यह राष्टीय शर्मिंदगी का विषय है

किसी भी व्यक्ति, समाज या देश के लिए शर्म की बात क्या हो सकती है, इस प्रश्र्न्न का सीधा उत्तर देना आसान नहीं है, फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह जिससे व्यक्ति, समाज या देश की प्रतिष्ठा पर आँच आती हो, जिससे स्थापित मूल्यों-आदर्शों का हनन होता हो, जिससे मानवीय गरिमा कम होती है, वह शर्म की बात है। ऐसे ही काम किसी व्यक्ति या समाज या देश की बदनामी का कारण भी होते हैं। मसलन, हाल ही में उड़ीसा, कर्नाटक आदि राज्यों में जिस तरह ईसाइयों को प्रताड़ित किया गया, वह देश के लिए शर्म की बात है। एक और ताजा उदाहरण भ्रष्टाचार का है। एक सर्वेक्षण में यह पाया गया है कि भ्रष्टाचार के संदर्भ में पिछले दो वर्षों में भारत की स्थिति और बिगड़ी है- दुनिया के देशों में भारत का स्थान 72वां था, अब 85वां हो गया है। देश के लिए यह शर्म की बात है। ऐसी बातों से समाज या देश बदनाम होता है। जिस तरह देश भर में किसान आत्महत्याएं करने के लिए विवश हुए हैं, यह शर्म और बदनामी की बात है।

लेकिन देश के एक जाने-माने अर्थशास्त्री और शिक्षाशास्त्री हैं, जिन्हें किसानों की आत्महत्या करने की विवशता पर शर्म नहीं आ रही, बल्कि उनकी परेशानी यह है कि इन आत्महत्याओं को उजागर करके देश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने महाराष्ट को बदनाम कर दिया है।

एक विश्र्वविद्यालय के कुलपति एवं प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार एक प्रोफेसर को इस बात की शिकायत है कि मेग्सासे पुरस्कार विजेता पत्रकार पी. साईंनाथ ने महाराष्ट के किसानों की दुर्दशा एवं उनकी आत्महत्याओं के बारे में लिख कर महाराष्ट को बदनाम किया है। उनका कहना है, आंकड़े देखे जायें तो बाकी राज्यों की तुलना में महाराष्ट में कम किसानों ने आत्महत्या की है- इस संदर्भ में महाराष्ट का नंबर तो चौथा या पांचवां है। इस आशय की रिपोर्ट देने के पीछे प्रोफेसर साहब की क्या विवशता रही होगी, यह तो नहीं पता, लेकिन यह अपने आप में कम शर्मनाक बात नहीं है कि देश के एक वरिष्ठ शिक्षाशास्त्री-अर्थशास्त्री को महाराष्ट में किसानों की आत्महत्या की खबरें तो राज्य की बदनामी लगती हैं, लेकिन इस बात का अहसास नहीं होता कि जिन कारणों से देश के किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है, वे कारण भी अपने आप में राष्टीय शर्म का विषय हैं। कोई साईंनाथ यदि महाराष्ट के किसानों की दुर्दशा का चित्रण करता है तो इसका उद्देश्य व्यवस्था और शासकों को वस्तुस्थिति से परिचित कराना ही होता है। वस्तुस्थिति यह है कि पिछले एक अर्से से देश के अन्य भागों की तरह ही महाराष्ट में भी किसान गलत नीतियों, उनके आपराधिक िायान्वयन एवं गलत प्राथमिकताओं का शिकार हो रहे हैं। पी. साईंनाथ यदि 34हजार किसानों की आत्महत्या की खबरें देकर समाज और सरकार को आगाह करते हैं तो यह किसी की बदनामी करने का प्रयास नहीं है, यह तो वस्तुस्थिति दिखा कर सही दिशा में सही कदम उठाने के लिए प्रेरित करने की बात है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस प्रकार की आत्महत्याओं से व्यवस्था के तौर-तरीकों की कलई खुलती है, उसकी संवेदनहीनता सामने आती है। प्रकरण का उजागर होना बदनामी अथवा शर्म की बात नहीं है, शर्म की बात तो आत्महत्याओं का होना है।

