन नामक युवक रहा करता था, जो बहुत ही मातृभक्त था। उसके विवाह हेतु बारात निकटवर्ती धारऊ ग्राम जा रही थी, रास्ते में बारातियों को इस बात की याद आई कि विवाह की आवश्यक वस्तु सिंधोरा तो घर पर ही छूट गया है। वह कहीं रखा है, इसकी जानकारी मयन को ही थी। अतः वह उसे लेने के लिए अपने घर लौट आया। वहां उसने देखा कि उसकी मां कठौती में रखकर दोनों हाथों से जल्दी-जल्दी खीर खा रही है। उसने अपनी मां से इस तरह खीर खाने का कारण पूछा तो वह बोली, “”आज खा लूं। क्या पता कल बहू के आने के बाद इस तरह खीर खाने को मिले या न मिले।”

मॉं की बात सुनकर मयन को बहुत दुःख हुआ। वह विवाह का परित्याग कर संन्यासी बन गया और तपस्या करने के लिए जंगल में चला गया। मार्ग में ठहरी बारात को इसका समाचार मिला तो बाराती व विवाह संबंधी सारी वस्तुएं पत्थरों में तब्दील हो गई। अश्यौली के राजा वीर सिंह ने सन् 1391 में किला बनाने के लिए खुदाई करवाई, तो उन्हें एक विशालकाय प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसे पुरातत्वविदों ने महर्षि मयन की प्रतिमा बतलाया। इस प्रतिमा को राजा वीर सिंह ने एक चबूतरे पर स्थापित करवा कर किले के आसपास बसी बस्ती को मयनपुरी नाम दिया, जो कि कालांतर में मैनपुरी हो गया।

मैनपुरी की देवी मां शीतला देवी की महिमा अपरंपार है। उनका भव्य मंदिर मैनपुरी कुरावली मार्ग पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं शताब्दी के मैनपुरी के राजा जगतमणि ने कराया था। इस मंदिर में स्थित एक स्थान विशेष पर मां शीतला स्वयं प्रकट हुई थीं। मैनपुरी जिला मुख्यालय से लगभग चौबीस कि.मी. दूर धिरारे व कुदावली मार्ग पर अति प्राचीन ग्राम औंछा में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यहां पर चौरासी हजार ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। इन ऋषियों में से महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, कश्यप, व्यास, श्रृंग, च्यवन आदि ऋषियों की तप स्थलियां तो यहां आज भी टीलों के रूप में विराजमान हैं।

यहां 62 बीघे के क्षेत्रफल वाला विशाल जलकुंड भी है, जिसमें महर्षि च्यवन ने अश्र्विनी कुमारों के साथ स्नान करके युवावस्था प्राप्त की थी। इस कुंड की विशेषता यह है कि इसके जल में मेढक जीवित नहीं रहते हैं और इसमें स्नान करने से लोगों को विभिन्न प्रकार के चर्म-रोगों से मुक्ति मिलती है।

शहर मैनपुरी से लगभग बीस कि.मी. की दूरी पर घिरोर विकास खंड में महात्मा विदुर द्वारा बसाई गई नगरी मारकंड विधूना है। यहां मार्कण्डेय ऋषि का अति सुंदर मंदिर है। मैनपुरी से लगभग 16 कि.मी. दूर स्थित भोगांव कस्बे का सोमनाथ मंदिर यहां का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है। इस समय जहां यह मंदिर है, वहां प्राचीन काल में घना जंगल था। एक बार एक राजा राजधानी में स्थापित करने के लिए अपने रथ में एक शिवलिंग रखकर ले जा रहा था। राजा का रथ भूमि में धंस गया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। राजा अपनी सेना सहित काफी कोशिश करने के बाद भी उस शिवलिंग को उठवा न सका। बाद में राजा भूमिपाल ने वहां पर राजपूत शैली का भव्य मंदिर बनवाया, जो कि आगे चलकर सोमनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्घ हुआ।

– कीर्ति

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