युगांतकारी परिवर्तन की आहट है ओबामा की विजय

युगांतकारी परिवर्तन की एक नई प्रेरणा के साथ डेमोक्रेट प्रत्याशी बराक ओबामा ने अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वन्द्वी जॉन मेक्कन को पराजित कर अमेरिकी राष्टपति होने का गौरव प्राप्त कर लिया है। हालॉंकि वे इस पद पर आरूढ़ होने की औपचारिकता आगामी वर्ष, जनवरी में पूरा करेंगे, लेकिन उनकी यशस्वी विजय ने सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में परिवर्तन की पूर्व भूमिका रचने का कार्य शुरू कर दिया है। पूरी दुनिया की दबी-कुचली और प्रताड़ित मनुष्यता ओबामा के रूप में अगर अपने उद्घारक को देख रही है, तो इस आशावादिता को कोरी परिकल्पना भी नहीं कहा जा सकता। इसका कारण यह है कि ओबामा के रूप में वह इतिहास विजयी हुआ है, जिसे रंग-भेद और जाति-भेद के चलते एक लंबे काल-खंड तक प्रताड़नाओं के अनगिनत अभिशापों से गुजरना पड़ा है। प्रताड़नाओं का वह रक्त-रंजित इतिहास ओबामा के शीश पर आज राजमुकुट बन कर सुशोभित हुआ है। यह उस इतिहास की संकल्प-विजय नहीं तो और क्या है?

आज से 45 साल पहले मानवाधिकार आंदोलन के प्रणेता मार्टिन लूथर किंग ने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ मानवीय समानता का जो सपना देखा था, वह सपना ओबामा की विजय की शक्ल में उसी अमेरिका में साकार हुआ है जहां उन्होंने इस आंदोलन की बुनियाद रखी थी। उसके पहले इसका सूत्रपात दक्षिण आीका की धरती पर महात्मा गांधी ने किया था। इस दृष्टि से ओबामा की विजय को इस संघर्ष की प्रतीक-विजय भी कहा जा सकता है। इस विजय के साथ अमेरिका के इतिहास ने भी एक नया मोड़ लिया है और आशा के विपरीत अमेरिकी जनता ने, जिसमें बहुसंख्या गोरी चमड़ों वालों की ही है, एक काली चमड़े वाले अश्र्वेत को अपने राष्ट का प्रतीक-पुरुष नियुक्त किया है। इस दृष्टि से ओबामा राष्टपति के रूप में पहले अश्र्वेत राष्टपति होंगे जिनका प्रवेश “व्हाइट हाउस’ में होगा। व्हाइट हाउस में ओबामा का यह प्रवेश किन युगान्तकारी परिवर्तनों की रचना कर सकेगा, इसकी भविष्यवाणी अभी से तो नहीं की जा सकती, लेकिन क्या इस “प्रवेश’ को अपने आप में उस परिवर्तन की पदचाप नहीं स्वीकार किया जा सकता?

क्या ओबामा की विजय को किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा राष्ट की विजय तक सीमित करना न्याय-संगत होगा? क्या इसे इस रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता कि विश्र्व का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका आज पूरी दुनिया में आम आदमी की ताकत को सर्वोच्च सिद्घ करने जा रहा है? आधुनिक मानव सभ्यता के इतिहास का यह पूरी दुनिया को एक “बेहतरीन तोहफ़ा’ भी साबित होने जा रहा है। क्योंकि इसमें बदलती दुनिया की तस्वीर ही नहीं छिपी है बल्कि दुनिया को बदलने का “ऐलान’ भी छिपा है। बराक हुसेन ओबामा का रुतबा पूरी दुनिया के दबे-कुचले लोगों के प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। धन्यवाद तो उस अमेरिकी जनता को दिया जाना चाहिए जिसने राष्टपति चुनाव में प्रतिद्वन्द्वी बने डेमोक्रेट ओबामा और रिपब्लिकन मेक्केन के रूप में परिवर्तन और यथास्थितिवाद के संघर्ष को बहुत बारीकी से देखा, समझा व पहचाना और अपनी स्वीकृति की मुहर परिवर्तन पर लगा दी। क्या इसे दुनिया के वर्तमान ढॉंचे को नये सिरे से गढ़ने की आकांक्षा का प्रस्फुटन नहीं स्वीकार किया जाना चाहिए?

इस दृष्टि से ओबामा की इस विजय को उन परिवर्तन-गामी ताकतों की विजय स्वीकार किया जाना चाहिए जिन्हें यह लूट-खसोटवादी नृशंस व्यवस्था कत्तई नापसंद है। जिन्हें घृणा और विद्वेष की हिंसात्मक राजनीति से गुरे़ज है और जो दुनिया को बारूद की लपटों में झुलसते हुए देखना गवारा नहीं करते। जो चाहते हैं कि उनके बच्चों को एक हरी-भरी धरती मिले। जो सद्भावना और शांति की गारंटी देती हो और जो चाहते हैं कि इस धरती पर युद्घ और युद्घ-पिपासा का खूनी इतिहास लिखा जाना बन्द हो। ओबामा इस आकांक्षा की कसौटी पर किस सीमा तक खरे उतरते हैं अथवा वे भी सत्तावादी राजनीति का वही पुराना इतिहास दुहराते हैं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लेकिन जिस मनुष्यता ने एक लंबे समय तक पीड़ा का यह इतिहास भोगा है, उसकी चाहत इसके अलावा और हो भी क्या सकती है?

अमेरिकी जनता ने “ओबामा’ के रूप में अमेरिका के एक नये भविष्य का चुनाव किया है। लेकिन यह भविष्य सिर्फ उसका ही होगा, ऐसा भी नहीं है। इस भविष्य में मौजूदा दौर की दुनिया का भविष्य भी पोशीदा है। दुनिया की ़जरूरतें और समस्यायें एक बदले हुए अमेरिका को देखना चाहती हैं। एक ऐसे अमेरिका को, जो अपनी श्रेष्ठता सिद्घ करने के लिए फिर किसी इराक अथवा अफगानिस्तान की धरती को अपने नापाक बमों से बंजर न बनाये। ऐसे अमेरिका को देखना चाहती है जिसका वैश्र्विक अर्थशास्त्र गरीब मुल्कों का औपनिवेशिक शोषण करने से परहेज करे। ऐसा अमेरिका जिसके चेहरे पर मानवतावाद का मुखौटा न हो बल्कि चेहरा मानवीय हो। 47 वर्षीय ओबामा को अपने नाम और जाति की वजह से यह अहसास था कि उनका व्हाइट हाउस तक का सफर आसान नहीं है और यह कि अगर ये सफर वे पूरा कर लेते हैं तो यह सिर्फ उनकी विजय नहीं होगी, यह एक अभीप्सा और आकांक्षा की विजय होगी जो दुनिया को बदली हुई देखना चाहती है। वह विजय अभियान पूरा हो गया है। क्या इस अवस्था में उन दबी-कुचली इच्छाओं को खुशी नहीं मनानी चाहिए?

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