साल-दर-साल देश में अलग-अलग हिस्सों में किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य होते रहें और समाज और व्यवस्था दोनों यह सब देख कर भी न देखने का नाटक करते रहें, यह अपने आप में शर्म की बात है। लेकिन हमारी त्रासदी तो यह है कि हमें शर्म आती ही नहीं। फिर सवाल सिर्फ किसानों की आत्महत्या का ही नहीं है। देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, हम इसे चुपचाप देख रहे हैं। एक स्वाभाविक स्थिति मान लिया गया है इसे। किसी दफ्तर के चपरासी से लेकर अदालतों के जजों तक पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश स्वीकार चुके हैं कि न्यायपालिका के बीस प्रतिशत कर्मचारी जिनमें न्यायाधीश भी शामिल हैं, भ्रष्ट हैं।

आजादी के साठ-पैंसठ साल बाद भी देश के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं, मजदूरी के लिए बाध्य हो रहे हैं, लाखों बच्चे प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। भ्रूण हत्याएं एक खौफनाक सच बनकर हमारे सामने खड़ी हैं। आर्थिक और सामाजिक विषमतायें प्रगति के हमारे दावों को अंगूठा दिखा रही हैं…. किसी भी राज्य या देश या समाज की बदनामी इन और ऐसे कारणों से होती है- ऐसे कार्यों को उजागर करने से नहीं।

हमारी त्रासदी यह भी है कि हमने प्रतिष्ठा के झूठे प्रतिमान गढ़ लिये हैं। जिस महाराष्ट के किसानों की आत्महत्याओं के समाचारों पर नरेंद्र जाधव सवालिया निशान लगा रहे हैं, उस महाराष्ट में भाषा के नाम पर भारतीय नागरिक को अपने-पराये में बांटा जा रहा है। बदनामी का कारण तो यह हरकत होनी चाहिए। शर्म तो ऐसी हरकतों पर आनी चाहिए।

वैसे देश में पत्रकारिता की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। इसके अपवाद भी हैं, लेकिन उनसे यह सच छिपता नहीं कि व्यावसायिकता हमारी पत्रकारिता पर हावी होती जा रही है। आज पत्रकारिता के लिए भी आर्थिक लाभ सामाजिक दायित्व से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं। धुरीहीनता के इस वातावरण में भी साईंनाथ जैसे पत्रकार अंधेरे से लड़ने वाले दीपक की भूमिका निभाते हैं। ऐसे पत्रकारों के मंतव्यों पर जब उंगली उठायी जाती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उंगली उठाने वाले का मंतव्य क्या है?

बहरहाल, जहॉं तक किसी राज्य की बदनामी अथवा राष्टीय शर्म का सवाल है, बहुत कुछ है हमारे यहॉं शर्म करने के लिए। किसानों की आत्महत्या या बढ़ता भ्रष्टाचार या भूख से मरते बच्चे या भ्रूण हत्याएं… ऐसी बातों से बदनामी तो होती है, लेकिन यह बदनामी स्थितियां बदलने की प्रेरणा का कारण बननी चाहिए। कोई साईंनाथ यदि हमारी आँख में उंगली डालकर हमें कुछ दिखाना चाहता है तो उसका अभिनंदन होना चाहिए। अपने शिक्षाशास्त्रियों-अर्थशास्त्रियों से हमारी अपेक्षा यह है कि वे स्थितियों का सही आकलन कर आने वाले कल को बेहतर बनाने में राष्टीय प्रयासों को बदल देंगे।

जहॉं तक किसानों की आत्महत्याओं का सवाल है, समस्या अभी सुलझी नहीं है। सरकार के सारे कथित प्रयासों और सहायता की सारी घोषणाओं के बावजूद देश का गरीब किसान आज भी बेचारा है। यह बेचारगी हमारी शर्म का विषय होनी चाहिए। और कोशिश इस शर्म से उबरने की होनी चाहिए। इस कोशिश का मतलब है एक राष्टीय संकल्प। ऐसे संकल्प वस्तुस्थिति को समझकर ही साकार हो सकते हैं। सवाल सिर्फ यह है कि हम वस्तुस्थिति को समझना चाहते हैं या नहीं?

 

– विश्वनाथ सचदेव

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